जान को जोखिम में डालकर देश छोड़ते लोग

Published
Sun, 08/16/2026 - 15:50
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जुलाई माह के अंत में सिउटा नाम का एक छोटा सा स्थान पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना। सिउटा मोरक्को से सटा हुआ एक परिक्षेत्र है जो कि स्पेन के कब्जे में है। सिउटा मोरक्को पर स्पेन के औपनिवेशिक कब्जे का बचा हुआ अवशेष है। जुलाई माह की 30 और 31 तारीख को मोरक्को के दसियों हजार लोगों ने सिउटा में प्रवेश किया। इस कोशिश में 30 से ज्यादा लोग समुद्र में डूब कर मर गये। सिउटा में एक बेहतर जीवन की आस में आ गए हजारों लोगों को बहुत त्वरित गति से स्पेन की सरकार ने बाहर धकेल कर वापस मोरक्को में पहुंचाया। मोरक्को से प्रवासियों द्वारा सिउटा में प्रवेश करने की घटना को लेकर पूरे यूरोप की दक्षिणपंथी ताकतों ने हल्ला मचाया। इस बहाने इन ताकतों ने प्रवासियों के खिलाफ नफरत फैलाने की अपनी मुहिम को आगे बढ़ाया। ट्रम्प प्रशासन तो पहले से ही कहता आ रहा था कि यूरोप की समस्याओं का कारण प्रवासियों के प्रति सख्ती न बरतने की नीति है। इस घटना को इन्होंने अपनी बात की तस्दीक करता हुआ बताया। 
    
सिउटा में मोरक्को से प्रवेश पाने को आतुर लोग अपनी जान को भी जोखिम में डालने को तैयार थे। ये एक ऐसी सीमा को पार कर रहे थे जो कि दुनिया की सबसे ज्यादा किलेबंद है। कहा जाता है कि इस सीमा पर ऐसे धारदार तार लगे हैं जो खून की धमनियों को फाड़ देते हैं। जमीनी रास्ते की कठिनाईयों से बचने के लिए लोग समुद्री रास्ते से तैर कर पार करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन यह भी उतना ही जानलेवा साबित हुआ। 
    
यह घटना भले ही मोरक्को में हुई है लेकिन यह पूरी दुनिया की मजदूर-मेहनतकश जनता की शोचनीय स्थिति को मार्मिक तरीके से उजागर करती है। जिन हालातों से परेशान होकर मोरक्को की बड़ी आबादी देश छोड़ने को आतुर है वैसे ही हालात अफ्रीका के अन्य देशों के और दुनिया के ढ़ेरों देशों के हैं। बेरोजगारी, अत्यन्त कम मजदूरी, युद्ध, जातीय हिंसा आदि से त्रस्त होकर लोग किसी सुरक्षित स्थान की तलाश में निकल पड़ते हैं। सिउटा वाली घटना में मोरक्को की जनता के साथ-साथ अफ्रीका के अन्य आस-पास के उप सहारा के देशों की जनता की भी एक संख्या थी। भारत में भी हाल के समय में डंकी मार्ग से होने वाला अप्रवासन और उससे जुड़ा जोखिम काफी चर्चा में आया है। 
    
इस घटना को लेकर यूरोप की दक्षिणपंथी ताकतों और सरकारों की प्रतिक्रिया एक तरह की थी तो सिउटा की स्थानीय आबादी की प्रतिक्रिया दूसरी तरह की थी। दक्षिणपंथी ताकतों ने प्रवासियों के खिलाफ जहर उगलने के लिए इस घटना का इस्तेमाल किया तो सरकारों के स्तर पर आव्रजन कानूनों को कड़ा करने पर माथापच्ची शुरू हो गयी। इसके उलट सिउटा के मजदूरों और नौजवानों ने यूरोप से आए घोर दक्षिणपंथी संगठन नुक्लीचो नेशनल की गतिविधियों का विरोध किया। स्थानीय निवासियों ने सिउटा एकजुट के नारे लगाए। इन्होंने दक्षिणपंथी संगठन की गतिविधियों को लंबे समय से ईसाईयों, मुसलमानों और अन्य लोगों के सह अस्तित्व वाले समाज में फूट डालने वाला करार दिया। स्थानीय लोगों के विरोधी की वजह से इस संगठन को पीछे हटना पड़ा। 
    
आज दुनिया की मजदूर मेहनतकश जनता पूंजीवाद-साम्राज्यवाद द्वारा किस मुहाने पर धकेली जा रही है, सिउटा इसका उदाहरण है। आज जिंदा भर रहने के लिए ये जान का जोखिम उठाने को तैयार है। जरूरत है कि ये पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के रूप में अपनी समस्याओं की असली जड़ को पहचानें।

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