अजब-गजब तमाशा

Published
Fri, 01/16/2026 - 07:03
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पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे निकट आते जा रहे हैं वैसे-वैसे मोदी-शाह की चुनाव मशीनरी पूरी तरह से सक्रिय हो गयी है। इस चुनाव मशीनरी का हिस्सा सिर्फ उनकी पार्टी के नेता व कार्यकर्ता ही नहीं है बल्कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व उसके अनुषंगी संगठन, केन्द्र सरकार की ईडी, सीबीआई जैसी एजेन्सियों के साथ चुनाव आयोग व राष्ट्रीय मीडिया भी है। 
    
पिछली बार ठीक चुनाव के पहले मोदी जी ने गुरू रवीन्द्र नाथ टैगोर का रूप धरा था पर वह काम नहीं आया था। इस बार दांव वंदेमातरम् पर लगाया पर यह मिसाइल चलने के पहले फुस्स हो गई। पं.बंगाल चुनाव के पहले मोदी कौन सा रूप धरते हैं यह देखना कम दिलचस्प नहीं होगा। और इसके बीच उनके ‘‘चाणक्य’’ ने अपनी कुटिल चालें तो काफी लम्बे समय से चली हुई हैं। ईडी का राजनीतिक रणनीति बनाने वाली नामी-गिरामी कम्पनी ‘आई-पैक (I-PAC) (यह कम्पनी पहले प्रशांत किशोर की थी) के दफ्तर में छापा इसी कुटिल चाल का हिस्सा था। ‘‘तू डाल-डाल मैं पात-पात’’ की तर्ज पर ममता बनर्जी ने ई डी की कार्रवाई के दौरान ऐसा छापा मारा कि अमित शाह के सरकारी गुर्गों की हालत रंगे हाथ पकड़े चोर की सी हो गयी। खूब तमाशा हुआ। ममता बनर्जी ने शाह को उसी भाषा में जवाब दिया जो भाषा अक्सर वे स्वयं इस्तेमाल करते हैं। फिर तो जितने नेता शाह के ठगे व सताये हुए हैं, वे एक साथ बोल उठे कि ममता बनर्जी तो बंगाल की शेरनी हैं। हुआ भी कुछ ऐसा ही कि शिकारी खुद शिकार बन गये। रोने-धोने लगे। कोर्ट-कचहरी करने लगे। 
    
इधर ईडी कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंची उधर  ममता बनर्जी भी पहुंच गयी। जो हाल सड़कों में था वही हाल कोर्ट में भी हुआ। हल्ला-गुल्ला, शोर-शराबा और जज साहिबा हाईकोर्ट से चली गयी। जब तक कुछ फैसला-वैसला आयेगा तब तक ममता बनर्जी अमित शाह की कुटिल चालों का जवाब पूरी कुटिलता से देने के लिए नया खेल शुरू कर देंगी। 
    
यह तमाशा चुनाव तक पूरे जोर-शोर से चलने वाला है इसका अंदाजा जनवरी के दूसरे हफ्ते में ही हो गया। अब रही बात बंगाल की मजदूर-मेहनतकश जनता की तो फिलहाल उसका खूब मनोरंजन हो रहा है। सांप-नेवले के खेल का वो मजा ले रही है। सांप जीतेगा तो डसेगा। और नेवला जीता तो उसको कुछ खास तो नहीं मिलेगा। बस लगेगा चलो सांप के डसने से तो बचे। 
    
खैर! कोई दिन आयेगा जब बंगाल की मजदूर-मेहनतकश जनता जागेगी। बीसवीं सदी में आजादी की लड़ाई के दिनों का बंगाल फिर किसी दिन जागेगा। सांप-नेवलों के चक्कर में नहीं फंसेगा। 

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।