आज दिनांक 31 मई तम्बाकू निषेध दिवस है। यह हिन्दुस्तान नामक अखबार में आया है। मैं हिन्दुस्तान नामक दैनिक अखबार का पाठक हूं। इसे पढ़कर मुझे तम्बाकू के बारे में लिखने की कुछ ऊर्जा मिली। चूंकि मैं कई दिन से इसी विषय पर लिखने का काम हाथ में लेने का सोच रहा था। पर शुरू कहां से कैसे करूं मुझे कोई राह नहीं दिखाई दे रही थी। चूंकि मेरा लक्ष्य विश्व के मानव समाज को समेटना नहीं था बल्कि भारत के एक छोटे समूह के अंदर की उसी तम्बाकू से सम्बन्धित समस्या थी और अभी है। विश्व की समस्या तो विकराल होती है पर विश्व के अंदर भारत और भारत के अंदर एक समूह जो मानव समाज के अन्तिम लक्ष्य की बात कर रहा हो, उसकी बात करने की हिमाकत कर रहा हूं।
तम्बाकू, बीड़ी से मेरे ही परिवार के चार लोगों की मृत्यु कैंसर, दमा, अस्थमा से बेसमय अर्थात औसत उम्र पूरा किये बिना हो गयी। चूंकि परिवार में वे लोग अभिभावकों का पद ग्रहण किये हुए थे तो छोटे बच्चों को उन्हें समझाने की समझ भी नहीं थी। न वे जानते थे कि तम्बाकू से इतनी जान लेवा बीमारी हो सकती है। अतः जीवन और परिवार यों ही चलता रहा और वे लोग तम्बाकू-बीड़ी का सेवन करते रहे। एक-एक करके काल के गाल में समाते चले गये। गांव समाज में भी तम्बाकू का चलन इस प्रकार था कि कोई मेहमान आये तो उसकी आवभगत में चाय और गुड़गुड़ाता हुक्का ही पेश किया जाता था। भला जब पूरे समाज का परिवेश ही ऐसा हो तो स्वास्थ्य की समझ रखने वालों का तो नाम ही नहीं था।
आज जब मैं उस समाज से बाहर निकल दुनिया की खबरों को पढ़ने लगा तब अब समझ में आ रहा है कि तम्बाकू कितना हानिकारक है। पर आज भी समाज में तम्बाकू की भिन्न-भिन्न वैराइटी बाजार में बिक रही हैं। पर सुनने वाला कौन है। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं एक दिन तम्बाकू निषेध दिवस मना कर अपने कार्यभार की इतिश्री कर देती हैं। और देश की कुछ सामाजिक संस्थायें हैं जो केवल समाज में अपनी छवि को चमकाने के लिए अखबारों में फोटो खिंचवाकर तम्बाकू निषेध का एक दिन प्रचार कर इतिश्री कर लेती हैं। सरकार का तो नाम मत लीजिए। यह सरकार तो निरी व्यापारी चरित्र की है यह तो सिर्फ मुनाफा, मुनाफा ही देखती है, चाहती है। भले ही देश में देह व्यापार क्यों न चल रहा हो। वाजपेयी जी ने तो वेश्याओं का नाम बदलकर सेक्स वर्कर ही रख दिया था। समाज संचालन करने वाले ही जब इस प्रवृत्ति के हों तो भला राम ही बचाये इस समाज को।
फिर एक बार अपने परिवार की तरफ लौटता हूं। जब मैं इन सब बुराईयों से अनजान था तो मेरे परिवार के लोगों की मृत्यु पर मैं केवल आंसू बहा कर ही रह गया। जो कुछ भी शोक संतप्तता थी कुछ दिनों बाद वह भी विलुप्त हो गयी जीवन अपने पुराने ढर्रे पर चलने लगा। परन्तु इतना दुख नहीं हुआ जितना अपने संगठन के तीन साथी इसी के शिकार हुए। मेरी दीदी मरी, मेरे चाचा मरे इसी के सेवन से पर आज तक मुझे उतनी वेदना नहीं हुई जितना संगठन के सदस्यों की तम्बाकू से मौत पर हुई। एक साधारण मानव जो कि एनीमल स्प्रिट का ही होता है उसका जाना उतना नहीं खलता भले ही उससे रक्त सम्बन्ध हो पर एक सदस्य जो संगठन का हो उसका जाना ज्यादा दुखदाई होता है क्यों कि जिस काम में हम लगे हैं उस काम में लगे एक भी सिपाही का चला जाना कितना खलता है यह मेरे दिल से कोई पूछे।
मानव ही क्या विश्व में हर कोई निरपेक्ष नहीं, साथ ही जिस ग्रह (पृथ्वी) में हम रहते हैं वह खुद निरपेक्ष नहीं, जो ग्रह खुद जिस विश्व (सौर मण्डल) का हिस्सा है वह विश्व भी निरपेक्ष नहीं, फिर इसी तरह गैलेक्सी मिल्की वे की भी बात है। अब मनुष्य निरपेक्ष या उसका व्यवहार निरपेक्ष नहीं हो सकता। व्यवहार खुद सापेक्ष ही होता है। निरपेक्ष की कल्पना करना खैर कल्पना ही होगी। मैं भी इस पर जोर दे कर कह रहा हूं। और हर एक का व्यवहार परिवेश का ही हिस्सा होता है। मानव परिवेश का दास होते हुए भी क्षमता रखता है। ज्यादातर परिवेश से ही उसकी प्रकृति निर्धारित होती है। और होनी चाहिए।
अब जब दास प्रथा खत्म हो गयी है। (हालांकि मैं अभी भी दासता की मौजूदगी महसूस करता हूं) इसे मानव ने ही उस ओर धकेला है।
तो ऐसा परिवेश जिसमें रोग लग गया हो उसका उपचार करना भी मानव का कर्तव्य है। हमारा समूह ऐसे ही परिवेश का उपचारक है तो हर हाल में कोशिश हो कि हमारे परिवेश (हमारे समूह-संगठन) के अंदर अगर किसी में खाने-पीने की प्रकृति में विकृति आ गयी हो, जो खुद व्यक्ति के लिए ही नहीं वरन पूरे समाज के लिए जहर हो तो उसे उपचार देना ही होगा।
एक आशु विश्वासी (अंधविश्वासी) किस तरह अपने विश्वास के प्रति समर्पित होता है यह वैसे बायलॉजी का विषय है। फिर भी प्रत्यक्ष जो देखने को मिलता है, कि ऐसा विश्वासी दिमागी अंधा होकर अपना सब कुछ (तन, मन, धन) अपने लक्षित विश्वास को समर्पित कर देता है। यह विश्वास किसी भी क्षेत्र के लिए लागू हो सकता है, जैसे सांस्कृतिक या धार्मिक क्षेत्र, राजनीतिक क्षेत्र हो या अन्य क्षेत्र परन्तु संगठन के साथी आत्मपरक भौतिकवादी या वस्तुपरक भौतिकवादी हैं।
यह मैं तय नहीं कर पा रहा हूं। आप जानते हैं कि तम्बाकू हानिकारक है। शरीर विज्ञान स्पष्ट कर चुका है, फिर आप कौन से विश्वासी हैं। विज्ञान पर विश्वास करने वाले हैं या आशु विश्वास पर। आपकी कार्य शैली को मैं वर्गीकृत नहीं कर पा रहा हूं। आपका व्यवहार एक तरफ विज्ञान की धारा पर चलने जैसा है दूसरी तरफ आशु विश्वास पर....। विज्ञान की शाखा वाला वैश्विक दृष्टिकोण वाला (अंतिम लक्ष्य वाला) होता है। और वही अवैज्ञानिक धारा वाला, ढुलमुल या रूढ़ धारा का। एक ओर आप अंतिम लक्ष्य वाली शैली के मालूम पड़ते हैं, दूसरी तरफ अन्तिम लक्ष्य कुछ नहीं वाली धारा के जैसे/चूंकि अगर आप अंतिम लक्ष्य वाली धारा के हैं तो यह आपका शरीर निरपेक्ष ही नहीं वरन सापेक्ष ही नहीं बल्कि अंतिम लक्ष्य वाले समूह के शरीर के परमाणु, क्वान्टम हैं। मैंने अंतिम लक्ष्य वाले समूह की एक शरीर के रूप में कल्पना की है- उपमा के लिए।
अगर आप अपने शरीर को अलग सोच रहे हैं और उसे तिल-तिल क्षरण की ओर ले जा रहे हैं, तो यह आपके अधिकार क्षेत्र के बाहर की चीज है। आपको कुछ होता है तो पूरे शरीर (संगठन) में सिहरन पैदा होती है। आप जिस चीज का सेवन कर रहे हैं उससे उस परमाणु का क्षरण हो रहा होगा। हालांकि यह आपको अहसास (महसूस) नहीं हो रहा होगा। आप जिस समूह के अंग हैं। उस हिसाब से यह आपका शरीर आपका ही नहीं वरन पूरे समूह का अंग है। आप अगर अपने को इस गति से अलग नहीं करते हैं तो पूरे शरीर (संगठन) का भी क्षरण शुरू हो जायेगा।
निजी-सार्वजनिक का यह कैसा द्वन्द्व है, यहां सार्वजनिक पक्ष कमजोर पड़ रहा है। निजी पक्ष मजबूत। निजी के पक्ष में समस्या हल हो रही है। यह कैसा त्याग, यह कैसा रास्ता, कहने को, दिखाने को पूर्ण जीवन दमितों के लिए पर समस्या का निदान निजी के पक्ष में। समझ में मेरे नहीं आ रहा। क्या एंगेल्स की आत्मा को पुनर्जीवित करके पूछा जाये कि यह द्वन्द्व कैसे हल होगा। साथियों का एक-एक पल भी बहुमूल्य, अनमोल, बेजोड़ है, यह साथी का समय नहीं समूह का समय है। समूह का ही नहीं उन पीड़ितों का भी समय है जो अत्याचारी शासन से दमित हैं। शोषण की मुक्ति की कामना लिए ऐसे समूह की ओर टकटकी लगाए आस भरी नजरों से निहार रहे हैं। और सोच रहे हैं कि कहीं तो है पथ प्रदर्शक। पर जब पथ प्रदर्शक ही भ्रमित हो जाये, निजी स्वार्थ से ग्रसित हो जाये तो उन नजरों का क्या होगा जो आपकी तरफ आस भरे टकटकी लगाये बैठी हैं।
साथी भूल गये क्या गाजा पट्टी में निर्दोष 22,000 मासूम बच्चों की कत्लेआम की दास्तां और कई हजार महिलाओं की हत्या, अपहरण। एक वाकया दक्षिण कोरिया का, वहां महिलाओं को वहीं के प्रशासन द्वारा अमेरिकी सैनिकों की हवस पूरा करने के लिए वहीं की सरकार द्वारा दिया गया आदेश जो कि सैनिकों के कैम्पों में रात में उनकी हवस पूरी करने के लिए भेजी जाती थीं। भूल गये क्या वियतनाम की आजादी की लड़ाई में वहां की महिलाओं का अमेरिकी सैनिकों द्वारा अपनी हवस का शिकार बनाना। भूल गये क्या इन्दिरा गांधी के शासन काल की दास्तां-किसान आंदोलन के दौरान पश्चिम बंगाल की एक सौ से अधिक यूनिवर्सिटी की लड़कियों का दमन-उत्पीड़न जिन्हें पहनने के नाम पर नाम मात्र की एक फटी पुरानी तौलियों का देना। फिर तिल तिल मारना, मृत्यु पर्यन्त यातना।
अभी भी करोड़ों करोड़ों बच्चे, महिलाएं, शोषित जन आप जैसे लोगों की तरफ टकटकी लगाये जाने अनजाने देख रहे हैं। साथियों, आपका एक-एक पल स्वाति नक्षत्र का पानी की बूंद है। वे चातक पक्षी हैं। मत भटको, साथी वापस आओ।
एक इंसान प्रगति के पथ (दिशा) से भटक कर कैसे अधोगति की ओर प्रवृत्त हो जाता है। मेरा अपने आप के लिए एक जटिल प्रश्न है कि आगे की ओर उन्नति की ओर जाना मनुष्य कैसे ठिठक जाता है। ठिठक ही नहीं प्रगति से विमुख हो जाता है। क्या एक मानव के चेतना (Skull) के अंदर चेतना दो प्रकार की होती है, किसी समस्या को हल करने के लिए चेतना के दो रूप एक ही इंसान के अंदर कैसे हो सकते हैं। एक दफा हां करता है फिर दूसरे दफा ना करता है चाहे वह अच्छा काम हो या बुरा। फिर वहीं चेतना (Skull) कहीं गलत काम भी करवाती है, और कहीं अच्छा काम।
यहीं से समझ पैदा करनी है। दार्शनिकों या जीव वैज्ञानिकों ने अभी तक कुछ तथ्यात्मक विचार हल नहीं दिये। जहां तक मेरा अध्ययन है- अन्यों के हो सकते हैं। अगर किसी को हो तो मुझे भी अवगत करायें। कि अमुक साथी के दिमाग (Skull) में अवश्य दो सवाल पैदा होते होंगे। एक तो मुझे तम्बाकू नहीं खाना चाहिए- दूसरा- चलो खा लेता हूं। दो समस्यायें, दो सवाल, दो रास्ते, एक ही दिमाग (चेतना Skull) में कैसे उलझे से सवाल लगते हैं। हालांकि एक ही क्षण में दोनों एक साथ घटित नहीं होते - नहीं हो सकते। वरन् बारी-बारी से घटित होते हैं, अंत में कमजोर पक्ष दब जाता है। मजबूत पक्ष अपना काम कर जाता है- पर फिर सवाल उठता है कमजोर पक्ष किन कारणों से कमजोर पड़ जाता है और मजबूत पक्ष किन कारणों से मजबूत पड़ जाता है। यह फिर अबूझ पहेली ही रह जाती है।
लेकिन एक ही दिमाग में (चेतना में) दो घटनाएं कैसे घटित होती हैं। इसी पर साथियों को सोचने की जरूरत है, फिर सोचकर अपने जीवन को निजी जीवन, अपने शरीर को निजी शरीर न सोच कर- सामूहिकता का एहसास करते हुए कि यह मेरा शरीर, मेरा जीवन निजी नहीं बल्कि उस समूह का है जो पीढ़ियों से पीड़ितों के मुक्ति के संघर्षों में लगे हुए हैं। क्या ही अच्छा होता इस तरह की सोच में जी कर हर कदम को उसी सोच के साथ साथ कदम ताल करते चलते। -आपका शुभचिंतक
देव सिंह, बरेली