सवालों से भागती मोदी सरकार

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बीते दिनों संसद के दोनों सदनों में आपरेशन सिंदूर पर चर्चा हुई। इस चर्चा में विपक्ष द्वारा उठाये गये एक भी सवाल का जवाब देने की मोदी सरकार ने जरूरत नहीं समझी। सवालों के जवाब में मोदी सरकार कांग्रेस द्वारा अतीत में किये फैसलों को कठघरे में खड़ा करती रही और नेहरू-इंदिरा-राजीव को कोसने में जुटी रही। 
    
विपक्षी इंडिया गठबंधन ने पहलगाम हमले के वक्त पर्यटकों की सुरक्षा में सैन्य-पुलिस बल न होने, युद्ध विराम की घोषणा ट्रम्प के दबाव में होने, भारत के विमानों के गिरने संदर्भी प्रश्न उठाये पर मोदी सरकार ने इनमें से एक का भी जवाब 16 घण्टे की बहस में नहीं दिया। 
    
उक्त सवालों को छोड़ पक्ष-विपक्ष सेना की वाहवाही करने, पाकिस्तान को कोसने, चीन को कोसने में एकमत रहे। यहां तक कि संसदीय वामपंथी दल भी भारत-पाक युद्ध का विरोध करने के बजाय अंधराष्ट्रवादी उन्माद के आगे आत्मसमर्पण करते नजर आये। इसी तरह कश्मीर के एकाध सांसदों को छोड़ किसी ने भी युद्ध के दौरान कश्मीरी अवाम के घरों के ध्वस्त होने, एक दर्जन से अधिक भारतीयों की मौत, 2000 से अधिक कश्मीरियों की गिरफ्तारी, कई कश्मीरियों के घर विस्फोटकों से ध्वस्त होने के मसले नहीं उठाये। 
    
इस चर्चा ने दिखाया कि भारतीय संसद में बैठे सभी दल आतंकवाद, अंधराष्ट्रवाद के मुद्दे पर मूलतः एक ही भाषा बोल रहे हैं। सभी हर आतंकी घटना के पीछे पाकिस्तान के हाथ होने के मोदी सरकार के बगैर किसी सबूत के नैरेटिव को स्वीकार रहे हैं। सबके लिए पाकिस्तान को सबक सिखाना जरूरी काम रहा। यहां तक कि कांग्रेस अपने पूर्व गृहमंत्री पी चिदम्बरम के इस बयान से भी पल्ला झाड़ती नजर आयी कि हो सकता है कि आतंकी देश में ही पैदा हुए हों। 
    
विपक्षी दलों ने आपरेशन सिंदूर पर एक भी देश के भारत के साथ न खड़े होने का मसला तो उठाया पर वे यह नहीं देख पाये कि इसकी सबसे बड़ी वजह पहलगाम हमले में पाक का हाथ होने का भारतीय शासकों के पास कोई सबूत न होना था। इसीलिए दुनिया ने पहलगाम हमले की तो निन्दा की पर पाकिस्तानी हाथ होने के मोदी सरकार के बगैर किसी सबूत के दावे को स्वीकार नहीं किया। 
    
इसी तरह पहलगाम हमले के वक्त सुरक्षा बलों की नामौजूदगी, धर्म पूछ कर हत्या और इस हमले का भाजपा को होने वाला लाभ आदि इसके पुलवामा की तरह राजनैतिक लाभ की संभावना हेतु रचे हत्याकाण्ड की भी संभावना छोड़ते हैं। पर यह प्रश्न पूछने का साहस किसी विपक्षी दल ने नहीं दिखाया। 
    
सरकार के मंत्रियों और स्वयं मोदी की भाषा ने बता दिया कि ये संसद के प्रति भी कोई जवाबदेही नहीं रखते। संसद को इन्होंने चुनाव प्रचार का मंच बना दिया। लम्बे-लम्बे भाषणों में विपक्ष के एक भी सवाल का जवाब देने की इन्होंने जरूरत भी नहीं समझी। सरकार न तो पहलगाम हमले में इंटेलिजेन्स विफलता, सुरक्षा बलों की गैर मौजूदगी पर कुछ बोलने को तैयार हुई और न ही यह बताने को तैयार हुई कि भारत को युद्ध में कितना नुकसान हुआ, कितने विमान गिरे। 
    
चर्चा के बहाने सरकार ने दिखा दिया कि वह खुद भले ही ट्रम्प के आगे घुटने टेक चुकी हो पर संसद में लफ्फाजी, नेहरू खानदान को कोसने में व सवालों पर कुछ न बोलने में उसे कोई शर्म तक नहीं है। 
    
भारत के फासीवादी शासकों की यही असलियत है और विपक्षी दल उसके अंधराष्ट्रवाद के आगे आत्मसमर्पण कर रहे हैं। भारत-पाक दोनों के शासकों को अंधराष्ट्रवाद और परस्पर टकराव से अपनी-अपनी जनता को बुनियादी मुद्दों से दूर करने में मदद मिलती रही है। जहां तक दोनों देशों की जनता का प्रश्न है तो ऐसा कोई भी टकराव व युद्ध उनके हितों के विरुद्ध है। युद्ध में दोनों ओर की जनता की ही बलि चढ़ाई जाती है। अतः ऐसे किसी भी टकराव व युद्ध का विरोध जरूरी है। 

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।