आदिवासी छात्राओं को संगठित गिरोह ने बनाया शिकार

मध्य प्रदेश आदिवासियों के उत्पीड़न को लेकर समय-समय पर सुर्खियों में रहता है। कुछ समय पहले यहां एक भाजपा नेता द्वारा आदिवासी व्यक्ति के सिर पर पेशाब करने का मामला सुर्खियों में रहा। मौजूदा मामला आदिवासी छात्राओं का है।

एक गैंग जो आवाज बदलकर (महिला की आवाज में) आदिवासी छात्राओं को फोन करता था। अपना परिचय छात्रा के कॉलेज के किसी स्टाफ के तौर पर देता था। वह छात्रों को छात्रवृत्ति या अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने जैसी बातों से विश्वास में लेता थे। छात्राओं को इसका लाभ दिलवाने के बहाने किसी सुनसान जगह में बुलाकर उनके साथ रेप किया जाता था।

इस मामले में कई एफआईआर हुई। बृजेश प्रजापति, लवकुश प्रजापति, राहुल प्रजापति, संदीप प्रजापति चार आरोपियों को पकड़ा गया। आरोपियों ने स्वीकारा कि अब तक 7 घटनाओं को इस तरह से अंजाम दिया गया।

समाज में आदिवासी महिलाओं के साथ इस तरह संगठित अपराध पूंजीवादी व्यवस्था पर ही प्रश्न चिन्ह खडे करता है। जहां महिलाएं खासकर गरीब महिलाएं अभी तक सुरक्षित नहीं हैं। वह नित नये-नये ढंग से लम्पटों की हैवानियत का शिकार हो रही हैं।

आलेख

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।