मोदी फजीहत से बचे पर कब तक..

महिला पहलवान विनेश फोगाट ओलंपिक मेडल जीतते-जीतते रह गयीं। 50 किलो भार वर्ग में 100 ग्राम वजन ज्यादा होने से उन्हें फाइनल में पहुंचने के बाद भी अयोग्य करार दिया गया। ये वही विनेश फोगाट हैं जो कुछ समय पहले दिल्ली की सड़कों पर कुश्ती संघ के अध्यक्ष व भाजपा सांसद बृजभूषण सिंह के खिलाफ संघर्ष चला रही थीं। और मोदी सरकार उन पर लाठियां बरसा रही थी। 
    
विनेश फोगाट को ओलंपिक में न जाने के लिए सारी तिकड़में रची गयीं। उनके 53 किलो भार वर्ग में एक ऐसी पहलवान का चयन कर दिया गया जो न केवल पहले मुकाबले में ही 10-0 से हार गयी बल्कि ओलम्पिक गांव में अपने कार्ड पर धोखे से अपनी बहन को घुसाने की आरोपी बन भारत के दल की फजीहत का कारण भी बनी। विनेश को मजबूरन 50 किलो वर्ग में खेलना पड़ा। इस वर्ग में भी उन्हें समय से कोच-फिजियो मुहैय्या नहीं कराये गये।
    
अंततः जब ओलंपिक में फोगाट विश्व चैंपियन व यूक्रेन चैम्पियन को हरा रही थी तब उसके कुश्ती के दांव केवल विरोधी महिला खिलाड़ी ही नहीं भारत में बैठे बृजभूषण सिंह और उनके आका प्रधानमंत्री मोदी को भी महसूस हो रहे थे। इन दांवों को पितृसत्ता की पुजारी संघ-भाजपा भी महसूस कर रही थी। दिन के अंत तक फोगाट फाइनल में पहुंच चुकी थी व उनका कम से कम सिल्वर मेडल पक्का हो चुका था। ऐसे में खिलाड़ियों को तत्काल बधाई देने वाले मोदी के मुख से एक शब्द भी नहीं फूटा। वे विनेश से सामना होने के भय से कुछ भी बोलने से बचे रहे। लोगों ने भी सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री व फोगाट के आमने-सामने होने पर मोदी क्या करेंगे, इस पर टिप्पणी देनी शुरू कर दी।
    
पर शायद मोदी का भाग्य अच्छा था। अगले दिन फाइनल से पहले फोगाट की अयोग्यता की खबर आयी और मोदी तनाव से मुक्त हो गये। उन्होंने झट से ट्वीट कर फोगाट को सांत्वना देते हुए उनकी तारीफ कर डाली। उन्हें भारत की बेटी कह डाला। 
    
पर मोदी का दिल जानता था कि वे फजीहत से बच गये। पर आखिर कब तक? एक दिन फिर भारत की पितृसत्ता को ललकारने वाली किसी बहादुर बेटी का उन्हें सामना करना ही पड़ेगा। उस दिन का इंतजार है। 

आलेख

/capital-dwara-shram-par-kiya-gaya-sabase-bhishan-hamala

मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है। 

/barbad-gulistan-karane-ko-bas-ek-hi-ullu-kaafi-hai

सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

/amerika-izrayal-ka-iran-ke-viruddha-yuddh

अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा।