हाथ धोकर पीछे पड़ना

पिछले दिनों पीसीएस अधिकारी ज्योति मौर्या के मामले में सभी पुरुष प्रधानता के पक्षधर सोशल मीडिया में कूद पड़े। ज्योति मौर्या के पीछे हाथ धोकर पड़ गए। इस तरह एक निजी पारिवारिक मामला सामाजिक हो गया। पलटकर ये मामला सैकड़ों महिला अभ्यर्थियों की पढ़ाई-तैयारी छुड़वाने वाला मामला भी बन गया।
    
हुआ यह कि आलोक मौर्या ने बताया कि उनकी पत्नी पीसीएस अधिकारी ज्योति का होमगार्ड कमांडेंट मनीष दुबे के साथ प्रेम प्रसंग चल रहा है। आलोक ने शादी के बाद भी अपनी पत्नी को तैयारी जारी रखवायी और वे पीसीएस अधिकारी बन गयीं। अधिकारी बन जाने पर ज्योति अब आलोक से रिश्ता खत्म करना चाहती हैं। ज्योति और मनीष की रिकार्डिंग के आधार पर जान का खतरा होने की बात करते हुए आलोक ने डीजी होमगार्ड को शिकायत की। यह खबर मीडिया-सोशल मीडिया में घूमी तो ज्योति ने भी अपने पति पर प्रताड़ित करने की बातें कहीं। इस मामले में तमाम लोग सोशल मीडिया में ज्योति पर टूट पड़े। कुछेक ऐसे मामले भी सामने आए जिसमें लोगों ने अपनी पत्नी की पढ़ाई-तैयारी छुड़वा दी। कई कहानियां जिनमें पुरुषों ने कामयाब होने के दौरान अपनी पत्नी को छोड़ दिया, भी सामने आयीं। मोदी जी भी अपनी पत्नी जशोदा बेन को छोड़े जाने के लिए कोसे गए।
    
सफल होने पर पुराने रिश्तों को पीछे छोड़ देने की रिवायत हमारे समाज में आम है। सफल होने पर लोग गांव, घर-द्वार, दोस्ती, प्रेमी/प्रेमिका, रिश्तेदार कईयों को पीछे छोड़ आते हैं और नए रिश्ते बनाते हैं। इसमें पति-पत्नी को छोड़ आना भी शामिल है। बल्कि किसी पुरुष का पत्नी को छोड़ना ही ज्यादा आम है। पत्नी को छोड़ने के लिए पुरुष का सफल होना जरूरी नहीं होता। वह गुस्सा होने पर, दहेज के लालच में, पुत्र न जनने आदि किसी भी कारण से पत्नी को छोड़ते रहते हैं, पर मजाल है जो पुरुषों पर परिवार ‘तोड़क’ का आरोप लगा हो। यह आरोप आम तौर पर महिला पर ही लगाया जाता है। इस मामले में भी परिवार ‘तोड़क’ का आरोप ज्योति पर है।
    
पूंजीवादी समाज की एक आम सच्चाई है- वर्ग विभाजन। मध्यम वर्ग में खुद को पूंजीपति वर्ग (उच्च वर्ग) के करीब पहुंचाने की चाह बहुत बलवती होती है। मजदूरों-मेहनतकशों में भी यह होती है पर कम मात्रा में। क्योंकि उनकी सामाजिक स्थिति में बहुत बड़े परिवर्तन इससे संभव नहीं हैं। मध्यम वर्ग अपने सम्बन्धों के जरिये समाज में अपनी स्थिति को बनाये रखने या बढ़ाने की हरचंद कोशिश करता है। उसी अनुरूप समाज में रिश्ते भी बनाता या बिगाड़ता है। इसीलिए आम तौर पर रिश्ते ‘बराबरी’ वालों के साथ बनते हैं। यह दोस्ती से लेकर प्रेम करने तक जैसे अपेक्षाकृत जनवादी रिश्ते बनाते समय भी होता है। यह पुरुष सदियों से करते आ रहे हैं पर पूंजीवाद में किसी हद तक बहुत कम महिलाओं को यह स्थिति हासिल हुई है।
    
हमारे देश में आए-दिन रिश्तों के कमजोर पड़ने, संयुक्त परिवार से एकल परिवार के खत्म होने की दुहाई दी जाती है। पर रिश्तों की ‘पवित्रता’ का पाखंड भी साथ में चलता रहता है। चूंकि यह किसी महिला ने किया है तो पाखण्ड और शोर-शराबे के साथ हो रहा है।
    
पूंजीवाद में जहां सारे सम्बन्धों में आर्थिक हैसियत प्रधान होती है। वहां सच्चे मानवीय सम्बन्धों की यह दुहाई कुछ काम नहीं कर सकती। मानवीय गरिमा, सम्मान, बराबरी, व्यक्ति की अच्छाई, प्रेम पर आधारित सम्बन्ध कायम होने की पूर्व शर्त है कि पूंजी पर आधारित आर्थिक सम्बन्धों को खत्म किया जाए। ज्योति या आलोक या मनीष वही व्यवहार कर रहे हैं जो इस व्यवस्था के दायरे में किए जाते हैं। इन्हें कोसने से कुछ न होगा। प्रेम, बराबरी, सम्मान पर आधारित सम्बन्धों की सच में चाह रखने वाले इस पूंजीवादी व्यवस्था को न सिर्फ कोसें बल्कि पूरी शिद्दत से इसे बदलने में लगें। -चन्दन, हल्द्वानी
 

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