हाल ही में पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच लम्बे समय से जारी टकराव के खुले युद्ध के स्तर पर पहुंचने की घोषणा कर दी। 22 फरवरी से दोनों देशों की ओर से शुरू हुए हमले अब युद्ध के स्तर पर पहुंच गये हैं। पाकिस्तान ने काबुल व अन्य अफगान शहरों पर हवाई बमबारी की है तो अफगानिस्तान ने सीमा पर स्थित क्षेत्रों पर हमले किये हैं।
किसी जमाने में पाकिस्तान व अफगानिस्तानी तालिबानी शासक घनिष्ठ सहयोगी थे। 1996 में अफगानिस्तान में जब पहली बार तालिबानी सरकार बनी थी तो पाकिस्तान उसे मान्यता देने वाले पहले देशों में से एक था। 2021 में जब अफगानिस्तान से अमेरिकी साम्राज्यवादियों को खदेड़ कर तालिबानी फिर से सत्ता में आये तो पाकिस्तान ने उसकी वापसी का स्वागत किया था। पर बीते 5 वर्षों में दोनों इस्लामी पड़़ोसी देशों के बीच बार-बार टकराव होता रहा और अब यह टकराव बिगड़ कर युद्ध के स्तर पर जा पहुंचा है।
पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तानी तालिबान या टीटीपी सुरक्षित पनाह हासिल किये हुए हैं और यह आतंकवादी संगठन पाकिस्तान के भीतर आतंकवादी हमले करता रहा है। टीटीपी का गठन 20 वर्ष पहले अमेरिका-नाटो के खिलाफ लड़ाई में तालिबान का सहयोग करने व पाकिस्तान से लड़ने के लिए किया गया था। इसने पाक-अफगान सीमा पर कई इलाकों पर कब्जा जमा लिया था। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानी सत्ता इस संगठन को पाल-पोस रही है। इसके साथ ही पाकिस्तान का आरोप है कि बलूच विद्रोही भी अफगानिस्तान में शरण पाते रहे हैं। दूसरी ओर अफगानिस्तान का आरोप है कि पाकिस्तान आई एस आई एस सदस्यों का पनाह देता रहा है और यह संगठन अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता के खिलाफ कई आतंकी हमले कर चुका है।
पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच आतंकी हमलों के अलावा विवादित सीमा व शरणार्थियों के चलते भी विवाद है। 2600 किमी. लम्बी सीमा को अफगानिस्तान मान्यता नहीं देता है। पाकिस्तान में लाखों अफगान नागरिक शरण लिए हुए हैं। अब पाकिस्तन ने इन शरणार्थियों पर रुख कड़ा कर हजारों शरणार्थियों को निष्कासित कर दिया है। पाकिस्तान हर उस शरणार्थी के निष्कासन पर अड़ा है जिसने वीजा नहीं प्राप्त किया है।
भारत-तालिबान के बीच 2-3 वर्षों में बढ़ते संबंधों ने भी पाकिस्तान को परेशान किया है। इस युद्ध के मौके पर भी पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि तालिबान ने अफगानिस्तान को भारत का उपनिवेश बना दिया है। भारतीय शासकों ने भी पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान पर हवाई हमलों की निन्दा कर संकेत दे दिया है कि इस युद्ध में वे अफगानिस्तान के साथ हैं।
वहीं अमेरिकी सरगना ट्रम्प ने खुलकर पाकिस्तान का पक्ष लिया है। जबकि चीन, ईरान, तुर्की, सऊदी अरब आदि देशों ने इस बढ़ते टकराव पर चिंता व्यक्त कर मध्यस्थता के प्रयास तेज कर दिये हैं।
सैन्य ताकत के मामले में अफगानिस्तान पाक से बहुत ज्यादा कमजोर है पर तालिबान की गुरिल्ला युद्ध की रणनीति पाकिस्तान को लम्बे समय तक हैरान-परेशान कर सकती है। साथ ही घने बसे पाकिस्तानी आबादी वाले इलाकों में तालिबानी हमले बड़े पैमाने पर नुकसान पैदा कर सकते हैं।
इस टकराव की स्थिति तक दोनों देशों के पहुंचने में एक बड़ी भूमिका अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी साम्राज्यवादियों की भी रही है। दोनों देशों में आतंकी समूहों को पालने-पोसने में ये भूमिका निभाते रहे हैं। अब भस्मासुर बन चुके ये समूह टकराव का कारण बन रहे हैं। इस टकराव का खामियाजा दोनों देशों की निर्दोष जनता उठायेगी। जबकि शासक अंधराष्ट्रवाद का सहारा ले अपनी-अपनी सत्ता मजबूत बनाने का प्रयास करेंगे।