मध्य प्रदेश बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतें

Published
Tue, 09/15/2026 - 22:46
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मध्य प्रदेश के बालाघाट के बिरसा ब्लॉक में अब तक दर्जनों बच्चों की मौत हो चुकी है। यह क्षेत्र बैगा-गोंड आदिवासी बहुल क्षेत्र है। सरकार की फाइलें मृतक बच्चों की संख्या को कम करके दिखा रही हैं लेकिन विभिन्न दावों के अनुसार यहां मरने वाले बच्चों की संख्या कम से कम 30 हो चुकी है।

जून 2026 से सितंबर माह तक सैकड़ों बच्चे डिहाईड्रेशन, एनीमिया, खसरा, मलेरिया आदि बीमारियों की वजह से भरती कराए गए हैं जिनमें मरने वालों बच्चों की संख्या 30 तक पहुंच चुकी है।

सरकारी रिपोर्ट की ही मानें तो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और जिला आंकड़ों के अनुसार जिले में हर छठा बच्चा अति कुपोषण का शिकार है। यह आदिवासी इलाका बेहद दरिद्रता की मार झेल रहा है। यहां बच्चों और आदिवासी जनों को खाने के लिए जंगली फल-फूलों पर निर्भर होना पड़ रहा है और साफ पानी तक का इंतजाम नहीं है। हालांकि सरकारी फाइलों में जल जीवन मिशन के कागजात कहते हैं कि उन्होंने 100% नलजल की अच्छी गुणवत्ता का पानी उपलब्ध करवा दिया है। लेकिन हकीकत यह है कि यहां के हैंडपंप पीला पानी दे रहे हैं, कई हैंडपंप सूख चुके हैं और लोग नदी, नालों, तालाबों का पानी पीने को मजबूर हैं। मजबूरी में गंदा पानी पीने की वजह से ही बीमारियां यहां के लोगों को हो रही हैं। डायरिया, डिहाईड्रेशन की समस्याएं बड़ी हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार द्वारा दिया जाने वाला टेक होम राशन भी कई महीनों तक बंद रहता है।

खाने की कमी और साफ पानी की कमी के कारण ही यहां लोगों का शरीर इतना कमजोर हो गया है कि बड़े संक्रामक की बात तो दूर रही, मौसमी संक्रमण तक शरीर झेलने की स्थिति में नहीं है। इसी कारण बड़े पैमाने पर लोग बीमार पड़ रहे हैं, बच्चों की मौतें हो रही हैं। सरकारी फाइल में भले ही इसे खसरा या मच्छरों के संक्रमण की बात करें लेकिन असल में यह सरकारी बदइंतजामी व गरीबों के प्रति सरकार की अपेक्षा का ही मुख्य कारण है।

अगर बालाघाट जिले की बात करें तो यह जिला कोई संसाधन विहीन जिला नहीं है। बल्कि यह जिला मैंगनीज, तांबा व लोहे जैसी खनिज संपदाओं से भरा हुआ है। रेत का खनन, जंगलों का कटान कर बड़े पैमाने पर यहाँ की सम्पदा का दोहन किया जा रहा है। मैंगनीज के खनन से जल स्तर गिरने व पानी की कमी की समस्या बढ़ी है। जिस कारण लोगों को दूर दराज के तालाबों के पानी पर निर्भर होना पड़ रहा है।

क्षेत्र के खनिज संपदा का दोहन कर एक वर्ग तो खूब पैसा कमा रहा है। सरकार भी रॉयल्टी के रूप में हिस्सा बटा रही है। लेकिन दूसरी तरफ लंबे समय से जंगलों पर निर्भर आदिवासी समूह इस पर्यावरण के दोहन की मार झेल रहा है।

वह भयानक गरीबी की मार झेल रहा है, उसके पास खाने को रोटी नहीं, पीने को पानी नहीं, बदन पर कपड़ा नहीं; की स्थिति बनी हुई है।

टूटे-फूटे घरों में जैसे-तैसे वह जीवन बिता रहा है। उसकी इस बदहाली के ऊपर ही पूंजीपति और राजनेताओं का स्वर्ग बसा हुआ है।

असल में यही पूंजीवादी विकास है। संसाधन समृद्ध इलाकों की धन संपदा को पूंजीपति लूट कर ले जाते हैं और यहां के आमजन भूख, प्यास, गरीबी में जीने को मजबूर होते हैं। इस बात का मौजूदा उदाहरण अभी मध्य प्रदेश बालाघाट है।

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