फिर ये बिलबिलाहट क्यों?

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इन दिनों भारतीय प्रचार माध्यमों और संघी मानसिकता वाले लोग दीपू चन्द्र दास की हत्या पर बहुत दुःखी लग रहे हैं। हालांकि इन दोनों को दीपू चन्द्र दास से कोई लेना-देना नहीं है। सिवाय इसके कि दीपू चन्द्र दास दो वजहों से उनके साम्प्रदायिक एजेंडे में फिट बैठता है। 
    
पहला पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं सो मोहनभागवत से लेकर मोदी तक सभी बंगाल में जाकर मुसलमानों के अत्याचारों का जिक्र कर रहे हैं। दूसरा भारत के सतत साम्प्रदायिक व नफरती राजनीति के एजेंडे में भी वो फिट बैठता है। 
    
दीपू चन्द्र दास एक बांग्लादेश का नागरिक था जिसकी साम्प्रदायिक व कट्टरपंथियों की भीड़ ने पीट पीटकर हत्या कर दी अर्थात् मॉब लिंचिंग कर दी। उस पर मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का कथित आरोप था। ऐसी हिंसक घटना केवल मयमन सिंह क्षेत्र (बांग्लादेश) में ही नहीं हुई। बांग्लादेश के चिटगांव व आस-पास के क्षेत्रों में भी हिन्दू परिवारों के घरों को जलाने की घटनायें हुईं तथा उनकी सम्पत्तियों को भी नुकसान पहुंचाया गया। 
    
क्या हिन्दू कट्टरपंथियों और साम्प्रदायिक भारतीय मीडिया को बांग्लादेश में होने वाली साम्प्रदायिक हिंसा पर बोलने का कोई हक है? क्या सच में हिन्दू कट्टरपंथियों को दुनिया के दूसरे हिस्सों में रहने वालों के हकों के लिए बोलने का अधिकार है? 
    
इसका एक ही उत्तर हो सकता है, नहीं। अगर धर्म के आधार पर एकजुटता प्रदर्शित करना भारतीय हिन्दू कट्टरपंथियों का अधिकार है तो हिन्दुस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा, दमन और उत्पीड़न पर बोलने का अधिकार मुस्लिम बहुल या ईसाई बहुल देशों को क्यों नहीं। अगर भारत के संघी कट्टरपंथियों को और भाजपा सरकार को बांग्लादेश व पाकिस्तान के हिन्दुओं के उत्पीड़न व मॉबलिंचिंग के विरुद्ध बोलने का नैतिक अधिकार है तो सम्भवतः बांग्लादेश व पाकिस्तान के मुस्लिम कट्टरपंथियों व वहां की कट्टरपंथी सरकारों को भी यह नैतिक अधिकार है वे पहलू खान, अखलाक, अलीमुद्दीन अंसारी, जुनैद खान, तरवेज अंसारी एवं अफराजुल की मॉब लिंचिंग पर बोलें। 
    
जाहिर है मॉब लिंचिंग गलत है, भीड़तंत्र गलत है, नफरत बुरी है, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार गलत है चाहे वह कहीं भी, किसी देश में हो। कट्टरपंथी चाहे किसी भी देश के हों वे देश के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक हैं। वे समाज की एकता को, सामाजिक सद्भाव को तोड़ते हैं। समाज में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए वे आपस में झगड़ा लगाते हैं, संगठित हत्यायें करते हैं। 
    
जब वे सत्ता में आ जाते हैं या सत्तायें उनका समर्थन करती हैं तब वही होता है जो इन दिनों में क्रमशः भारत व बांग्लादेश में हो रहा है। ये कट्टरपंथी व समाजविरोधी तत्व पूरी तरह सरकारी संरक्षण में बेलगाम हो जाते हैं। वे कानून की धज्जियां सरेआम उड़ाते हैं। मजेदार यह है जब वे बांग्लादेश के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे थे ठीक उसी दौरान देश में वे चर्च में तोड़फोड़ कर रहे थे, चर्च में हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे और उस पर भी पाखंड का सबसे बेशर्म चेहरा चर्च पहुंच जाता है। ऐसी घिनौनी राजनीति इस देश का ‘साहेब’ ही कर सकता है। 
    
बांग्लादेश ने तो तब भी दीपू चन्द्र दास की हत्या को ‘फास्ट ट्रेक कोर्ट’ में चलाने की घोषणा की है, पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने भीड़ द्वारा 100 साल पुराने मंदिर को भीड़ द्वारा तोड़े जाने पर उसे फिर से बनाने का आदेश दिया। परंतु भारतरूपी महान लोकतंत्र में भीड़ द्वारा मारे गये अखलाक के हत्यारों से सरकार ही मुकदमा वापसी की पैरवी कर रही थी और देश का सर्वोच्च न्यायालय बाबरी के विध्वंसकों को उन्हीं के पक्ष में फैसला सुनाकर हिन्दू कट्टरपंथियों के आगे आत्मसमर्पण कर रहा था। 
    
सही बात तो यह है कि भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश सभी देशों के कट्टरपंथी एक-दूसरे के सच्चे सहयोगी हैं। केवल एक देश के भीतर ही कट्टरपंथी एक-दूसरे को खाद-पानी मुहैय्या नहीं कराते जैसा कि भारत में दोनों धर्मों के कट्टरपंथी एक-दूसरे को जीवित रखते हैं। केवल एक का अस्तित्व संभव ही नहीं है। यही बात देशों के मामलों में भी किन्हीं विशेष स्थितियों में सच है। पाकिस्तान व बांग्लादेश का कट्टरपंथ भारत के कट्टरपंथ से भी खाद-पानी लेता है और भारत के कट्टरपंथी भी अपनी बारी में बांग्लादेश व पाकिस्तान के कट्टरपंथियों से खाद-पानी लेकर बढ़ते हैं। वे एक-दूसरे के नाम पर अपने-अपने देशों की जनता को बरगलाते हैं और अपने अभीष्ट अर्थात् सत्ता प्राप्ति के मार्ग को सुलभ बनाते हैं। 
    
सबसे मजेदार यह है कि तीनों देशों के कट्टरपंथियों को अपने देश की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक समस्याओं पर बात  करने से डर लगता है जबकि वे दूसरे देशों की समस्याओं के बारे में ज्यादा बात करते हैं। भारत के कट्टरपंथियों और साम्प्रदायिक मीडिया की खबरों में इसे विशेष रूप से देखा जा सकता है। भारत में तो मॉब लिंचिंग के साथ सरकार लिंचिंग भी जारी है। भाजपा की सरकारें स्वयं अल्पसंख्यकों के घरों, दुकानों व अन्य प्रतिष्ठानों पर बुलडोजर चलवा रही हैं। मॉब लिंचिंग करने वालों का या तो समर्थन कर रही हैं या उनको पुरस्कृत करते हुए उनको अपनी पार्टी में शामिल कर रही हैं। वे अल्पसंख्यकों के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक हकों पर चोट पहुंचा रही हैं। 
    
वे लोग जो इन पाखंडी हिन्दू कट्टरपंथियों के बहकावे में आकर उनकी राजनीति के प्रचारक बन रहे हैं इसमें इन सभी देशों के मध्यमवर्गीय तबके की बड़ी भूमिका है। वे जनता होकर भी शासकों की राजनीति के शिकार हो रहे हैं। 
    
बहुसंख्यक समुदाय अल्पसंख्यकों की मॉब लिंचिंग पर चुप्पी साधकर अपनी लिंचिंग का भी रास्ता सुगम कर रहा है। किसी देश के अंदर कितना जनवाद है यह इससे भी पता चलता है कि उस देश की सरकार अल्पसंख्यकों के साथ कैसा बर्ताव करती है और इससे भी पता चलता है कि बहुसंख्यक समाज अपने अल्पसंख्यकों के हितों का कैसे संरक्षण करता है। अगर हम भारत को बेहतर देश बनाना चाहते हैं तो बहुसंख्यकों को स्वयं अपने कट्टरपंथियों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ेगा। 

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