भारतीय समाज महिला मुक्ति के मामले में आज दो परस्पर विरोधी गतियों का शिकार नजर आ रहा है। एक ओर समाज में महिला प्रश्न पर बढ़ती जागरूकता दिखाई दे रही है। महिलायें अधिकाधिक घरों की चहारदीवारी लांघ सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर रही हैं। हर पेशे-हर क्षेत्र में वे पुरुष वर्चस्व को चुनौती दे रही हैं। महिलाओं के साथ यौन हिंसा के मामले में समाज में हर ओर जागरूकता-प्रतिरोध बढ़ रहा है। समाज में स्पष्ट रूप से दिखने वाली इस अग्रगति के उलट एक पश्चगति भी है। यह पश्चगति संघ-भाजपा द्वारा समाज में फैलायी जा रही फासीवादी सोच-विचारधारा से पनप रही है। इस पश्चगति के चलते हिन्दू धार्मिक कर्मकाण्डों-धार्मिक यात्राओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। कांवड़ यात्रा से लेकर तरह-तरह के धार्मिक-आयोजनों में उनकी भागीदारी बढ़ रही है। ये दोनों गतियां न केवल एक साथ जारी हैं बल्कि एक-दूसरे को प्रभावित भी कर रही हैं। महिला मुक्ति के लिए सक्रिय महिला कार्यकर्ताओं को इन दोनों गतियों को संज्ञान में लेना जरूरी है।
पूंजीवादी व्यवस्था का संकट जहां एक ओर आम जनता के जीवन की दुख-तकलीफें बढ़ा रहा है वहीं दूसरी ओर वह अधिकाधिक महिलाओं को मजबूर कर घर की बेड़ियां तोड़ कमाने के लिए बाहर धकेल रहा है। घर से निकलकर बाहर काम पर जाने की मजबूरी इतनी तीव्र गति है कि महिलाओं को घरों में कैद करने का हिमायती संगठन संघ भी अपनी बातें बदलने पर मजबूर हुआ है। आज अपनी लाख चाहत के बावजूद ये अपनी इस सोच को सामने नहीं रख सकते कि महिलाओं को कमाई के लिए घर से बाहर निकलना बंद कर पति की सेवा करनी चाहिए। संघ भी अपने 100 वर्षों के घोर महिला विरोधी इतिहास के बाद अब संघ में महिलाओं की भागीदारी-भूमिका बढ़ाने की बात करने को मजबूर है।
पर संघ-भाजपा की इन बदलती बातों का यह मतलब नहीं है कि उसने अपनी पितृसत्तात्मक-सामंती सोच बदल ली है। वह जस की तस है। पर समाज में महिला प्रश्न पर अग्रगति के चलते उसे अपनी बातें कुछ बदले रूप में पेश करनी पड़ रही हैं। आज भी संघ-भाजपा महिलाओं को पुरुषों की दासी, बच्चा पैदा करने की मशीन से ज्यादा कुछ नहीं समझते, पर आज वे खुलकर यह बोल नहीं सकते।
ऐसे में संघी कारकूनों-प्रचारकों ने अपने हित साधने के-महिलाओं को अपने चंगुल में फंसाने के दूसरे तौर-तरीके अपनाये हैं। ये तौर-तरीके ढेरों मामलों में हिटलर के तरीकों से मिलते-जुलते हैं। महिलाओं की मुक्ति के लिए सक्रिय कोई भी कार्यकर्ता जानता है कि महिलायें भारतीय समाज में तिहरी दासता की शिकार हैं। वे घरेलू दासता का शिकार हैं। वे धार्मिक मठाधीशों-सामंती संस्थाओं की दासता का शिकार हैं जो जब-तब फतवे जारी कर उनकी आजादी पर हमले करते रहते हैं। इसके साथ ही महिलायें फैक्टरी-दफ्तरों में काम करते हुए पूंजी की गुलामी-उजरती दासता का शिकार हैं। दासता के इन तीनों रूपों को तोड़े बगैर महिलायें मुक्ति हासिल नहीं कर सकतीं।
पर चूंकि भारत में महिलायें अपनी इस तिहरी दासता के प्रति सचेत नहीं हैं। इसलिए समाज की अग्रगति के चलते तो वो घर के बंधन तोड़ काम पर जा रही हैं। कई दफा अपने हितों के खिलाफ सामंती फतवे देने वालों से लड़ भी रही हैं पर यह सचेत तरीके से होने के बजाय स्वतः स्फूर्त ही अधिक है। ऐसे में उनकी इस कम समझ का फायदा हिन्दू फासीवादी उठा पाने में कामयाब हो रहे हैं। वे सभी महिलाओं के भीतर ‘भारतीय परिवार’ को एक आदर्श के रूप में और हिन्दू धर्म को महान धर्म के रूप में स्थापित करने में कामयाब हैं।
संघी कारकून आम तौर पर यह कहते हुए मिल जाते हैं कि परिवार के प्रति कर्तव्य निभाना महिलाओं का महान कर्म है। कि पति-बच्चों को बांधे रखने वाली महिला परिवार की धुरी है। कि बच्चों को जागरूक देशभक्त नागरिक के रूप में विकसित करना मां का महान देशभक्तिपूर्ण कर्म है। कि परिवारों की टूटन-तलाक आदि भारतीय परिवारों पर पाश्चात्य सभ्यता का दुष्प्रभाव है। इन सारी बातों का लब्बो लुआब क्या है? इनका अर्थ यही है कि महिलायें घर-परिवार को महान संस्था मानती रहें। वे घर-परिवार की चक्की में खटती रहें। वे बच्चा पालन-पति की सेवा महान कर्म मानती रहें। वे कभी इस हकीकत की ओर ध्यान न दें कि ये ‘महान कर्म’ ही उसे घरेलू दासता में धकेलते हैं। वे कभी यह हकीकत न जानें कि अगर पूरा समाज पतित हो रहा है तो अच्छे से अच्छा परिवार भी पतन से बच नहीं सकता। वे इस मांग को मांगने की ओर न बढ़ें कि बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी समाज व सरकार की होनी चाहिए। कि घरेलू कर्म को भी घर से बाहर निकाल कर सामाजिक काम बना दिये जाने चाहिए। वे संघी सोच ‘‘हम सुधरेंगे जग सुधरेगा’’ के झांसे में पड़ी रहें और हम अर्थात अपना परिवार सुधारने के बहाने अपनी गुलामी में पड़ी रहें। वे इस समझ की ओर न बढ़ें कि अगर जग अथवा समाज पतन की ओर बढ़ रहा है तो अकेला परिवार उसकी बुराईयों से बच नहीं सकता। अतः समाज में क्रांतिकारी बदलाव से ही सभी इकाईयों में सुधार की राह खुलेगी।
परिवार के प्रति फासीवादियों द्वारा पैदा किये जा रहे इस मोह का परिणाम यह निकलता है कि सामाजिक जीवन में काम पर जाती महिलायें भी घरेलू कर्म-घरेलू कर्तव्यों के मोहपाश में पड़ी रहती हैं। वे 8-10 घण्टे घर के बाहर खटती हैं और इतना ही घर के भीतर खटती हैं। वे न तो पति से घरेलू काम में हिस्सेदारी का संघर्ष कर पाती हैं और न ही पति की पिटाई-गाली-गलौच का इंच-इंच जवाब दे पाती हैं। हां जब घरेलू उत्पीड़न असह्य हो जाता है तभी वे किसी बगावत की ओर बढ़ती हैं। अन्यथा तो घर का मोह, उसके सम्मान का मोह उसे सहते हुए भी जीने को मजबूर करता रहता है।
परिवार के साथ-साथ जिस दूसरी चीज का महिमामण्डन हिन्दू फासीवादी करते हैं वह है हिन्दू धर्म। दरअसल दोनों महिमामण्डन न केवल आपस में जुड़े हैं बल्कि एक-दूसरे को मजबूत भी बनाते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार पति परमेश्वर है और महिला का काम उसकी सेवा करना है। तमाम व्रत-त्योहार पति व परिवार की खुशी-दीर्घायु के लिए महिलाओं पर थोपे गये हैं। तमाम चिन्ह-आभूषण पति को खुश करने के औजार के रूप में महिलाओं पर थोपे गये हैं। ऐसे में हिन्दू फासीवादी हिंदू धर्म का महिमामण्डन कर महिलाओं की घरेलू दासता के साथ सामंती संस्थाओं की दासता को भी बढ़ा रहे होते हैं। नतीजा यह निकलता है कि महिलायें जो डॉक्टर-वैज्ञानिक-इंजीनियर सरीखे पेशों में भी हैं वे भी कूपमण्डूकता का शिकार होकर हिन्दू धार्मिक आयोजनों-तरह-तरह की यात्राओं, व्रतों में अधिक डूबी हुयी देखी जा सकती हैं। हिन्दू धर्म के इस महिमामण्डन से संघी ताकतें इन महिलाओं को मुस्लिम धर्म के खिलाफ खड़ा करने का लक्ष्य रखती हैं। वे मुस्लिम धर्म के बारे में अनर्गल बातें कर हिन्दू महिलाओं को भयभीत कर एकजुट करते हैं। संघ की राष्ट्रीय सेविका समिति तो संगठित तरीके से ये काम करती है। इसका परिणाम यह होता है कि हिंदू महिलाओं को मुस्लिम महिलाओं के दुश्मन के बतौर खड़ा कर दिया जाता है। यह इस कदर होता है कि दंगों के वक्त संघी संगठनों की महिलायें मुसलमान महिलाओं के बलात्कार में मदद तक करती पायी जाती हैं।
इसी कूपमण्डूकता का परिणाम यह होता है कि संघी सामंती जमाने से चली आ रही सोच कि ‘बेटी-स्त्रियां परिवार की इज्जत हैं’ को समाज में फैलाने में सफल होते हैं। अब महिला अपनी खुद की मालिक न हो परिवार की ‘इज्जत’ में रूपान्तरित हो जाती है। वे यह नहीं समझ पाती कि ‘परिवार की इज्जत’, ‘देवी’ का तमगा उनके सम्मान नहीं गुलामी का प्रतीक है। इसी इज्जत की कहानी पर संघी लव जिहाद सरीखे झूठ की कहानी रचते हैं और महिलायें मानने लगती हैं कि वे अक्ल से कमजोर हैं जिन्हें कोई मुसलमान युवक प्रेम के झांसे में ले कर बरगला सकता है। यहां तक कि इज्जत की यह गाथा महिलाओं से प्रेम की स्वतंत्रता ही छीन लेती है। क्योंकि ‘इज्जत’ का तकाजा यही है कि महिला घर की मर्जी से ब्याही जाये।
इस तरह संघी हिन्दू धर्म के महिमामण्डन से उसके स्त्री विरोधी चरित्र को महिलाओं से छुपा ले जाते हैं और उन्हें तमाम पुरातन मूल्यों में जीते रहने को मजबूर कर डालते हैं।
जहां तक तीसरी गुलामी का प्रश्न है उस मामले में संघी वर्ग संघर्ष की जगह वर्ग सहयोग के पुजारी हैं। वे मालिक-मजदूर सम्बन्धों को एक-दूसरे के विरोधी की जगह एक-दूसरे के सहयोगी के बतौर पेश करते हैं। इस तरह पूंजी की दासता से संघर्ष को वे क्षरित करते हैं। यह यूं ही नहीं है कि इनका मजदूरों का संगठन भारतीय मजदूर संघ कभी भी आम हड़ताल में भागीदारी नहीं करता है।
देश में महिलायें आज समांग समूह होने के बजाय वर्गों में बंटी हैं। शासक पूंजीपति वर्ग की महिलायें आम तौर पर पहली-दूसरी गुलामी का शिकार नहीं हैं और तीसरे के मामले में तो वे शोषकों की हैसियत में खड़ी हैं। इसीलिए इस वर्ग की महिलायें मूलतः अपनी गुलामी से मुक्त हो चुकी हैं। मध्यमवर्गीय महिलायें पहली-दूसरी गुलामी का अधिक शिकार हैं। इनमें जो कामकाजी हैं वो अपने रोजगार के स्तर के अनुरूप तीसरी गुलामी का भी एक हद तक शिकार हैं वहीं मजदूर वर्ग की महिलायें पूंजी के निर्मम शोषण का शिकार होने के चलते तीसरी गुलामी की अधिक शिकार हैं व उनकी कठोर जीवन परिस्थितियां उन्हें पहली-दूसरी गुलामी के दलदल में डूबने से किसी हद तक बचाये रखती हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि एक संगठित ताकत के बतौर मेहननतकश महिलायें ही नारी मुक्ति का झंडाबरदार बनेंगी। हालांकि कहना होगा कि संघी दुष्चक्रों की ये मेहनतकश महिलायें भी किसी हद तक शिकार हो रही हैं।
संघी फासीवादियों के इन दुष्चक्रों का मुकाबला आज नारी मुक्ति योद्धाओं के लिए जरूरी है। 8 मार्च : अंतर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस दुनिया भर की महिलाओं की मुक्ति के लिए संकल्प का दिन है। आज भारत में हम यह दिवस एक ऐसे वक्त में मना रहे हैं जब एक ओर समाज में महिला प्रश्न पर मुखरता पैदा हो रही है वहीं दूसरी ओर संघी शासन में पूंजीवादी संस्थायें भी सामंती खापों की तरह बर्ताव करने लगी हैं। एक न्यायाधीश योनि के ऊपर वीर्य पतन को बलात्कार मानने से इंकार कर रहा है तो दूसरी ओर गुजरात सरकार शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए माता-पिता की अनुमति अनिवार्य बनाने पर तुली है। नेताओं-मठाधीशों के महिलाओं के बारे में अनाप-शनाप बातों का तो तूफान सा आया हुआ है।
8 मार्च इस बात का प्रतीक दिन है कि महिलाओं की मुक्ति पूंजीवाद के खात्मे व समाजवाद की स्थापना से जुड़ी हुई है। समाजवादी क्रांति के बगैर महिलाओं की मुक्ति संभव नहीं है। ऐसे में इस समाजवादी क्रांति के लिए महिलाओं की लामबंदी के लिए जरूरी है कि महिलाओं को उनकी तिहरी गुलामी के प्रति सचेत-जागरूक किया जाये। संघी फासीवादियों के घरेलू दासता-हिन्दू धर्म के महिमामण्डन का धैर्य के साथ जवाब दिया जाये। महिलाओं के इनके नफरती चंगुल से बाहर लाने के साथ-साथ पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लामबंद किया जाये। इतिहास की अग्रगति महिला मुक्ति के साथ है। फासीवादी ताकतों के लाख कुकर्म इस अग्रगति को रोक नहीं सकते।