हरियाणा: सफाईकर्मियों का संघर्ष

Published
Wed, 09/16/2026 - 15:50
/harayana-safaikarmiyon-ka-sangharsh

हरियाणा में बीते लगभग डेढ़ माह से सफाईकर्मियों का जुझारू संघर्ष चल रहा है। इस संघर्ष में कभी चढ़ाव कभी उतार आता रहा है। पर सफाईकर्मियों खासकर महिला सफाईकर्मियों के जोश-उत्साह के चलते संघर्ष सरकार को हैरान-परेशान करने में सफल रहा है। हालांकि सरकार बारंबार इन्हें बरगलाने के साथ दमन में जुटी रही है। 700 से अधिक सफाईकर्मियों को इस संघर्ष के चलते सरकार निलंबित कर चुकी है।         

इस संघर्ष की शुरूआत अप्रैल माह से ही हो गयी थी। सफाई कर्मचारियों की यूनियनों ने संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण, ठेका प्रथा खात्मे, स्थाई कर्मचारियों को मिलने वाले चिकित्सा व्यय प्रतिपूर्ति, अनुग्रह राशि व ग्रेच्युटी समेत लाभों को संविदा कर्मचारियों को देने आदि की मांगें प्रमुखता से उठानी शुरू कीं। साथ ही उन्होंने सफाई व सीवर कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन 30 हजार रु. व सफाईकर्मी की मृत्यु पर 20 लाख की सहायता व सबके लिए 50 लाख रु. के दुर्घटना बीमा की मांग की। 
    
अप्रैल मंे कुछ दिनों की हड़ताल के बाद सरकार ने 13 मई को कर्मचारियों की 22 में से 17 मांगें मान लीं। इसमें संविदा कर्मचारियों को नियमित करने की प्रमुख मांग भी मान ली गयी और सफाईकर्मी 14 मई से काम पर वापस लौट गये। सरकार ने मांगों को लागू करने के लिए 30 जून तक का समय लिया था। पर 30 जून बीतने के बाद भी सरकार ने मांगें लागू करने में कोई पहल नहीं ली तो सफाईकर्मियों को समझ में आ गया कि सरकार ने उन्हें ठगने का काम किया है। 
    
सफाईकर्मियों की यूनियनों के संघ ने 30 जून की समय सीमा बीतते ही 1 जुलाई से फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिये। 7 जुलाई से 22 जुलाई के बीच सरकार पर दबाव डालने हेतु जिला स्तरीय बैठकें की गयीं। फिर 6 से 8 अगस्त तक 3 दिवसीय हड़ताल की घोषणा कर दी गयी। पर सरकार द्वारा कोई सुध न लेने के चलते यह 3 दिवसीय हड़ताल अनिश्चितकालीन हड़ताल में बदल गयी। इस तरह 6 अगस्त से शुरू हुई हड़ताल लगातार जारी रही। 
    
29 जुलाई को चंडीगढ़ के हरियाणा निवास पर सरकार के दो मंत्री व सफाईकर्मियों के बीच वार्ता हुई। सरकार ने वार्ता में बाल्मीकि समुदाय से आने वाले अपने मंत्री कृष्ण बेदी को भेजा ताकि वे बाल्मीकि समुदाय से आने वाले अधिकतर सफाईकर्मियों को हड़ताल तोड़ने पर राजी कर सकें। वहीं सफाईकर्मियों ने भी उन पर सरकार से अपनी मांगें मनवाने का दबाव डाला। 
    
25 अगस्त की रात में 12 बजे हिसार में महिला सफाईकर्मियों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। कानूनन रात में महिलाओं की गिरफ्तारी नहीं की जा सकती पर कानून को ताक पर रख संघर्षरत महिलाकर्मियों को डराने के लिए यह दमन की कार्यवाही की गयी। 29 अगस्त को सफाईकर्मियों ने वादाखिलाफी के कारण मंत्री कृष्णबेदी का कुरूक्षेत्र में पुतला दहन किया। 
    
4-5 सितम्बर को कर्मचारियों ने सिर मुंडवाकर अपने संघर्ष को तेज करने की घोषणा की। राज्य सरकार ने कर्मचारियों को 5 सितम्बर तक काम पर लौटने का अल्टीमेटम दिया। इस अल्टीमेटम को सफाईकर्मियों ने ठुकरा दिया। 13 हजार से अधिक सफाईकर्मियों ने मांगें मानी जाने तक संघर्ष जारी रखने का एलान कर दिया। 
    
सरकार ने लम्बी हड़ताल के दबाव में कुछ राहत थमाने का प्रयास किया। उसने 13,000 नगर निगम संविदा कर्मचारियों को 60 वर्ष तक नौकरी की सुरक्षा, 2000 रु. मासिक जोखिम भत्ता, वेतन में 15 प्रतिशत वृद्धि, महंगाई भत्ता, ग्रेच्युटी, मातृत्व लाभ देने की घोषणा की। 10 वर्ष से अधिक समय से कार्यरत कर्मचारियों का वेतन 25,560 रु. करने की भी बात कही।
    
यद्यपि ठेका प्रथा के खात्मे व नियमितीकरण की प्रमुख मांग मनवाने में कर्मचारी सफल नहीं हुए पर सरकार को एक हद तक झुकाने में सफाईकर्मी सफल रहे। मुख्यमंत्री के साथ बैठक के बाद 36 दिन चली हड़ताल समाप्त हुई। इसमें निलंबित कर्मियों की बहाली व उपरोक्त मांगों पर समझौता हुआ।
    
हालांकि फिर एक बार सरकार वादाखिलाफी करती नजर आ रही है और सफाईकर्मी फिर से संघर्ष की बात करने लगे हैं। 
    
इस हड़ताल के दौरान काम ठप होने से सफाई व्यवस्था चरमरा गयी। जगह-जगह कूड़े के ढेर ने सरकार पर दबाव कायम किया। हड़ताल में मुख्यतः सीटू की यूनियन का नेतृत्व रहा। पर यूनियन संघर्ष आगे बढ़ाने के बजाय सफाईकर्मियों के दबाव में संघर्ष बढ़ाने पर मजबूर होती रही।
    
संविदाकर्मियों के संघर्ष में यद्यपि बाकी सरकारी विभागों के संविदाकर्मी भी शामिल थे पर उनकी व्यापक भागीदारी बनाने के प्रयास नहीं हुए। 
    
फिर भी इस जुझारू हड़ताल ने दिखा दिया कि अगर मजदूर-कर्मचारी लड़ने की ठान लें तो अपने समझौतापरस्त नेतृत्व को भी संघर्ष के लिए मजबूर कर सकते हैं। संविदा सफाईकर्मी खासकर महिला सफाईकर्मी इस संघर्ष की प्रमुख लड़ाकू ताकत बनकर सामने आये। 
    
संविदा कर्मचारियों का यह जुझारू व आंशिक सफल संघर्ष पूरे देश के संविदाकर्मियों को संघर्ष के मैदान में उतरने का संदेश देगा। 

आलेख

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

अमरीकी साम्राज्यवाद पराभव की ओर है। अभी वह दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है लेकिन उसको चुनौती देने वाली और भी ताकतें उभर कर आयी हैं। यूक्रेन में रूस की विजय आसन्न है। यूक्रेन अ

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।