ब्रिक्स की कमान थामे अमेरिका परस्ती

Published
Sat, 05/16/2026 - 15:50
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इस वर्ष के लिए ब्रिक्स की कमान भारत के हाथों में है। और इसी वर्ष भारत सरकार अमेरिकापरस्ती के नये-नये रिकार्ड कायम कर रही है। ब्रिक्स रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों के नेतृत्व में पश्चिमी साम्राज्यवादियों के प्रभुत्व को कमजोर करने को बनाया गया मंच है। इस वर्ष भारत को सितम्बर माह में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करनी है। पर खुद भारत सरकार की बढ़ती अमेरिका परस्ती उसे ब्रिक्स से दूर ले जा रही है। 
    
अमेरिका-ईरान युद्ध के मसले पर भारत सरकार के रुख ने उसे ब्रिक्स गठबंधन में और अलग-थलग कर दिया है। जहां रूसी-चीनी साम्राज्यवादी इस युद्ध में ईरान के साथ खड़े थे वहीं भारतीय शासक इजरायल व अमेरिका से रिश्ते प्रगाढ़ कर रहे थे। 
    
हाल में ही 23-24 अप्रैल को ब्रिक्स की मध्य पूर्व व उत्तरी अफ्रीका के उप विदेश मंत्रियों की बैठक बगैर किसी सामूहिक घोषणा के सम्पन्न हो गयी। बहुध्रुवीयता की वकालत करने वाला यह मंच अपने सदस्य ईरान से जुड़े संकट पर संयुक्त वक्तव्य तक जारी करने की स्थिति में नहीं है। अब मंत्रीस्तरीय ब्रिक्स की होने वाली बैठक का भी ऐसा ही हश्र होने की संभावना है। 
    
ईरान ब्रिक्स का सदस्य देश है। उसे इजरायली-अमेरिकी हमले के वक्त ब्रिक्स से समर्थन की उम्मीद थी पर ओपेक से हाल में अलग हुए यू ए ई को अमेरिका-इजरायल के प्रति कड़े शब्दों के इस्तेमाल से विरोध था। भारत का रुख भी गोलमाल शब्दों के इस्तेमाल से टालमटोल वाला था। ऐसे में ब्रिक्स का मंच कोई साझा बयान ईरान के पक्ष में जारी नहीं कर पाया। 
    
ब्रिक्स के सदस्य देश पर हमला होने, उसके शीर्ष नेताओं की हत्या होने पर भी ब्रिक्स का बयान तक जारी न कर पाना इसके भीतरी अंतरविरोधों के तीखे होने को दिखाता है। इस अंतरविरोध को बढ़ाने में भारतीय शासकों की खास भूमिका है जो अमेरिका के साथ व्यापार, रक्षा व रणनीतिक साझेदारियां बनाने में जुटे हैं। ईरान के साथ सालों के सांस्कृतिक-कूटनीतिक सहयोग को इन्होंने एक झटके में दांव पर लगा दिया। 
    
भारत का यह अमेरिकापरस्त रुख उसे ब्रिक्स के हाशिये पर पड़ा गैर जरूरी सदस्य बनाता जा रहा है। चीनी साम्राज्यवादी ब्रिक्स में केन्द्रीय भूमिका अपनाते जा रहे हैं। चीन द्वारा ब्रिक्स को डालर का वर्चस्व कम करने के मंच के रूप में पेश करना हो या फिर टैरिफ का प्रत्युत्तर देना हो, सब मामलों में भारत का रुख ब्रिक्स से अलग होता जा रहा है। 
    
यहां तक कि ट्रम्प द्वारा बारम्बार अपमानित किये जाने के बावजूद भारतीय शासक अमेरिकापरस्ती बढ़ाते जा रहे हैं। भारत को नरक का दर्जा देना, भारतीय नागरिकों को हथकड़ी लगाकर भारत भेजना, भारत को रूस ईरान से तेल न खरीदने के लिए धमकाना, भारत-पाक युद्ध रुकवाने का बारम्बार श्रेय लेना, भारत पर भारी टैरिफ थोपना आदि हरेक मामले में ट्रम्प ने भारतीय शासकों को नीचा दिखाने को काम किया। 
    
पर मोदी सरकार एक बार भी ट्रम्प को उत्तर देने तक की हिम्मत नहीं कर पायी। ऊपर से टैरिफ घटाने की एवज में उसने भारतीय किसानों के हित तक दांव पर लगा दिये। 
    
अमेरिकी दबाव में आना एपस्टीन फाइल में मोदी के नाम आने भर का मामला नहीं है। यह भारत के एकाधिकारी पूंजीपतियों व संघ-भाजपा के रुख का मामला अधिक है। संघ-भाजपा हमेशा से ही घोर अमेरिकापरस्त रहे हैं और भारत की बड़ी पूंजी अमेरिका से अलग हो अपने हित सधते नहीं देख पा रही है। 
    
ऐसे में भारत की विदेश नीति साम्राज्यवादियों के बीच बढ़ते टकराव का लाभ उठा अपनी स्वतंत्रता बरकरार रखने के बजाय अमेरिकी पाले में खड़े होने की ओर बढ़ती जा रही है। यह नीति भारतीय शासकों को इजरायल-अमेरिका के कुकर्मों में भागीदाार बना रही है। यह फिलिस्तीनी मुक्ति के प्रति भारतीय समर्थन को काफी कमजोर कर चुकी है। 
    शासक भले ही अमेरिकापरस्ती में डूबे हों पर भारतीय जनता ट्रम्प के द्वारा किये हर अपमान का प्रतिकार करेगी। फिलहाल ब्रिक्स में अपनी इस विदेश नीति के चलते भारतीय शासक अपनी स्थिति असहज करने के साथ पुराने दोस्तों को दुश्मन बनाने की ओर ले जा रहे हैं। 

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