कम खाओ-गम खाओ

Published
Sat, 05/16/2026 - 15:50
/kam-khao-gam-khao

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता को मितव्ययिता का पाठ पढ़ा दिया है। खाने में तेल का इस्तेमाल कम करो, आवागमन में पेट्रोलियम तेल का इस्तेमाल कम करो, सोना मत खरीदो, विदेश यात्रा मत करो, सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करो, रासायनिक खाद का इस्तेमाल कम करो आदि-आदि मितव्ययिता के पाठ प्रधानमंत्री ने जनता को पढ़ाये। बताया जा रहा है कि अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण बढ़ते तेल, खाद्य तेल के दामों के चलते विदेशी मुद्रा भण्डार में गिरावट को थामने व रुपये की लुढ़कन को रोकने के लिए ये पाठ पढ़ाया गया है। 
    
मोदी के मितव्ययिता पाठ के बाद पूंजीवादी मीडिया इस मितव्ययिता को देशभक्ति के बतौर परोसने में जुट गया है। तमाम भाजपाई नेता मितव्ययिता की नौटंकी करने लगे। 
    
5 राज्यों के चुनाव में सबसे ज्यादा पैसे फूंकने वाली पार्टी भाजपा रही। उसके नेता दिन-रात चार्टर्ड विमानों से घूमते हुए भारी मात्रा में तेल फूंकते रहे। रोड शो और अन्य रैलियों में बड़ी मात्रा में गाड़ियों को लगा भारी मात्रा में तेल फूंका गया। विदेश यात्राओं के लिए प्रधानमंत्री मोदी पहले ही मशहूर रहे हैं। दिन में कई बार कपड़े बदलने वाला, लखटकिया सूट पहनने वाला व्यक्ति जनता को मितव्ययिता का संदेश देता है। और वह भी पूरी बेशर्मी के साथ एक रैली में यह संदेश देता है जिसके आयोजन में भारी पैसा फूंका गया था। मानो चुनाव ्रप्रचार, संघ-भाजपा की रैलियों, प्रधानमंत्री की यात्राओं में फुंके तेल से विदेशी मुद्रा भण्डार व रुपया नहीं लुढ़कता और जनता के आवागमन से रुपया लुढ़कने लगता हो। 
    
अगर मोदी सरकार को वास्तव में लुढ़कती अर्थव्यवस्था व विदेशी मुद्रा भण्डार की चिंता होती तो युद्ध शुरू होते ही वह तेल-गैस-खाद्य तेल उर्वरक का वैकल्पिक इंतजाम-भण्डारण में जुट जाती। वह ईरान से-रूस से संबंध प्रगाढ़ कर इन सामग्रियों का आयात करती। वह ट्रम्प के इशारों पर नाचने वाली रीढ़विहीनता का परिचय न देती। वह चुनावों में पूरी बेशर्मी के साथ अय्याशी भरा प्रचार न करती। 
    
पर मोदी सरकार ने मान लिया है कि देश की जनता मूर्ख है और वह उसे कभी भी डण्डे से हांक सकती है। वह थाली बजवा कोरोना दूर कर सकती है। वह नोटबंदी के वक्त बैंक की लाईनों में खड़ी की जा सकती है। वह हिन्दू-मुसलमान के नाम पर दंगों में झोंकी जा सकती है तो वह कम तेल का खाना भी खा सकती है। कम यात्रा कर सकती है और बगैर खाद के फसल भी उगा सकती है। 
    
दरअसल लुढ़कती भारतीय अर्थव्यवस्था-लुढ़कते विदेशी मुद्रा भण्डार-लुढ़कते रुपये सबके लिए मोदी सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं। रुपया डालर के सापेक्ष लुढ़कते हुए 95 रु. प्रति डालर के भी पार जा चुका है। कृषि व औद्योगिक उत्पादन सुस्त पड़ा है व सेवा क्षेत्र ही तेज वृद्धि कर रहा है। ऐसे में सरकार कृषि व उद्योगों की गिरती थामने के उपाय करने के बजाय थोथे खुशनुमा प्रचार, विकसित देश बनने का स्वप्न परोसने में ही जुटी रही है। इस पर भी इनकी सारी आस विदेशी पूंजी निवेश से स्थिति में सुधार पर लगी रही जो अपनी बारी में समस्या को और गहराने की ओर ही ले जाता। 
    
यह बात सही है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और इससे भारत के विदेशी मुद्रा भण्डार पर दबाव बढ़ेगा। यह भी सही है दुनिया में खाद्य तेलों के भाव बढ़ने से भी इस भण्डार पर दबाव बढ़ेगा क्योंकि भारत खाद्य तेल का बड़ा हिस्सा आयात करता है व सोना आयात बढ़ने पर भी इस भण्डार पर दबाव बढ़ेगा। पर साथ ही यह भी हकीकत है कि अमेरिका के दबाव में रूस-ईरान से सस्ते तेल की खरीद कम कर सरकार ने मुद्रा भण्डार पर दबाव खुद ही बढ़ाया है। 
    
इन मितव्ययिता उपायों का विदेशी मुद्रा भण्डार पर जो भी असर पड़े पर बाकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा, इसे शेयर बाजार की अगले ही दिन भारी गिरावट ने स्पष्ट कर दिया। पहले से ही मांग की कमी से जूझ रही भारतीय अर्थव्यवस्था इससे और अधिक संकट की ओर जायेगी। सोना कारोबार से लेकर आटो मोबाइल क्षेत्र में तो स्पष्टतः ही गिरावट आयेगी जो बाकी क्षेत्रों को भी नकारात्मक तौर पर प्रभावित करेगी। 
    
आने वाली फसलों के लिए रासायनिक उर्वरकों की कमी भारत के किसानों की परीक्षा लेने को तैयार है। सरकार उर्वरकों का भण्डारण करने, उनके आयात के वैकल्पिक उपाय करने के बजाय बेशर्मी से उर्वरक कम इस्तेमाल करने का उपदेश दे किसानों को कंगाली में ढकेलने की साजिश रच रही है। आने वाली फसलों में उर्वरकों के महंगे दाम-अनुपलब्धता किसानों की कंगाली को और बढ़़ायेगी। 
    
अर्थव्यवस्था को अपने इशारों पर हांकने की कोशिश करती मोदी सरकार देश को गर्त की ओर ले जा रही है। वह दिन दूर नहीं जब विकसित भारत का सपना देखते भारतवासी भुखमरी झेल रहे होंगे और सरकार उपदेश दे रही होगी- कम खाओ-गम खाओ। 

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।