आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं पर 2 अदालती निर्णय

/aanganawadi-karykartaaon-par-2-adaalati-decision

बीते दिनों तेलंगाना व गुजरात उच्च न्यायालय ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं पर दो परस्पर विरोधी निर्णय दिये। तेलंगाना उच्च न्यायालय ने जहां सरकार को इन्हें नियमित करने का आदेश दिया। वहीं गुजरात उच्च न्यायालय ने इन्हें सरकारी कर्मचारी मानने से इंकार करते हुए इनका वेतन बढ़ाने का निर्देश दिया। 
    
तेलंगाना उच्च न्यायालय ने 25 वर्ष से अधिक समय से अनुबंध पर कार्यरत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं व पर्यवेक्षक की सेवाओं को नियमित करने का आदेश दिया। साथ ही उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि उनकी पहले की सेवा पेंशन व सेवानिवृत्ति लाभों के तहत आयेगी। 
    
2013 में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने अपने नियमितीकरण को लेकर 2 याचिकायें लगायी थीं। इसी पर 12 वर्ष बाद उच्च न्यायालय ने उपरोक्त निर्णय दिया। कार्यकर्ताओं की दलील थी कि उन्हें आंगनवाड़ी कार्यकर्ता व पर्यवेक्षक ग्रेड-प्प् के पदों पर उचित चयन प्रक्रिया के तहत भर्ती किया गया था पर उस वक्त नियमित नियुक्तियों पर रोक के चलते अनुबंध पर रखा गया। इसलिए वे नियमित होने की अधिकारी हैं। वहीं सरकारी वकील का तर्क था कि नियमित पदों पर नियुक्ति नियमानुसार सीधी भर्ती से ही संभव है इन्हें इस भर्ती में 15 प्रतिशत वेटेज दिया जा सकता है। पर नयी भर्ती प्रक्रिया से ही नियमित करना संभव है। अन्यथा यह अन्य भर्ती योग्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय होगा। 
    
इस पर निर्णय देते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि चूंकि ये दशकों से संतोषजनक ढंग से कार्यरत हैं अतः उनको नियमित करने की मांग से इनकार नहीं किया जा सकता। इस तरह अदालत ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के पक्ष में निर्णय दिया। 
    
वहीं दूसरी ओर गुजरात राज्य में एक डिवीजन बेंच ने यह आदेश दिया था कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं व सहायकों को राज्य या केन्द्र सरकार में सिविल पदों पर चयनित स्थायी कर्मचारियों के बराबर माना जाये। इस हेतु आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं व सहायकों ने नियमित किये जाने व राज्य सरकार के अंशकालिक कर्मचारियों के बराबर न्यूनतम वेतन दिये जाने की रिट अदालत में दायर की थी। न्यायालय की एकल पीठ ने उक्त आदेश के तहत राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह इन्हें नियमित स्थायी कर्मचारी के समान माने व नियमित कर्मचारियों सरीखे लाभ देने हेतु नीति बनाये। साथ ही इन्हें क्रमशः तृतीय व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के बराबर वेतनमान देने की बात की। 
    
बाद में राज्य सरकार इस निर्णय के विरोध में उच्च न्यायालय की बड़ी बेंच में अपील हेतु गयी। इस पर निर्णय देते हुए उच्च न्यायालय ने भर्ती प्रक्रिया की भिन्नता, आंगनवाड़ी केन्द्रों के स्थायी न होने आदि का हवाला देते हुए उन्हें नियमित कर्मचारी मानने या नियमित करने से इनकार कर दिया। साथ ही उन्हें तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के न्यूनतम वेतनमान देने से भी इंकार कर दिया गया। हालांकि उनके 10,000 रु. व 5500 रु. के वर्तमान वेतनमान को काफी कम मानते हुए क्रमशः 24,800 रु. व 20,300 रु. करने का निर्देश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को दिया। 
    
उक्त दो अदालतों के निर्णय दिखलाते हैं कि स्कीम वर्कर्स के साथ सरकारें जहां बंधुआ मजदूरों सरीखा काम करा रही हैं। वहीं कानून की शीर्ष अदालतें अलग-अलग तर्कों से उनकी इस स्थिति पर कभी कुछ तो कभी कुछ निर्णय देती हैं। इससे देश स्तर पर सरकारें इन निर्णयों के छिद्रों का लाभ उठा इनकी बंधुआ मजदूर की स्थिति जारी रखती रही हैं। 

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि