ट्रम्प सरकार द्वारा वैश्विक चिकित्सा अनुसंधान सहयोग में कटौती
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी साम्राज्यवाद को बेहद आक्रामक रुख प्रदान कर रखा है। उनकी विदेश नीति दीर्घकालिक हितों के लिए तात्कालिक
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी साम्राज्यवाद को बेहद आक्रामक रुख प्रदान कर रखा है। उनकी विदेश नीति दीर्घकालिक हितों के लिए तात्कालिक
वेनेजुएला के तेल पर अमेरिकी कब्जे को सुनिश्चित करने के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने क्यूबा की घेराबंदी बढ़ा दी है। क्यूबा को अभी तक वेनेजुएला से सस्ता तेल सप्लाई होता र
लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?
इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं
हांगकांग (चीन) और लास वेगास (अमेरिका) पूंजीवादी दुनिया के चमचमाते शहरों में से हैं। हांगकांग लगभग एक शताब्दी से प्रमुख औद्योगिक-व्यापारिक केन्द्र रहा है। वहीं लास वेगास आ
अस्तु, अमरीकी साम्राज्यवादी इस समय जो कुछ कर रहे हैं वह नया नहीं है। तब फिर कुछ लोगों को यह नया क्यों लग रहा है? क्यों उन्हें साम्राज्यवाद की वापसी होती दीख रही है?
कनाडा के प्रधानमंत्री ने ये सारे तर्क यूरोपीय साम्राज्यवादियों को झकझोरने के इरादे से दिये थे। कनाडा के प्रधानमंत्री की इन बातों ने तालियां तो बटोरीं लेकिन यूरोपीय साम्राज्यवादी अमरीकी साम्राज्यवादियों के समक्ष तत्काल डटकर खड़ा होने की स्थिति में नहीं थे।
ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान, 2019 में पहली बार ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा व्यक्त की थी। यह द्वीप 300 वर्षों से डेनमार्क का हिस्सा रहा है, और डेनमार्क और ग्रीन
अमेरिकी सरगना डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने नेतृत्व में एक नये संगठन का एलान किया है। इस संगठन का नाम ‘बोर्ड आफ पीस’ रखा गया है। गाजा शांति पहल के लिए पहले इस तरह के मंच की रूपर
नये वर्ष 2026 की शुरूआत के साथ अमेरिकी सरगना ट्रम्प ने नया चोला पहन लिया है। उसने ‘शांति दूत’ का अपना पुराना स्वघोषित चोला उतार कर क्रूर हत्यारे का रूप धर लिया है। वैसे त
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।
शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।
जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है
हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।