अपनी जनता चुनती सरकार

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जिस सरकार को जनता ने चुना आज वही सरकार जनता को चुन रही है। सरकार दिल्ली में मस्ती में बैठी है और जनता खुद को जनता साबित करने की कवायद में जुटी है। चुनाव आयोग ने लगभग आधे देश को (12 राज्यों में एस आई आर प्रक्रिया चल रही है) कागजों की भाग दौड़ में झोंक दिया है। इस भागदौड़ में जो सबसे ज्यादा परेशानहाल हैं वे हैं मजदूर-अल्पसंख्यक-आदिवासी- महिलायें।
    
मजदूर अपने काम का हर्जा कर, छुट्टी लेकर अपने कागजात बनवाने, 2003 की सूची में नाम तलाशने में जुटे हैं। अल्पसंख्यक आबादी सरकार द्वारा नागरिकता से वंचित किये जाने के भय में जी रही है। महिलायें अपने मायके का चक्कर लगा अपने माता-पिता का नाम 2003 की वोटर लिस्ट में तलाश रही हैं। वहीं आदिवासी जन-ट्रांसजेण्डर-अनाथ तो कागजों की इस होड़ में सबसे अधिक परेशान हैं। बहुतों के पास आधार कार्ड हैं पर वोटर कार्ड नहीं। खुद 2003 की सूची में नाम ढूंढना भी किसी सजा से कम नहीं। आप 2003 के अपने पोलिंग बूथ को याद करके ही अपना नाम ढूंढ सकते हैं। किसी के मां-बाप यदि मर चुके हों तो बेटों को मां-बाप का पोलिंग बूथ जानने के लिए आधी विधानसभा खंगालनी पड़ रही है। 
    
परेशान यदि आम जनता है तो बीएलओ भी कम परेशान नहीं हैं जो इस अभियान के जमीनी सिपहसालार हैं। वे ऐसे सिपाही हैं जिनके हाथ में तलवार तो थमा दी गयी है पर उसे चलाना नहीं सिखाया गया है। कल तक प्राइमरी स्कूलों में छात्रों को पढ़ाने की नौकरी कर रहे शिक्षक अचानक बी एल ओ बन वोटर लिस्ट को हाथ में ले घर-घर मतदाता तलाशने में जुटे हैं। कभी कम्प्यूटर की जानकारी न रखने वाले कम्प्यूटर के आगे बैठ फार्म अपलोड कर रहे हैं। ऊपर से चुनाव आयोग व सरकार का काम जल्दी पूरा करने का दबाव उनकी रातों की नींद हराम कर रहा है। एक ओर सरकार-चुनाव आयोग उसे धमका रहा है तो दूसरी ओर परेशान हाल जनता उसे गरिया रही है। इस तनाव में बेचारे बी एल ओ अगर बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं तो ये दरअसल आत्महत्या नहीं चुनाव आयोग द्वारा की गयी हत्यायें हैं। 
    
दर्जनों बी एल ओ की जान लेने के बाद चुनाव आयोग का घमण्ड कुछ टूटा है। उ.प्र. सरीखे राज्यों में उसे अपनी समय सीमा बढ़ानी पड़ी है। स्वीकारना पड़ा है कि दरअसल उसकी महीने भर में सबके फार्म भरने की योजना ठीक नहीं थी। 
    
अभी अगले 2 माह यह अफरा तफरी आधे भारत में जारी रहनी है। सरकार के जनता चुनो अभियान में जनता में अपना नाम लिखाने से जो वंचित रह जायेगा उसके लिए योगी सरकार डिटेंशन सेंटर की बातें कर पहले ही खौफ पैदा कर चुकी है। 
    
बिहार में लाखों नाम कटने के बाद अब आधे देश से कुछेक करोड़ नाम कटने का अनुमान है। इन्हें जनता की-मतदाता की सूची से बाहर कर मोदी सरकार क्या लक्ष्य पाना चाहती है। यह किसी को नहीं पता। खुद सरकार को भी नहीं पता। उसे तो बस खुद को मनमाने ढंग से मुसलमानों के एक हिस्से को घुसपैठिया बता हिन्दू आबादी में भय पैदा करना है। और इतनी कवायद से तो वो समूची जनता को ही भय के साये में धकेल रही है। 
    
फासीवादी हुकूमत की यह कवायद दरअसल कागजों के सहारे जनता चुनने की कवायद है जिसके शिकार लाखों-करोड़ों मेहनतकश जन बनने हैं। जरूरत है कि हुकूमत की इस कवायद को रद्द करने के साथ जो भी भारत में रहता है उसके नागरिकता अधिकार की मांग की जाये।  

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