मासा के आह्वान पर देश भर में प्रदर्शन

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मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA), जो देश भर के 14 जुझारू मजदूर संगठनों, यूनियनों और फेडरेशन का एक समन्वय मंच है, ने हाल में लागू किए गए नए मजदूर-विरोधी 4 लेबर कोड के खिलाफ 14 दिसम्बर को जोरदार विरोध प्रदर्शन और रैलियों का आयोजन किया, और विभिन्न राज्यों (दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु और कर्नाटक) के बड़े शहरों (दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, पटना, लखनऊ, बरेली, भुवनेश्वर, कुरुक्षेत्र, लुधियाना, हरिद्वार और रुद्रपुर, दावणगेरे, गुलबर्गा वगैरह) में ‘‘अखिल भारतीय मजदूर अधिकार दिवस’’ मनाया।
    
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर, भारी पुलिस दबाव के बावजूद, दिल्ली तथा हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान के आस-पास के क्षेत्रों से एक हजार से अधिक मजदूर शामिल हुए, जिनमें विभिन्न शहरी, औद्योगिक और ग्रामीण क्षेत्रों के आटोमोबाइल मजदूर, गारमेंट मजदूर, इलेक्ट्रानिक्स मजदूर, घरेलू कामगार, मनरेगा मजदूर, निर्माण मजदूर, एमएसएमई मजदूर, गिग मजदूर, स्कीम मजदूर शामिल थे। वक्ताओं ने इस बात पर प्रकाश डाला कि 21 नवंबर को देश भर के श्रमिक संगठनों और ट्रेड यूनियनों के सभी विरोधों, चेतावनियों और अपीलों को नजरअंदाज करते हुए मोदी सरकार ने अहंकारपूर्वक विदेशी और भारतीय बड़े पूंजीपतियों के हित में बनाए गए चार श्रमिक-विरोधी श्रम कोड लागू कर दिए। इन चार लेबर कोड का मकसद स्थायी नौकरियों को खत्म करना, ‘‘हायर एंड फायर’’ की सुविधा देना, यूनियनबद्ध श्रम को खत्म करना, काम के घंटे बढ़ाना, श्रम संरक्षणों को वापस लेना, लेबर कोर्ट और लेबर विभाग को खत्म करना, ट्रेड यूनियन आंदोलन का अपराधीकरण, मजदूरों की कार्य सुरक्षा में कटौती और उनकी असुरक्षा में वृद्धि करना है। ये श्रम संहिताएं भारतीय मजदूर वर्ग द्वारा लगभग एक सदी तक लड़े गए ट्रेड यूनियन संघर्षों से हासिल किए गए अधिकारों को एक ही झटके में छीन लेने की ताकत रखती हैं। यह मजदूरों को अधिकारविहीन नग्न गुलामी की तरफ धकेलने का सुनियोजित प्रयास है, जिसमें आगामी पीढ़ियों के सपनों और उम्मीदों का गला घोंट दिया जाएगा। यह केवल नीतिगत प्रस्ताव नहीं- यह मजदूर वर्ग पर संगठित, खतरनाक और जालिमाना हमला है, एक वर्गीय युद्ध है जिसे मजदूरों के प्रतिरोध और एकजुट संघर्ष से ही रोका जा सकता है।
    
यह भी बताया गया कि श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी ड्राफ्ट राष्ट्रीय श्रम एवं रोजगार नीति (ड्राफ्ट श्रम शक्ति नीति, 2025) एक और मजदूर विरोधी कदम है। यह नीति मनुस्मृति से प्रेरणा लेती है, जो आधुनिक, वैज्ञानिक और संवैधानिक श्रम नीति के उलट है। आज भारत का मजदूर वर्ग और अन्य मेहनतकश जनता इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। एक ओर, कारपोरेट पूंजीपतियों का मुनाफा आसमान छू रहा है, वहीं दूसरी ओर, मजदूरों को नौकरी से निकाला जा रहा है, उनकी मजदूरी कम की जा रही है, काम के घंटे बढ़ाए जा रहे हैं और उनके सम्मान पर व्यवस्थित रूप से हमला किया जा रहा है। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों, बैंक और बीमा का निरंतर निजीकरण कर रही है और जनता से जरूरी सामाजिक सेवाएं छीन ली हैं।
    
मजदूर वर्ग की एकजुट शक्ति को कमजोर करने के लिए, शासक वर्ग जानबूझकर सांप्रदायिकता, जातिवाद और अंधराष्ट्रवाद का जहर फैला रहा है। ये विभाजनकारी ताकतें पूंजीपति वर्ग के वैचारिक हथियार हैं जो मजदूर वर्ग की एकता को तोड़ते हैं और मजदूरों के गुस्से को उनके असली दुश्मनों- शोषकों और उत्पीड़कों- से दूर करते हैं। इस संदर्भ में, मासा नए लेबर कोड को रद्द करने, मजदूरों के कठिन संघर्षों से अर्जित अधिकारों की रक्षा करने, और फासिस्ट हमलों व पूंजीवादी शोषण-जुल्म से लड़ने के लिए पूरे भारत में जुझारू, निरंतर और निर्णायक संघर्ष को आगे बढ़ाने का आह्वान करता है।
    
प्रदर्शन में रु. 30,000 प्रतिमाह न्यूनतम वेतन, सभी मजदूरों के लिए स्थाई और सुरक्षित रोजगार तथा सभी श्रम कानूनों के संरक्षण की मांग भी उठाई गई, तथा निजीकरण, बेरोजगारी, महंगाई, व विभाजनकारी सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ बुलंद आवाज उठाई गई।
    
देश के दूसरे हिस्सों में भी अखिल भारतीय मजदूर अधिकार दिवस के तहत ऐसे ही कार्यक्रम हुए, जिसमें मजदूरों ने नए लेबर कोड के खिलाफ़ जुझारू निर्णायक संघर्ष को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।         -विशेष संवाददाता

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