डरा हुआ शासक वर्ग और उसका तंत्र, लेकिन मजदूर को बिन लड़े उसका अधिकार नहीं देगा

Published
Wed, 04/01/2026 - 15:50
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मैं पिछले 3 दिन में 2 बार गिरफ्तार हुआ। 13 मार्च को हम बवाना औद्योगिक क्षेत्र के बंगाली चौक पर मजदूरों से गैस की समस्या को लेकर बात कर रहे थे और उनको गैस की समस्या के लिए आंदोलन के लिए सूचित कर रहे थे। मजदूर अपनी-अपनी समस्या बता रहे थे। एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि उन्होंने 2 दिन चूड़ा (चावल का एक सूखा आइटम, जो ज्यादातर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में खाया जाता है) खाकर गुजारा किया। आज उन्होंने 1200 रुपए में 2 किलो गैस भरवाई है। उसकी आंखों में आंसू थे। एक महिला ने 500 रुपए प्रति किलो गैस की बात कही। उसकी आंखों में भी आंसू थे। उसने माइक से भी बोला, उसके गले से आवाज नहीं निकल पा रही थी। काफी मजदूरों ने समस्या बताई। 400 रुपये से लेकर 600 रुपए प्रति किलो गैस का रेट पता चला। इस रेट के बाद भी गैस के लिए मजदूरों को भटकना पड़ रहा था। हम शाम 5 बजे से प्रचार कर रहे थे कि कल शनिवार को एजेंसी चौक पर मिलेंगे। वहां पर बवाना विधायक का आफिस है उससे बात करेंगे। बवाना औद्योगिक क्षेत्र में एक हेल्पर से न्यूनतम वेतनमान 18,456 रुपये की जगह 7 से 9 हजार में काम करवाया जा रहा है। और आपरेटर से 22,411 रुपये की जगह 10 से 15 हजार रुपये में काम करवाया जा रहा है। और 12 घंटे की बात की जाए तो, एक हेल्पर को दिल्ली के न्यूनतम वेतन के अनुसार और डबल ओवरटाइम के तहत 36,912 रुपए वेतन मिलना चाहिए और मिलता है 9 से 13 हजार रुपये। यानी लूट 23 से 27 हजार रुपये प्रति महीना प्रति मजदूर।
    
और आपरेटर की बात की जाए तो उसको 12 घंटे का मिलना चाहिए। 44,822 रुपये लेकिन मिलता है 14 हजार रुपये से लेकर 18 हजार रुपये तक। यहां भी लूट 22 हजार से लेकर 30 हजार रुपये प्रति महीना प्रति मजदूर।
    
इतना सब होने के बावजूद इसी मजदूर से 8 से 10 रुपए प्रति यूनिट बिजली का खर्च वसूला जाता है जबकि दिल्ली में एक परिवार के लिए 200 यूनिट बिजली फ्री है। लेकिन सबसे गरीब मजदूरों से कमर्शियल रेट पर या उससे भी ज्यादा वसूला जाता है। अब युद्ध की कीमत भी इसी मजदूर से वसूली जाएगी। एक व्यक्ति को पाइपलाइन या कापी से गैस मिल रही है। 914 रुपये प्रति 14.2 किलो या इसके आस-पास। एक व्यक्ति जिसके पास बड़ा सिलेंडर है उसको 2 से 3 हजार में ब्लैक में सिलेंडर मिल जाएगा और इस गरीब बदनसीब से वसूला जाएगा 6 हजार से 8500 रुपए प्रति सिलेंडर। क्योंकि वह किलो में गैस भरवाता है। क्योंकि इस मजदूर के पास 3 या 4 किलो का यानी छोटा सिलेंडर होता है।
    
हमने क्या गुनाह किया? यह कि ऐसे मजदूरों को शिकायत करने के लिए हम 14 मार्च (शनिवार) को विधायक के बवाना आफिस के पास बुला रहे थे। यहां ज्यादातर मजदूरों की शनिवार को छुट्टी रहती है।
    
शाम को 6 बजे के करीब दो पुलिस वाले सिविल ड्रेस में आते हैं और हमारा माइक बंद करवा देते हैं और दूसरी गाड़ी में पुलिस वालों को बुला लेते हैं। उसमें से एक पुलिसवाला मुझे जान रहा था और मैं भी उसको जानता था (क्योंकि कुछ महीने पहले एक मजदूर की लिफ्ट के नीचे दबने से मौत हो गई थी। वह परिवार लिखित में कंपनी के सामने समझौता चाहता था। वहां एंबुलेंस में मजदूर की डेड बाडी रखी थी। हमें भी पता चला तो हम वहां पहुंच गए और उनका साथ देने लगे और लेबर आफिसर को बुलाकर समझौता करने की बात कहने लगे। यही पुलिस को खटक गया। क्योंकि बवाना औद्योगिक क्षेत्र में मालिकों और पुलिस की एकतरफा बदमाशी चल रही थी। अब ये मजदूरों के हक की बात करने वाला कहां से आ गया? तो पुलिस ने मुझे जबरदस्ती उठाना  चाहा। परिवार ने विरोध किया और मजदूरों ने भी अच्छे से जवाब दिया। पुलिस पीछे हट गई। वहां भी मुझे जबरदस्ती उठाने में एक वही पुलिस वाला था। उसको वो कसक भी थी।)
    
उन्होंने मुझे जबरदस्ती उठाना चाहा। मैंने उसका विरोध किया। फिर भी मुझको 3 पुलिस वाले मिलकर जबरदस्ती उठा ले गए। मुझे पुलिस द्वारा कुछ पंच भी मारे गए। मेरा गला दबाया गया। हमारे बाकी साथी भी गाड़ी में बिठा लिए गए।
    
हमें वहां मेंटली परेशान किया गया। और बोला गया मजदूरों को क्यों भड़का रहे हो। गैस कहां से आयेगी। फिर एक आफिसर से बात करवाई गई। सारी बात हमने बताई। उस आइपीएस आफिसर ने जाकर चैक किया, वही समस्या पाई गई। बाद में 10 बजे के करीब हमें छोड़ा गया। इस महान लोकतंत्र में गरीब गुरबा की आवाज उठाने के लिए ये सब सहना होगा। इसको लोकतंत्र बोला जाए या लठ्ठतंत्र।
    
हमने मजदूरों को अगले दिन विधायक आफिस के पास गैस एजेंसी चौक पर बुलाया था। कोई मजदूर नहीं पहुंचा। इसमें हमारी रक्षक नहीं भक्षक पुलिस का भी रोल है उन मजदूरों को डराने में और उनके दिमाग में दहशत फैलाने में। 
    
अगली वारदात की तारीख 15 मार्च। मासा यानी मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान द्वारा 15 मार्च को पानीपत रिफाइनरी के कंस्ट्रक्शन मजदूरों के बीच उनके आंदोलन के समर्थन में पर्चा बांटा जाना था। हमारा संगठन भी मासा का घटक संगठन है। मैं भी अपने संगठन की तरफ से गया था। हम ज्यादातर पर्चा बांट चुके थे। मेरे हाथ में 100 के करीब पर्चा था। वहां भी गैस की समस्या बनी हुई थी। उनसे भी 300 से 400 रुपए प्रति किलो वसूला जा रहा था। मैंने वहां भी रैली निकालकर प्रशासन के सामने ये बात रखने को कहा। मजदूर नेतृत्व के अभाव में चाहते तो थे लेकिन कर नहीं पा रहे थे।
    
(यहां मजदूर सप्ताह भर की हड़ताल कर चुका है, तानाशाही का जवाब अपने आक्रोश से दे चुका है। फिर भी सरकार और रिफाइनरी मैनेजमेंट मजदूरों को न्यूनतम वेतन और डबल ओवरटाइम देने के लिए तैयार नहीं है। इस दौरान दो बार लाठीचार्ज हुआ और मजदूरों ने उसका जवाब दिया। फिर भी न्यूनतम मांग मौखिक तौर पर मानी गई। लेकिन मजदूरों को वेतन वही दिया गया है। रिफाइनरी बनाना सरकार के बेवकूफ अफसरों के लिए सबसे  आसान काम यानी ब कैटेगरी का काम है। रिफाइनरी बनाना बेहद मेहनत और जोखिम का काम है। मजदूर । कैटेगरी का वेतन मांग रहे हैं। यही काम अगर सरकारी कर्मचारी करते तो उनकी सैलरी 1 से डेढ़ लाख रुपये प्रति महीना होती। यहां सरकार ठेकेदारी में काम करा 20-25 हजार रुपये भी देने को तैयार नहीं है।)
    
यहां भी पुलिस आती है मुझे साथ चलने को कहती है। मैं विरोध करता हूं। वही जबरदस्ती गाड़ी में ठूंस दिया जाता हूं। पुलिस वाला जल्दी से गाड़ी निकालने को बोलता है, उसका डर साफ दिखाई दे रहा था। (उन्होंने कामरेड गोरख पांडेय की कविता तो नहीं पढ़ी, लेकिन वो डरते हैं कि तमाम धन दौलत, गोला बारूद के बावजूद निहत्थे और गरीब लोग उनसे डरना बंद कर देंगे।)
    
मुझे सदर थाना पानीपत ले जाया गया जो पास में ही था। मुझसे अपने साथियों को बुलाने को कहा गया। मैंने मना किया तो मुझ से धक्का-मुक्की की गई। फिर मुझसे मेरे फोन का पासवर्ड मांगा गया। मैंने बताने से मना किया तो 2 पुलिस वालों ने मेरा हाथ मरोड़ा और एक मेरे को दबा कर मेरे कंधे पर बैठ गया। बिना किसी अपराध के ये सब झेलना पड़ता है गरीब गुरबा की आवाज उठाने के लिए।
    
(समझदार लोगों को ये झेलना नहीं पड़ता क्योंकि वो बोलते ही गाड़ी में बैठ जाते हैं। कहते ही सब कर देते हैं। लेकिन इस तानाशाही का प्रतिरोध करना होगा।)
    
बाद में शुरू होता है भाईचारा। हमारी भी नौकरी है हमारी कोई दुश्मनी नहीं है। कितने पैसे मिलते हैं। आदि आदि।
    
फिर मेरे पर तरस खाते हुए मुझे छोड़ दिया जाता है क्योंकि मैं भी लोकल हूं यानी हरियाणा से हूं। आज भी मेरी शर्ट फट गई और 13 मार्च को भी शर्ट फट गई थी। फिर बताया जाता है कि रिफाइनरी एसेंशियल सर्विस में आती है जबकि यहां कंस्ट्रक्शन चल रहा है चालू रिफाइनरी नहीं।
    
फिर मजदूरों द्वारा की गई तोड़-फोड़ बताई जाती है। ये डर बताया जाता है 40 हजार मजदूर हैं आग लगा देंगे तो जिम्मेदार कौन होगा। इनको क्यों भड़का रहे हो।
    
जबकि इनको प्रशासन भड़का रहा है। आप मजदूरों से फोकट में काम करवाना चाहते हैं। क्या मजदूर हड़ताल भी नहीं कर सकता है।
    
आप अपना कानून लागू नहीं करते, ये आपकी गलती है। जब मजदूर विरोध करे तो वही अपराधी। वाह रे मेरे महान लोकतंत्र। तेरे को कौन-कौन सी उपाधियां दूं। इस महान लोकतंत्र को बचाने के लिए बहुत से लोग जी जान से लगे हैं वो भी लगे हैं जो अपने आप को सबसे ज्यादा उत्पीड़ित बताते हैं।
    
गरीब मजदूरों और मेहनतकशों के लिए ये लोकतंत्र नहीं लठ्ठतंत्र है।
    
इस लठ्ठतंत्र के रहनुमा डर भी रहे हैं कि एक दिन गरीब लोग उनकी लंका में आग लगा देंगे। लेकिन वो न्यूनतम वेतन देने को तैयार नहीं हैं। गरीब मजदूरों के गुस्से को लठ्ठ से दबाना चाहते हैं लेकिन डर भी रहे हैं। -योगेश, दिल्ली
 

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