बैल्डर

Published
Wed, 09/16/2026 - 15:50
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धर्मेन्द्र! ड्यूटी नइखे आवत का रे? धीमी होती साइकिल की रफ्तार। ट्रिन-ट्रिन की घंटी ने धर्मेन्द्र की एकाग्रता को तोड़ा। एक तेज आवाज कानों में पड़ी ये पण्डित श्री हैं जो ड्यूटी जा रहे हैं। ‘‘तू चल.., हम आवतानी’’ जवाब आया।
    
अभी पिछली रात का असर खून में बाकी है। शरीर बेजान हुआ जाता है। इन सब का बस एक ही इलाज है ‘एक बोतल देना’ दो पल्लों वाला लकड़ी का दरवाजा आधा खुला है जिसमें कुर्सी डालकर अधेड़ महिला भीतर बैठकर शिफ्ट छूटने का इंतजार कर रही है। 
    
पचास रुपये का नोट सावधानी से देखती है और दराज में रख देती है। हल्के पीले रंग की कच्ची शराब दो अलग-अलग थैलियों में भरकर धमेन्द्र बाहर आ चुका है। इसे पीने के लिए गिलास की जरूरत नहीं होती। जेब में रखी दूसरी थैली अलग नजर आ रही है। ‘‘चलो पहले गुटखा खा लूं’’ दुकान पर रुका ही थाा जब पण्डित जी ने आवाज दी थी। 
    
गुटखा खत्म हुआ। सिगरेट पी ली गयी। अभी पन्द्रह मिनट बचे हैं ड्यूटी के। रह-रहकर जेब में रखी थैली पर ध्यान जा रहा है। अंततः प्यास की जीत हुई। थैली का सारा जैव रस अब धर्मेन्द्र के भीतर था। ‘‘गई आज की ड्यूटी भी, ला एक गुटखा दे।’’ कहता हुआ धर्मेन्द्र अपने मोबाइल में खो गया। 
    
आज पांच दिन हो गये धर्मेन्द्र को ड्यूटी आए। ‘‘देखना एच आर भगा देगा’’ पिचके गाल वाले रवि ने पण्डित जी को कहा। 
    
भक बुड़बक ‘‘बेल्डर के पगार के केतना होला, मालूम नइखे? बीस हजार के आदमी के बारह हजार में मिल जाई। त कंपनी का पागल बा कि अइसन मजदूर के भगाई। 

रवि- हम्म! सही कहा पण्डित जी। पर इसका घर कैसे चलता है। 7-8 हजार रुपये उठाता है हर महीने। 3-4 हजार की दारू पी जाता है। फिर कैसे? 

पण्डित जी- एकर बाबूजी ए घर के सगरी खरचा चलावेलन। 

रवि- हर महीने जब भी तनख्वाह मिलती है तो 5-6 दिन पेट भरकर दारू पीएगा फिर 22-25 दिन बंद। हर महीने का यही है। 

पण्डित जी- छोड़ा हो महाराज, ओकर पीछे काहे माथा खपाई। ओकर गृह-गिरहस्थी, ओ ही देखेला। चल. तानी हो, जरा एगो काम का, निपटा के आवतानी। 
    
अक्सर जब बैल्डिंग का काम नहीं होता तो कुछ न कुछ दूसरे काम में धर्मेन्द्र को लगा दिया जाता। आज धर्मेन्द्र कट्टे भरने में लगा है। 

मोहन- इस बार कितने पैसे उठ गए दारू में। माल चैक करते-करते मोहन ने पूछा।

धर्मेन्द्र- अब क्या बताऊं पहाडी भाई, बस 5 हजार रुपये बचे हैं जेब में। करीब 4 हजार उठ गये। कहता हुआ धर्मेन्द्र हंस पड़ा। 
धर्मेन्द्र, मोहन को पहाड़ी भाई कहकर बुलाता है। 
    
मोहन के साथ बात करना धर्मेन्द्र को पसंद है। खास वजह यह है कि मोहन के पास धर्मेन्द्र को बताने को वो बातें हैं जो उससे कभी कोई नहीं करता। न ही कभी अपमानित ही महसूस होता। अब तो घरवाली भी मायके चली गयी है क्यों? अब मजा आ रहा है अकेले में’’।
    
हां अब आप भी दो ताने! कहता हुआ धर्मेन्द्र चुप हो गया। पहाड़ी भाई तुमने जो कहा था सच साबित हुआ। अब बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा है। घर की खामोशी काटने को आती है। कोई रोक-टोक नहीं है फिर भी दारू पीने का मन नहीं करता। एक हताशा और हार की अभिव्यक्ति धर्मेन्द्र की आंखों में उतर आई। 
    
आज कई घण्टे दोनों के बीच गहरी बातचीत हुई। पहाड़ी भाई पता नहीं क्यूं जब भी तुम कुछ कहते हो तो तुम्हारी बात मानने का मन करता है। अंदर से एक आवाज आती है कि सब कुछ अच्छा हो सकता है। कमी है तो मेरे भीतर है। कुछ देर की खामोशी। पत्नी मायके में है तो यही आजादी आज मरघट की शांति समान है। आज की ड्यूटी खत्म होने तक धर्मेन्द्र प्रण ले चुका है। 
    
घटना को बीते काफी समय हो गया है। हर महीने फोकट की शराब पीने वाले धर्मेन्द्र में आए इस बदलाव से कम्पनी दुखी है। 20 हजार रुपये की एकमुश्त रकम हर महीने धर्मेन्द्र के जीवन में आए बदलाव की कहानी कहती है। 
    
आज बड़े बेटे का जन्मदिन है। पहाड़ी भाई को विशिष्ट रूप से रात के खाने का न्यौता है। ठक-ठक दरवाजे पर दस्तक हुई। औपचारिक परिधान में श्रीमती जी ने दरवाजा खोलकर स्वागत किया।
    
आप पहाड़ी भाई हैं न? कहती हुई पांव छूती है। धर्मेन्द्र घर के भीतर रात के खाने की व्यवस्था में लगा है। पहाड़ी भाई नीचे बैठें या छत पर? मोहन जानते हैं कि किस चीज की तरफ इशारा हो रहा है। 
    
‘क्या बात है राॅयल स्टैग’। मोहन के चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट उतर आती है। ‘हां पहाड़ी भाई एक बार आपके साथ बैठना था। मैडम ने भी कई बार कहा कि जन्मदिन पर पहाड़ी भाई को जरूर बुलाना।’ आपसे मिलकर खुश है।’
    
करीब 12 बजे पार्टी समाप्त हुई। पूरा परिवार एक साथ खाने की मेज से उठा। गुडबाय बोलने के लिए मियां-बीबी दरवाजे पर खड़े हैं। 
    
‘अइसन लागेला परदेश में आपन बड़का भइया मिल गइल होखे’। श्रीमती जी ने स्वीकृति में सर हिलाया। दो जोड़ी आंखें कृतज्ञता में साइकिल सवार को देखती रहीं। धीरे-धीरे एक साया आंखों से ओझल हो गया।
    
‘चल..अब सुत जाई। विहार ड्यूटी जाय के बा’। हम्म, श्रीमती जी ने बिना कुछ कहे हामी भरी। मजबूत लोहे में दरार पड़ी हुई है। जिस पर किसी ने पिघलाकर बैल्डिंग से लोहा भर दिया है। लोहा फिर से मजबूत हो चुका है। 
    
उस उजले प्रकाश में पहाड़ी भाई दिखाई दिए तभी आंख खुली। हां, सपना देख रहा था। चलो यार ड्यूटी जाना है। कहता हुआ धर्मेन्द्र बिस्तर से उठ गया।             -पथिक 

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