20 जुलाई जंतर-मंतर के दृश्य

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
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19 जुलाई को जंतर मंतर धरनास्थल पर शाम के लगभग 4 बजे मैंने प्रवेश किया। पटेल चैक मेट्रो स्टेशन के गेट से जंतर मंतर धरनास्थल पर पहुंचने में आधा घंटा से अधिक लगा। इसकी दूरी लगभग 200 मीटर के आस-पास ही रही होगी। लेकिन ज्यादा भीड़ की वजह से अंदर धरनास्थल पर इतने अधिक लोगों की संख्या जमा थी कि बाहर से लोगों का जाना संभव ही नहीं था।
    
अंदर काकरोच जनता पार्टी के मुख्य मंच के अगल-बगल साइड में और सामने अलग-अलग क्रांतिकारी, वामपंथी छात्र संगठनों के स्टाॅल, टेंट लगे हुए थे। सोनम वांगचुक को उससे पहले ही दिल्ली पुलिस तानाशाही तरीके से 18 जुलाई को उठाकर राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कर चुकी थी। अंदर अलग-अलग छात्र संगठनों के भी कई लोग भूख हड़ताल में बैठे हुए थे। संगठन जिनके पास टेंट नहीं था वह किसी जगह पर अपने बैनर, पोस्टर, तख्ती और साहित्य के साथ बैठे हुए थे। इसके अलावा भी कई सामाजिक-जनवादी और अन्य प्रदर्शनकारी लोगों के वहां टेंट लगे हुए थे। 
    
अलग-अलग संगठनों के लोग और अलग-अलग व्यक्तियों के समूह क्रांतिकारी गीत गाना, नारे लगातार लगाए जा रहे थे। ज्यादातर नए-नए लोग 15 से 25-30 साल के छात्र-छात्राएं, नौजवान और कुछ बड़े लोग लगातार आए जा रहे थे जिन्होंने कभी प्रदर्शनों में भागीदारी नहीं की वह भी आ रहे थे। जीवन में कभी नारे नहीं लगाए, क्रांतिकारी गीत नहीं गाए, वह भी नारे लगाना, गीतों में साथ देना, दो लाइन ही गा सकें वह गा रहे थे। कई लोगों ने ढपली नहीं बजाई थी, वह मांग कर ढपली भी बजा रहे थे। संगठनों के लोग अपना पर्चा, साहित्य वितरित कर रहे थे। यह ऐसा नजारा था जो अमूमन दिखाई नहीं पड़ता है। कैसे एक आंदोलन लोगों को घरों से निकालकर उन्हें संघर्ष का जीवंत हिस्सा बना देता है। वह भी वह नौजवान जिनके बारे में कहा जाता है कि यह तो फोनों में ही चिपके रहते हैं, घर से बाहर कम निकलते हैं आदि आदि। किसी भी ऐसे आंदोलन में जिसमें हजारों-हजार लोग हों और नए छात्र-युवाओं की संख्या हो, जिन्होंने कभी धरना-प्रदर्शन में भागीदारी नहीं की हो तो उनका उत्साह, जोश, उमंग देखते ही बनता है। 
    
रात को जाकर कुछ भीड़ कम हुई। लेकिन इतनी कम भी नहीं कि वहां आसानी से चहल-कदमी की जा सके। लेकिन तब भी थोड़ा बहुत चलने का स्पेस मिल जा रहा था। अलग-अलग छात्र संगठनों के टेंट, स्टाॅल में क्या चल रहा है यह देखने को मिल रहा था। मंच के पास जाने का स्पेस तो तब भी नहीं था।
    
जंतर मंतर के अंदर धरना स्थल पर ही पानी की बोतल, बिस्कुट बांटे जा रहे थे जो कि अलग-अलग लोग लेकर आ रहे थे। छात्रों ने सरकार से विरोध के नए-नए तरीके निकाल रखे थे। पिछले दिनों इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेलोडी टाॅफी भेंट की और इसका विडियो जारी किया था। सोशल मीडिया में इस पर काफी मीम और चुटकुले बने। यहां भी इसी चुटकुले के अंदाज में प्रधानमंत्री पर व्यंगात्मक रूप में कई लोग मेलोडी टाॅफी के पैकेट लाकर बांट रहे थे जो उनके विरोध अलग तरीका था। 
    
भीड़ लगातार रात में भी बढ़ती जा रही थी। रात में ही बैरिकेड पीछे करने से स्पेस ज्यादा होने के बावजूद भी नए-नए छात्र-छात्राओं के समूह आए जा रहे थे। संसद मार्ग की तरफ जाने वाली रोड और जनपद लेन खचाखच लोगों से भरी हुई थी। 
    
रात भर इस पूरे स्थल में नारे, गीत और राजनीतिक चर्चाएं लोगों के बीच में चलती रहीं। दूर से थके-हारे आए लोग भी भूखे-प्यासे ही खाली सड़कों में ही बैठे और लेटे रहे। सोशल मीडिया, यूट्यूबर आदि पत्रकार भी इस मंजर को वहां रिकार्ड करने के लिए मौजूद थे। यह प्रक्रिया रात भर चलती रही। 
    
सुबह 4-5 बजे के बाद इतने ज्यादा लोग आ चुके थे कि रात के इस बढ़ाए स्पेस में भी अब जगह कम हो चुकी थी। सुबह के समय बारिश आई लोग खुले आसमान के नीचे भीगते रहे। लेकिन यह उनके हौसलों और उत्साह को डिगा नहीं पाई। 
    
दिल्ली पुलिस द्वारा जहां भी बैरिकेड लगाए गए थे उससे बाहर और आस-पास की जगहों में खचाखच लोग ही लोग नजर आ रहे थे। जंतर मंतर के आस-पास के मेट्रो बंद करने के बाद भी लोग पैदल आए जा रहे थे। अंदर और बाहर जहां लोगों को जगह मिल रही थी वहां पर जुलूस निकालते हुए गीत गाना, नारे लगाना यह प्रक्रिया लगातार चल रही थी। अंदर मंच के पास क्या चल रहा है यह किसी को पता नहीं चल पा रहा था। माइक सिस्टम इतना था नहीं कि इतनी भारी भीड़ में लोगों तक आवाज पहुंच सके। अलग-अलग संगठनों और छात्रों युवाओं के समूह अपने-अपने समूह में अलग-अलग चीज आयोजित कर रहे थे। नौजवान इनमें जुड़कर खुद को शामिल कर ले रहे थे। 
    
20 जुलाई संसद मार्च आह्वान के साथ इतनी भारी संख्या में छात्रों-युवाओं का शामिल होना यह उनके ऊपर सालों से बीत रही भयंकर पीड़ा और गहरे दर्द को बयां कर रहा था। उन्होंने किसी संगठन या ब्श्रच् के आह्वान की जगह इसको अपना समझते हुए इसमें भागीदारी करने का निर्णय लिया और उसी के तहत वह इतनी बड़ी संख्या में दिल्ली की सड़कों पर पहुंच चुके थे। क्योंकि भीड़ इतनी ज्यादा थी कि किसी के कंट्रोल के बस की बात नहीं थी। और न ही यह किसी संगठनों के दायरे की भीड़ थी। सालों से दबाए और पनप रहे आक्रोश को लेकर ये युवा दिल्ली आए थे। यह खाली हाथ लौटकर जाने के लिए नहीं आए थे। अपने-अपने सवाल लेकर यह लोग संसद मार्च के साथ जुड़ गए थे। जंतर मंतर और नई दिल्ली के आस-पास के इलाके में इंटरनेट पूरी तरह बंद था। जैमर लगे हुए थे। यहां कालिंग के भी नेटवर्क बहुत कमजोर थे। 
    
छात्रों के नारे, उनके विरोध के तरीके काफी अलग थे। वह सोशल मीडिया खास तौर पर इंस्टाग्राम में भी इस आंदोलन को प्रचारित कर रहे थे। जंतर मंतर धरना स्थल पर भी काफी सक्रियता से लगे हुए थे। इनके नारे, तख्ती, स्लोगन काफी व्यंगात्मक, राजनैतिक, मजाकिया, अलग-अलग तरीके के थे। उनमें राजनैतिक थे तो मजाकिया भी। अपने-अपने नए तरीके के पोस्टर लेकर लोग आ रहे थे। उनमें रचनात्मकता भी थी और कंटेंट भी। यह अन्य आंदोलनों से कुछ अलग तरीके लिए हुए था जो नई पीढ़ी की सोच और उनके रुझान को दिखाता है। 
    
संसद मार्ग की और जाने वाले रास्ते में लगाए गए बैरिकेड सहित सभी बैरीकेडों पर भारी पुलिस बल और आरपीएफ के जवान मौजूद थे। नौजवान सुबह से ही संसद मार्ग की तरफ जाने वाले बैरिकेड को हटाने के लिए पुलिस से मांग करते रहे। पुलिस प्रशासन युवाओं को इसी बैरिकेड की सीमा के अंदर रोकने की मंशा के साथ उन्हें रोके जा रहा था। लेकिन छात्र संसद मार्च की काॅल पर आए थे और उसे हर हाल में फतह करना चाहते थे। 
    
छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के आह्वान के बाद भी पुलिस प्रशासन बैरिकेड खोलने को तैयार नहीं था। छात्रों के आक्रोश को देखकर पुलिस भी बैरिकेड टूट जाएंगे इसको भांप रही थी। वह बैरिकेड तोड़ने पर कानूनी कार्यवाही और बल प्रयोग की धमकी बार-बार दिए जा रही थी। काफी जोर आजमाइश के बाद छात्रों ने वेल्डिंग किये और रस्सी से बंधे हुए बैरिकेडों को 11 बजे के आस-पास हटा दिया। इसी दौरान पुलिस के साथ धक्का-मुक्की, लाठीचार्ज, बल प्रयोग में कई छात्र-नौजवान घायल हुए। यह पहला बैरिकेड हटाने के बाद छात्र संसद मार्ग की तरफ बढ़ चले। यहां से संसद मार्ग लगभग 1 किलोमीटर के आस-पास रहा होगा। 
    
पहले बैरिकेड तोड़ने के बाद थोड़ा आगे जाकर दूसरा बैरिकेड भी छात्रों के उत्साह को रोक नहीं पाया। वह उसे भी तोड़कर आगे पहुंच गए। तीसरा बैरिकेड संसद मार्ग (पार्लियामेंट स्ट्रीट) थाने के पास था। वहां पर पहुंचने तक छात्रों को काफी जतन करने पड़े। प्रशासन ने सड़क में बसें खड़ी की हुई थीं। हजारों छात्रों का हुजूम किसी तरह बसों के ऊपर चढ़कर, फुटपाथ पर चलकर किसी तरह संसद मार्ग थाने तक पहुंच पाया। इस दौरान अनगिनत छात्र पुलिस के दमन से लहूलुहान और घायल हो चुके थे। इन हजारों छात्रों के आगे पुलिस प्रशासन लाठीचार्ज और दमन करने के बावजूद भी असहाय और कमजोर ही नजर आ रहा था। पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने के पास बैरिकेड पर छात्रों को प्रशासन ने रोक दिया और छात्र वहीं पर बैठ गए। इसी दौरान छात्रों ने पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने की छत और पूरे थाने को ही घेर लिया। 
    
थोड़ी ही देर में नगीना से लोकसभा सांसद चंद्रशेखर वहां पहुंचे। उन्होंने छात्रों के इस शांतिपूर्ण मार्च की सराहना की, मार्च को यहीं पर धरना स्थल में बदल देने की मांग की। छात्र संसद मार्ग की तरफ जाने को तत्पर थे। कुछ छात्र किसी तरह चंद्रशेखर के बोलते-बोलते ही बैरिकेड से आगे पहुंच चुके थे। लगभग पौन घंटा चंद्रशेखर छात्रों-युवाओं को यहीं पर बैठकर धरना करने और सरकार को झुकाने की बात बोलते रहे। लेकिन छात्र संसद मार्च के लिए आए थे और इस मांग पर अड़े रहे। दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट कमिश्नर और कमिश्नर भी आए लेकिन छात्रों ने उनकी बात सुनने से इनकार कर दिया और कहा कि हम आपकी बात नहीं सुनेंगे। हम संसद मार्च करेंगे। इसी दौरान समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव भी वहां पर माइक से छात्रों से वार्ता करने आए। वह भी छात्रों से शांतिपूर्ण तरीके से यहीं पर बैठे रहने और सरकार से वार्ता करने की बात करते रहे लेकिन छात्र संसद मार्च के अपने प्रण से पीछे हटने को तैयार नहीं थे। वह भी खाली हाथ बैरंग वापस लौट गए। यहीं पर काकरोच जनता पार्टी के लोग भी सरकार से वार्ता चल रही है, के नाम पर छात्रों को रोकते रहे। परन्तु उन्होंने उनकी भी नहीं सुनी। 
    
2 बजे के बाद तेज बारिश होने लगी। इसी बारिश में छात्र संसद मार्ग थाने के पास सड़क में ही बैठे रहे। कुछ छात्र आगे संसद की ओर अन्तिम बैरिकेड के पास पहले ही बढ़ चुके थे। इसके अलावा भी अलग-अलग जगह छात्र पुलिस प्रशासन से टकराते रहे। छात्रों का एक हुजूम संसद मार्ग की तरफ था। एक कनाॅट प्लेस, पालिका बाजार के आस-पास प्रशासन द्वारा रोका गया था। सीजेपी के अभिजीत दीपके और सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अलग रास्ते से संसद की तरफ जा रहे थे। इसके अलावा भी कई जगह हजारों छात्र मौजूद थे। 
    
संसद के पास अंतिम बैरिकेड पर काफी ज्यादा पुलिस फोर्स छात्रों को घेरे खड़ी थी। और बेरिकेड खोलने के लिए काफी ज्यादा रस्साकस्सी चल रही थी। इसी दौरान पुलिस ने आंसू गैस (टियर गैस) छोड़ी। इससे कुछ छात्र थोड़ी देर के लिए पीछे तो हुए परंतु इन हजारों छात्रों के हुजूम में यह नाकाफी था। थोड़ी-थोड़ी देर के अंतराल में पुलिस आंसू गैस के गोले छोड़ते रही। और इस दौरान पुलिस लाठीचार्ज करते हुए छात्रों को पीछे तक धकेलती रही। कुछ छात्र टियर गैस के ऊपर भी लेटे और कुछ लोगों ने पानी से उसके असर को खतम कर दिया। टियर गैस छोड़ी गई तो उसको वापस पुलिस वालों के पास ही फेंक दिया। युवाओं ने काफी हिम्मत के साथ प्रशासन के इस दमन का सामना किया। 
    
लगातार टियर गैस छोड़ते हुए साथ में लाठीचार्ज के साथ पुलिस और आरपीएफ के जवान छात्रों को जंतर मंतर प्रदर्शन स्थल तक खदेड़ते हुए ले आई। तानाशाह की तरह पुलिस ने अपने देश के छात्रों पर कील लगे डंडे और पैलेट गन से हमला किया। यह लोकतांत्रिक व्यवहार नहीं बल्कि फासीवादी दमन था। इसमें कई लोग भागने में घायल और चोटिल हुए। एक-दूसरे के ऊपर गिरते, बचाते भागते रहे। कई लोगों का सामान जूते, चप्पल आदि वहीं छूट गए और इसी हालत में नंगे पैर दौड़ते रहे। जब छात्र आंसू गैस और लाठीचार्ज से बचते हुए धरना स्थल पर पहुंचे यह अत्याचारी दिल्ली पुलिस वहां भी शांत नहीं रही। 
    
धरना स्थल पर जो अलग-अलग संगठनों के टेंट, जगह मौजूद थी। उनके अंदर पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और इसी भगदड़ में वहां लोगों के ऊपर लाठीचार्ज किया। जो भी फ्लेक्स, बैनर और टैंट आदि सामान था, जल्लादों की तरह उन्हें फाड़ दिया गया। 23 दिन से भूख हड़ताल में बैठे छात्रों को भी नहीं बख्शा। उनके टेंट के अंदर भी आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया गया। लोग एक-दूसरे को बचाते हुए जहां जगह मिली वहां दौड़े। कुछ लोग दीवार से कूदे। इस भगदड़ में दीवार भी ऊपर से टूटी। 
    
इसी जगह पर ठीक सामने ही जनता दल यूनाइटेड का आफिस था। मैं खुद और कई लोग उसी आफिस के अंदर घुस गए। यह तानाशाह निर्दयी पुलिस वहां भी जालिमों की तरह डंडे मारते हुए लोगों पर टूट पड़ी। लोगों को जहां जगह मिली वहां दौड़े। कुछ लोग किसी के घरों के अंदर घुसे। लेकिन यह पुलिस केंद्र सरकार के आदेश के तहत किसी को बचाने के मूड में नहीं थी। घरों के अंदर घुसकर जहां लोग दिखे वहां उनके ऊपर लाठियां बरसाई गईं। यह मंजर ऐसा था कि जो किसी को भी अंदर से बहुत भयभीत कर देगा। जदयू के आफिस के अंदर पीछे साइड से एक छोटा सा पतला रास्ता है जिसमें एक समय पर एक ही व्यक्ति निकल सकता था। अंदर बंद और काफी घुटन भरी जगह थी। लेकिन इस लाठीचार्ज और भगदड़ में सबको बाहर निकालना उस वक्त की तात्कालिक जरूरत थी। वहां से कई लोगों को बाहर निकाला गया। हमारे पीछे-पीछे ही 23 दिन से भूख हड़ताल में बैठे हुए छात्र नौजवान भी किसी तरह लोगों के सहारे से वहां पहुंचे। बाहर निकलते लोगों को रोक कर पहले भूख हड़ताल में बैठे छात्रों को बाहर निकालने में हम लोगों और अन्य लोगों ने मदद की। फिर अन्य लोगों को बाहर निकाल कर और वहां से लोग निकल ही रहे थे कि वहां तक भी लाठीचार्ज करते हुए पुलिस पहुंच चुकी थी। सामने देखा तो दो मंजिला मकानों से लोग कूद मार रहे थे पुलिसवालों से बचने के लिए। क्योंकि पुलिस वाले घरों के अंदर घुसकर भी लोगों को मार रहे थे। 
    
वहां से हम और अन्य लोग पुलिस से बचते हुए किसी तरह बाराखंभा मेट्रो की तरफ जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़े। रोड में जाकर देखा तो वहां भी हजारों छात्र और पुलिस वालों के बीच काफी गहमागहमी चल रही थी। 
    
हम बाराखंभा मेट्रो के पास जाकर अपने अन्य साथियों की खोजबीन के लिए वहां रुके रहे। वहां का नजारा देखा तो कई लोग नंगे पांव और कुछ लोग बिना सामान के ही दौड़े जा रहे थे। आस-पास के मेट्रो बंद होने की वजह से मेट्रो के अंदर काफी ज्यादा भीड़ जमा थी। इतनी अधिक भीड़ थी कि वहां भी पैर रखने की जगह नहीं थी। 
    
बाद में कुछ छूटे हुए लोगों को राजीव चैक मेट्रो स्टेशन पर लेने के लिए गए। वहां भी पुलिस चारों ओर पार्क, सड़कों, गलियों और दुकानों में जहां देखो वहां दौड़ा-दौड़ा कर लाठियां बरसा रही थी। छात्र भी एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जा रहे थे। पुलिस वालों को आ जाओ-आ जाओ कहकर बुला रहे थे। इसके अलावा भी तमाम जगह यही हालात सुनने को मिल रहे थे। 
    
पिछले 12 सालों के मोदी सरकार के तानाशाही शासन से लोग आजिज आ चुके थे। मोदी सरकार में मंत्रियों के इस्तीफे नहीं लिए जाते हैं, यह बात उनके लोग कहते फिरते हैं। लेकिन फिर भी नौजवान इस घुटन भरे माहौल के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आए। वह वहां एक महीने से बिना इंतजामों के गर्मी, उमस भरे मौसम में भूखे, प्यासे, मामूली और गंदे टाॅयलेट के बावजूद अपने एजेंडे पर टिके हुए थे। कई लोग तो घर से बिना बताए अपने भविष्य को बचाने के लिए आए थे। उनके साथ देश के मेहनतकश और न्यायपूर्ण लोग थे। जो दिल्ली नहीं आ पाए उनका नैतिक समर्थन भी उनको था। नौजवानों ने दिखाया कि आंदोलन मजबूत कही जाने वाली सरकार के खिलाफ भी लड़ा जा सकता है। जो बाहर से मजबूत बताई जा रही थी परन्तु अंदर से उतनी ही कमजोर है।         -महेश 
 

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