शंघाई शिखर सम्मेलन : दुनिया बढ़ती साम्राज्यवादी होड़ की ओर

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अभी 31 अगस्त और 1 सितम्बर के चीन के शहर तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (एस.सी.ओ.) का अब तक का सबसे बड़ा शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। शंघाई सहयोग संगठन की शुरूवात एक छोटे से क्षेत्रीय संगठन के बतौर हुई थी, लेकिन पिछले दो दशक से थोड़ा ज्यादा समय के अंदर यह एक वैश्विक संगठन के बतौर उभरकर सामने आ गया है। अगर इसके सहयोगी संगठन ब्रिक्स के साथ मिलाकर देखा जाए तो यह सही मायने में एक वैश्विक ताकत के बतौर उभर चुका है। इन दोनों संगठनों के केन्द्र में नयी उभरी साम्राज्यवादी ताकत चीन है। इन संगठनों के जरिये चीनी-रूसी साम्राज्यवादी अमेरिकी साम्राज्यवादियों के वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी एक गिरती हुई ताकत तो है लेकिन वह अभी भी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़ी सामरिक शक्ति है। इसके बल पर वह समूची दुनिया में अपने वर्चस्व को कायम रखना चाहते हैं। 
    
लेकिन अब यह आसान नहीं है। एक प्रतिद्वन्द्वी आर्थिक शक्ति चीन मैदान में है। चीन का  कोई उत्पीड़नकारी आधुनिक इतिहास नहीं रहा है। वह खुद उत्पीड़न का शिकार रहा है। आज वह इसका इस्तेमाल करके वैश्विक पैमाने पर अपने साम्राज्यवादी डैने फैला रहा है और तरह-तरह के मोर्चे बना रहा है। 
    
चूंकि समूची दुनिया में पूंजीवादी सत्तायें हैं और आज की दुनिया पहले की तुलना में ज्यादा एकीकृत है तो दुनिया भर के शासकों-पूंजीपति वर्ग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी न किसी गठबंधन के साथ खड़ा रहना है और अपने विकल्पों को भी बनाये रखना है। 
    
आज चीनी और रूसी साम्राज्यवादियों का गठजोड़ अमरीकी साम्राज्यवादियों के समक्ष एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा हो रहा है और क्रमशः मजबूत होने की ओर बढ़ रहा है। 
    
चीन के तियानजिन में हुआ यह शिखर सम्मेलन इसी चुनौती को पेश करने का एक बड़ा प्रयास है। 
    
यह एक ऐसा प्रयास है जो अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की स्वीकृति चाहता है और उन्हें मजबूत करने की वकालत करता है। संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन और जलवायु परिवर्तन पर बनी संस्था को कायम रखने और मजबूत करने की हिमायत करता है। यह अजीब विरोधाभास है कि अमरीकी साम्राज्यवादी जिनकी इन संस्थाओं के निर्माण में अग्रणी भूमिका रही है, वे इन संस्थाओं को कमजोर कर रहे हैं और इनसे बाहर हो रहे हैं। वहीं चीनी शासक जो लम्बे समय तक इन संस्थाओं से बाहर रखे गये थे, आज साम्राज्यवादी बनने के बाद इन संस्थाओं के प्रबल हिमायती हो गये हैं। उनके इन कदमों का न सिर्फ रूसी साम्राज्यवादी बल्कि दुनिया की अधिकांश पूंजीवादी हुकूमतें समर्थन करती हैं। 
    
यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि यह गठबंधन मजबूत होता जा रहा है। 
    
चीनी और रूसी साम्राज्यवादी इस गठबंधन को मजबूत करने के साथ-साथ इसे और ज्यादा शक्तिशाली बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को ज्यादा जनतांत्रिक बनाने का प्रयास भी कर रहे हैं। 
    
ऐसा लगता है कि अब साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा और टकराव की ओर जायेगी। 

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