जंतर-मंतर पर छात्र-युवा आंदोलन के आगे घुटने टेकते हुए मोदी सरकार ने सोचा था कि एक बार घुटने टेक कर वह छात्रों-युवाओं के उभार की लहर को थाम लेगी और अपनी सरकार को और नुकसान होने से बचा लेगी। शुरूआती कुछ दिनों में जिस तरह से सरकार व संघी लंपट संगठनों ने जंतर-मंतर के छात्रों-युवाओं पर हमला बोला उससे लगा भी कि शायद सरकार अपने मंसूबों में कामयाब हो रही है। पर शीघ्र ही जगह-जगह से उठती आवाजों ने दिखा दिया कि दरअसल जंतर-मंतर दिल्ली से समूचे देश में फैल रहा है।
छात्रों-युवाओं की पेपर लीक व शिक्षा संबंधी धांधलियों के लिए प्रधानमंत्री मोदी से माफी मांगने की मांग जंतर-मंतर से ही उठती रही थी। पर जब मोदी ने छात्रों-युवाओं से माफी मांगने के बजाय उन्हें दी गयी गालियों के लिए छात्रों-युवाओं को माफ करने का बयान दिया तो यह छात्रों-युवाओं के जख्मों पर नमक छिड़कने सरीखा था। और इस नमक छिड़कने का खामियाजा मोदी सरकार को भुगतना ही था।
झारखण्ड के छात्रों का संघर्ष जंतर-मंतर संघर्ष खत्म होने के साथ ही शुरू हो गया। यहां छात्र लगातार 3 सप्ताह से अधिक से संघर्ष के मैदान में हैं और उनके निशाने पर राज्य की कांग्रेस सरकार है। भाजपाईयों ने जंतर-मंतर का असर कम करने के लिए इस संघर्ष को समर्थन देना शुरू कर दिया। कांग्रेसी सरकार ने भी 10 अगस्त को संघी लम्पटों के उकसावे पर लाठीचार्ज-आंसू गैस-वाटर कैनन का इस्तेमाल कर छात्रों-युवाओं को दबाने का प्रयास किया। यह सही है कि उनकी प्रतिक्रिया दिल्ली पुलिस की तरह बर्बर नहीं थी फिर भी इस दमन ने छात्रों-युवाओं के आगे साफ कर दिया कि उनकी मांगों का हल न भाजपा के पास है न कांग्रेस के पास। झारखण्ड के छात्रों का संघर्ष अभी जारी है।
जंतर-मंतर के असर से ही उ.प्र. में बेरोजगार संगठनों ने जस्टिस मोर्चा बना 2 अक्टूबर से संघर्ष का एलान कर दिया। ऐसे ही छात्र-युवा संघर्ष छेड़ने की तैयारियां बिहार, बंगाल से लेकर कश्मीर तक विभिन्न राज्यों में चलने लगीं। कुछ जगहों पर तो स्कूली बच्चे भी अपनी बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतरने लगे। हैदराबाद की लाॅ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने दीक्षांत समारोह में युवाओं को काकरोच कहने वाले मुख्य न्यायधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाने का विरोध करते हुए उनके हाथों से डिग्री लेने से इंकार कर दिया।
कहने की बात नहीं है कि 20 जुलाई को लाठियां-पैलेट गन भले ही दिल्ली के जंतर-मंतर पर चली थी पर उसका दर्द समूचे देश के युवाओं ने अपनी पीठ पर महसूस किया था। और यही दर्द उन्हें देश के हर कोने में सड़कों पर उतार रहा है।
मोदी सरकार के साथ-साथ तमाम राज्य सरकारें देश में फैलते इस जंतर-मंतर से हैरान-परेशान हैं। वे किसी भी कीमत पर छात्रों-युवाओं के संघर्षों की आंधी रोकना चाहती हैं। वे संघर्ष करते युवाओं के खिलाफ कुत्सा प्रचार में जुटी हैं। दमन-मुकदमों से वे जहां एक ओर युवा पीढ़ी को डरा रही हैं तो संघ प्रमुख से लेकर तमाम भाजपाई नेता युवाओं से संवाद कर उन्हें बरगलाने के साथ संघर्ष के तरीके समझाने में जुटे हैं।
हाल ही में उत्तराखण्ड में भाजपाई मुख्यमंत्री धामी स्कूली छात्रों से मुखातिब हुए। उन्होंने छात्रों से सवाल पूछा कि यदि उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया जाये तो वे क्या करेंगे। सारे प्रशिक्षण के बावजूद छात्रों के कांवड़ियों के उत्पात, अंकिता भंडारी प्रकरण, पेड़ काटने की बातों ने मुख्यमंत्री की बोलती बंद करने का ही काम किया।
युवा पीढ़ी को देश भर में फैलते जंतर-मंतर राजनैतिक बना रहे हैं। वे अपने हक-हकूक-अधिकारों को जान समझ रहे हैं। उन्हें बरगला अपनी राजनीति साधने में राहुल गांधी से लेकर काकरोच पार्टी सभी लगे हुए हैं। ऐसे में क्रांतिकारी ताकतों का फर्ज बन जाता है कि वे युवाओं को भगत सिंह के दिखाये सही क्रांतिकारी रास्ते की ओर बढ़ायें। इंकलाब जिन्दाबाद का नारा लगाने वाले युवाओं को इंकलाब की वास्तविक दिशा में आगे बढ़ायें।