असम: बुलडोजर से आशियाने गिराती सरकार

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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18 व 19 अक्टूबर को असम की हिमंता सरमा सरकार ने नागांव, होजाई और गोलाघाट में बुलडोजर कार्रवाही की और आरक्षित वनों में अतिक्रमण व घुसपैठियों के नाम पर 1100 घरों को तोड़ दिया। लोग रोते-बिलखते रहे लेकिन संघ-भाजपा की हिमन्ता विस्वा सरमा के शासन-प्रशासन और पुलिस का दिल नहीं पसीजा। अपनी जिंदगी भर की कमाई और छत छिनने ने इन लोगों को सड़क पर ला पटका है। अतिक्रमण के नाम पर आज बुलडोजर से किसी घर को, बस्तियों को उजाड़ना भाजपा सरकारों और उनके मुख्यमंत्रियों का प्रिय शगल बन चुका है। योगी को तो ‘बुलडोजर बाबा’ ही कहा जाने लगा है। 
    
असम में जो घर ढहाये गये वे अधिकांश मुसलमान परिवार हैं। यह लोग मेहनत मजदूरी करके जैसे-तैसे अपना गुजारा कर रहे थे। लेकिन असम की संघी सरकार को यह मंजूर नहीं था। और उनका तो एजेंडा ही है कि मुस्लिमों के घरों, मस्जिदों को तोड़ो और समाज में ध्रुवीकरण करो, हिंदू आबादी का तुष्टिकरण करो और सत्ता हासिल करो। मुसलमान के नाम पर लोगों को उजाड़ना संघ-भाजपा के लिए ज्यादा आसान हो जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि ऐसा केवल मुसलमानों के साथ हो रहा है बल्कि व्यापक गरीब हिन्दू आबादी भी इनकी बुलडोजर कार्यवाही का शिकार बन रही है। 
    
कहीं-कहीं तो यह भी हुआ है कि जमीन पर मालिकाना होने के बावजूद लोगों के घर तोड़ दिये गये। ऐसा कानून का सहारा लेकर किया गया। दरअसल किन्हीं गरीब परिवारों ने अपनी कृषि भूमि में ही रहने के लिए मकान निर्माण कर लिया था। कानून के अनुसार कृषि भूमि का उपयोग किसी अन्य कार्य में करने के लिए पहले उसका भू उपयोग बदलना पड़ता है। लेकिन गरीब होने के कारण वे उतना पैसा नहीं दे सकते जिससे वे कृषि भूमि को आवासीय उपयोग हेेतु बदल सकते। और इसका परिणाम उनके घरों को उजाड़ने के रूप में निकला।
    
एक तरफ पर्यावरण के नाम पर वनों का विस्तार कर, नये-नये नियम बनाकर उनको आरक्षित वन घोषित कर वहां रह रही आबादी को उजाड़ने का काम राज्य सरकारें कर रही हैं वहीं दूसरी तरफ उन जंगलों में पर्यटन के नाम पर होटल, रिसोर्टों को खोलने का काम भी सरकारें कर रही हैं। इन होटलों/रिसोर्टों से निकलने वाले कूड़े-कचरे और पर्यटकों द्वारा फेंके गये कचरे से जंगली वातावरण को हो रहे नुकसान पर वे चुप रहते हैं। 
    
दरअसल सामंती जमाने में भूमि पर सामंतों का कब्जा होता था। और पूंजीवादी समाज में जमीन और सारे संसाधन पूंजीपति वर्ग के होते हैं। पूंजीवादी सरकारें बस उसका प्रबंधन करती हैं। पूंजीपति वर्ग को जब और जहां जरूरत होती है उसे कोड़ियों के भाव जमीन उपलब्ध हो जाती है। जिस समय असम के गरीब मुसलमानों को आरक्षित वन भूमि के नाम पर उजाड़ा जा रहा है उसी समय अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को अडाणी को सौंपा जा रहा है। उससे पहले छतीसगढ़ के जंगलों को उसके हवाले कर दिया गया। और उससे पहले टाटा, मित्तल जैसे पूंजीपतियों को जंगलों में मौजूद अथाह खनिजों को उनके हवाले कर जंगलों को खत्म किया जाता रहा है।

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