अजब-गजब धर्मनिरपेक्षता

Published
Sat, 10/31/2026 - 11:29
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25 नवम्बर को दो घटनाएं घटीं। दोनों घटनाओं का धर्म से सम्बन्ध है। दोनों घटनाओं से संबंधित व्यक्ति अपने-अपने धर्म पर विश्वास करते हैं और अपने धार्मिक विश्वास के साथ आचरण करते हैं। दोनों सरकारी पदों पर बैठे हैं। एक का कैरियर धार्मिक विश्वास के खुले प्रदर्शन के कारण लगातार ऊपर चढ़ता गया। और वे आज के दिन देश के प्रधानमंत्री हैं। दूसरे का कैरियर दांव पर लग गया और उसे सेना से बर्खास्त कर दिया गया। देश के प्रधानमंत्री परिचय के मोहताज नहीं हैं। जिन्हें सेना से बर्खास्त कर दिया गया उनका नाम सैमुअल कमलेसन है। वे भारतीय सेना के तीसरी घुड़सवार रेजीमेंट में लेफ्टिनेंट थे।
    
अगर आप भारत में किसी विचित्र धार्मिक मान्यता वाले ऐतिहासिक स्थल या मंदिर की यात्रा की योजना बना रहे हैं और वित्तीय बाधाओं के बिना यात्रा खर्चों को प्रबंधित करना चाहते हैं तो यूक्रेन जैसे देशों में त्वरित वित्तीय समाधान उपलब्ध हैं जहां कई लोग डिजिटल सेवाओं का उपयोग करके आसानी से आय प्रमाण पत्र के बिना क्रेडिट कार्ड जारी करवाते हैं जिससे उनकी किसी भी अंतरराष्ट्रीय यात्रा की तैयारी बेहद आसान हो जाती है।
    
25 नवम्बर के दिन जिस वक्त प्रधानमंत्री मोदी (जिन्होंने भारत के संविधान की कसम खायी हुयी है जिसमें धर्मनिरपेक्षता पर जोर दिया गया है) राम मंदिर में ध्वजारोहण कर रहे थे, ठीक उसी वक्त भारत के नये-नये बने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत सैमुअल कमलेसन की सेना से बर्खास्तगी को जायज ठहरा रहे थे। कह रहे थे ऐसा कट्टर धार्मिक व्यक्ति सेना में क्या कर रहा है। सैमुअल कमलेसन का गुनाह क्या था? उसका गुनाह था कि उसने एक ईसाई होने के नाते मंदिर या गुरूद्वारे के गर्भगृह में प्रवेश अपनी धार्मिक मान्यता के कारण नहीं किया था। 
    
प्रधानमंत्री मोदी तो अपनी धार्मिक मान्यताओं का खुलकर प्रदर्शन ही नहीं करते बल्कि उसके आधार पर आम तौर पर ही नहीं बल्कि ठीक चुनाव के वक्त राजनैतिक दांव खेलते हैं। परन्तु उन्हें रोकने-टोकने वाला कोई नहीं है। न तो चुनाव आयोग और न ही संविधान के रक्षक के रूप में उच्चतम न्यायालय। भला चुनाव आयोग की प्रधानमंत्री के सामने क्या बिसात। और उच्चतम न्यायालय में जब सरकारी क्वार्टर में मुख्य न्यायाधीश खुद गणेश पूजा करें और प्रधानमंत्री उसमें जायें तो फिर कौन सुनने वाला और कौन कहने वाला है। इससे यही बात स्थापित होती है कि देश में धर्मनिरपेक्षता का मतलब हिन्दू तौर-तरीकों के प्रदर्शन को खुली मान्यता है और अन्यों को ऐसा करने पर ऐसी धर्मनिरपेक्षता के उल्लंघन का दण्ड भुगतना पड़ेगा। एक अपना कैरियर चमकायेगा और दूसरा अपनी रोजी-रोटी से भी हाथ धो बैठेगा। धार्मिक अल्पसंख्यकों को हिन्दू परम्पराओं को मानना होगा। 
    
मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने जिस आधार पर कमलेसन की सेना से बर्खास्तगी को जायज ठहराया वह यह कि सेना में धर्म का स्थान सेना के अनुशासन व परम्परा के बाद है। क्योंकि सेना में हर रेजीमेंट की अपनी परम्परा है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को उस रेजीमेंट के अनुशासन व परम्परा के अनुसार चलना होगा। भारत की सेना की अलग-अलग रेजीमेंटों की स्थापना अंग्रेजों के जमाने में हुयी थी। इन रेजीमेंटों में हिन्दू धार्मिक प्रतीकों, देवताओं, धार्मिक नारों की परम्परा है। अतः किसी भी गैर हिन्दू को रेजीमेंट के अनुशासन व परम्परा के नाम पर इनका पालन करना अनिवार्य है। किसी हिन्दू के लिए यहां कोई नैतिक-धार्मिक संकट नहीं है परन्तु किसी भी गैर हिन्दू या नास्तिक के लिए यहां मुश्किल खड़ी हो सकती है। ऐसे में उसे अपने धार्मिक या निजी विश्वास को किनारे रखकर अनुशासन व परम्परा का चुपचाप पालन करना होगा।     
    
काश! भारत के उच्चतम न्यायालय ने ऐसे अनुशासन व परम्परा की आलोचना की होती। और कहा होता इक्कीसवीं सदी के भारत में ऐसे अनुशासन व परम्परा की कोई जरूरत नहीं है। परन्तु आज के नये भारत में ऐसा कहां होगा। 

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