अंग्रेज मजदूर वर्ग का कवि मीड -फ्रेडरिक एंगेल्स

Published
Sun, 08/16/2026 - 15:50
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अर्द्ध-दास का स्वामी ऐसा बर्बर आदमी होता था जो मवेशियों के मुखिया को ही खलनायक मानता था; कर्मियों को काम पर रखने वाला मालिक तो सभ्य माना जाता है और जिन ‘आदमियों’ को वह काम पर रखता है उन्हें वह मशीन मानता है। संक्षेप में, दोनों की स्थिति लगभग एक ही जैसी है, और अगर उनमें से कोई भी अधिक खराब स्थिति में है तो वह स्वतंत्र मजदूर है। गुलाम वे दोनों ही होते हैं- एकमात्र अन्तर उनकी स्थिति में यह है कि एक की गुलामी पाखण्ड के आवरण में लिपटी नहीं है, खुली है, साफ है; और दूसरे की चालाकी के आवरण में लिपटी धूर्ततापूर्ण, छद्मवेशी, स्वयं उससे तथा सबसे कपटपूर्वक छिपाई हुई है, यह पाखण्ड में लिपटी ऐसी गुलामी है जो पुरानी से भी बदतर है। लोकोपकारी टोरियो ने कर्मियों को जब सफेद गुलाम नाम दिया था तो वे सही थे। परन्तु, पाखण्डपूर्वक छिपायी गयी यह गुलामी, कम से कम बाहरी तौर से, स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकार करती है; स्वतंत्रता-प्रेमी जनमत के सामने माथा झुकाती है। पुरानी गुलामी की तुलना में जो ऐतिहासिक प्रगति हुई है वह इसी चीज में परिलक्षित होती है कि स्वतंत्रता के सिद्धान्त को अब स्वीकार कर लिया गया है, और वह दिन दूर नहीं है जब उत्पीड़ित लोग इस सिद्धान्त को व्यवहार में कार्यान्वित कराकर ही मानेंगे।’’
    
अन्त में, एक कावेता के कुछ बन्द दिये जा रहे हैं जो फैक्टरी प्रणाली के सम्बन्ध में स्वयं मजदूरों की मनोभावनाओं को व्यक्त करते हैं। बर्मिंघम के (कवि) एडवर्ड पी. मीड द्वारा लिखी गयी इस कविता में जो विचार प्रस्तुत किये गये हैं वे मजदूरों के विचारों की सही-सही अभिव्यक्ति करते हैं।

एक राजा है, क्रूर और निर्मम राजा,
नहीं कवि के सपनों वाला राजा;
दारुण निरंकुश राजा जानते हैं सफेद गुलाम जिसे
भाप है नाम बेरहम इस राजा का।

भुजा है उसके एक, लौह भुजा, 
और है यद्यपि एक ही वह, 
जादू-जैसी ऐसी शक्ति है उसमें 
कर दिया तबाह न जाने कितनों को जिसने!

कराल प्राचीन मोलोश के पुरखे की तरह 
हिम्मोन की घाटी में रहता था खड़ा जो, 
अंतड़ियां हैं प्रज्ज्वलित लपटों-जैसी उसकी, 
और नन्हे-नन्हे बच्चे हैं प्रिय खुराक उसकी।

भूखे भेड़िये हैं पण्डे-पुरोहित उसके, 
खून के प्यासे, दम्भी और उद्दण्ड; 
वही चलाते भीम उसकी उस भुजा को, 
बदल देती सोने में जो इन्सानी खून को!

कुत्सित लिप्सा के मारे बांध देते हैं वे 
प्रकृति के सारे अधिकारों को लौह जंजीरों में; 
हंसते-मखौल उड़ाते स्त्रियों के दुख-दर्दों का, 
पुरुषों के आंसुओं के प्रति हैं वे अन्धे।

श्रम-पुत्रों की आहें-कराहें हैं 
उनके कानों का संगीत मधुर; 
मंडराती रहतीं प्रेतात्माएं युवकों-युवतियों की 
राजा भाप के नर्क में उस भयंकर!

बने जो नर्क राजा भाप के कारण 
फैला दिया साम्राज्य उन्होंने नैराश्य का; 
होती है हत्या क्योंकि क्षण-क्षण उसमें, 
मानवी तन-मन की बना था जो स्वर्ग की खातिर।
 

(साभार: ‘इंग्लैण्ड में मजदूर वर्ग की दशा’, फ्रेडरिक एंगेल्स)

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