संसद ने ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक, 2026 को पारित कर दिया। विधेयक लोकसभा में बिना किसी चर्चा के महज 12 मिनट में और राज्यसभा में विपक्ष के वाकआउट के बीच लगभग एक घंटे की सीमित चर्चा के साथ पारित हुआ। विधेयक के पारित होने की इस प्रक्रिया ने न केवल पूंजीवादी संसदीय लोकतंत्र की बुनियादी प्रक्रियाओं को ताक पर रख दिया, बल्कि इसके प्रावधानों ने सत्ता के केंद्रीकरण को अत्यधिक बढ़ाने का काम किया है और न्यायिक स्वतंत्रता में अवरोध खड़ा करने की स्थिति पैदा की है।
ट्रिब्यूनल या अधिकरण न्यायिक या अर्ध-न्यायिक संस्थाएं हैं जो पारंपरिक अदालतों के पूरक के रूप में कार्य करती हैं। इनका मुख्य उद्देश्य विशिष्ट विषयों से संबंधित विवादों का त्वरित, सस्ता और प्रभावी निपटान करना है। ट्रिब्यूनल अदालतों की तरह ही न्यायिक कार्य करते हैं, लेकिन इनकी प्रक्रिया अधिक लचीली और विशेषज्ञता वाली होती है। जटिल तकनीकी, आर्थिक, कर, श्रम, पर्यावरणीय और प्रशासनिक मामलों में, जहां विशेषज्ञ ज्ञान की आवश्यकता होती है, वहां ट्रिब्यूनल अपनी विशेषज्ञता के कारण अधिक प्रभावी होते हैं।
भारत में ट्रिब्यूनल विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हैं। यह विधेयक 16 प्रमुख ट्रिब्यूनलों को कवर करता है। ये ट्रिब्यूनल क्रमशः प्रशासनिक मामलों, पर्यावरणीय विवादों, कर मामलों, कंपनी कानून, प्रतिस्पर्धा, बिजली, दूरसंचार और रेलवे से संबंधित विवादों का निपटान करते हैं। इन ट्रिब्यूनलों का अस्तित्व इसलिए है क्योंकि ये विशेषज्ञता रखने वाले सदस्यों के माध्यम से जटिल तकनीकी मामलों में त्वरित न्याय प्रदान करते हैं, जो आम अदालतों के लिए संभव नहीं होता।
इन्हीं को पूरी तरह से नियंत्रित करने के लिए मोदी सरकार ने यह विधेयक पारित करवाया है। इससे पहले 2021 में सरकार ट्रिब्यूनल सुधार अध्यादेश लेकर आई, जिसमें उन शर्तों को फिर से लागू किया गया जिन्हें न्यायालय ने पहले ही खारिज कर दिया था। इसके बाद संसद ने ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम, 2021 पारित किया। सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि ये प्रावधान शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के विपरीत थे।
सुप्रीम कोर्ट विशेष रूप से उन प्रावधानों से चिंतित था जिसमें चार साल का कार्यकाल, 50 वर्ष की न्यूनतम आयु की आवश्यकता और प्रत्येक रिक्ति के लिए दो नाम भेजने की प्रणाली थी। साथ ही ट्रिब्यूनल अनिश्चित काल तक प्रशासनिक रूप से उन्हीं कार्यपालिका विभागों पर निर्भर नहीं रहते जिनके निर्णयों की उन्हें अक्सर समीक्षा करनी होती है।
तब न्यायालय ने एक स्वतंत्र, वैधानिक राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग (छज्ब्) की सिफारिश की थी जो ट्रिब्यूनलों के चयन और प्रशासन की देखरेख करे। इसके बाद इस बार मोदी सरकार ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक, 2026 ले आई जिसे उसने पारित भी करवा लिया।
हिंदू फासीवादी अपने ही अंदाज में मनमाने तरीके से बिना बहस, चर्चा के बिल पारित करवाने में यकीन रखते हैं जबकि विपक्ष कभी विरोध करता है तो कभी जान बूझकर या कभी विरोध में वाक आउट कर जाता है। लोकसभा में इस बिल को बिना किसी चर्चा के पारित कर दिया गया। राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को बोलने की अनुमति नहीं दी गई, जिसके बाद ‘इंडिया’ गठबंधन के सदस्यों ने सदन से वाकआउट कर दिया।
वैसे भी संसद अब बहस मुआबसे का अड्डा नहीं है बल्कि कमजोर विपक्ष को नजरअंदाज करके या उनके वाकआउट की परिस्थितियां निर्मित करके बिल पास करवा लिए जाते हैं। तीन कृषि कानून, श्रम संहिता, तीन आपराधिक संहिताओं को इसी मनमाने और निरंकुश तरीके से पारित करवाया गया।
यह विधेयक दिखाता है कि हिंदू फासीवादी हर जगह अपना नियंत्रण या वर्चस्व कायम कर लेना चाहते हैं। विधेयक अभी भी राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल परिषद को संस्थागत स्वायत्तता नहीं देता है। विधेयक की धारा 14 सरकार को ट्रिब्यूनल सदस्यों की योग्यता, चयन प्रक्रिया, वेतन, भत्ते और अन्य सेवा शर्तों को निर्धारित करने का अधिकार भविष्य में बनाए जाने वाले नियमों के माध्यम से देती है। इसका अर्थ है कि सरकार बिना संसद की मंजूरी के, अपनी इच्छानुसार किसी भी समय ट्रिब्यूनल सदस्यों की योग्यता और शर्तों में बदलाव कर सकती है। यानी मोदी सरकार ही यहां सब कुछ तय करेगी। राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। हालांकि अध्यक्ष और न्यायिक सदस्यों के लिए मुख्य न्यायाधीश (ब्श्रप्) से सलाह लेना अनिवार्य है, लेकिन यह सलाह बाध्यकारी नहीं है- अंतिम निर्णय सरकार का ही होता है। ट्रिब्यूनल की ‘खोज-सह-चयन समिति’ में केंद्र सरकार द्वारा नामित एक सचिव भी शामिल होता है, जिसमें सरकार का प्रत्यक्ष प्रभाव होता है।
यह स्थिति चुनाव आयोग सी है जहां सारा नियंत्रण मोदी सरकार का है और उसी अनुरूप चुनाव आयोग काम करता है। यहां विपक्ष की भूमिका खत्म कर दी गई है।
इसी तरह राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के सदस्यों आदि के चयन में विपक्ष की कोई भूमिका नहीं है। इस तरह यह सीधे सरकार के नियंत्रण में है और उसी अनुरूप काम भी करेगा।
सरकार राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के वित्त और प्रशासन पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव बनाए रखती है। एक आयोग जिसे ट्रिब्यूनलों को कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त करने के लिए बनाया गया है, वह स्वयं कार्यपालिका की शर्तों पर निर्भर नहीं रह सकता।
मसलन पर्यावरण के मामले पर राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल संसद के अधीन होने के बावजूद एक स्वतंत्र निकाय के रूप में कार्य करने की स्थिति में सरकार के पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाने वाली परियोजनाओं को रोक सकती है, या उसमें कई शर्तें लगा सकती है। मगर जब वह हर तरह से सरकार पर निर्भर हो तब ऐसा होना नामुमकिन है। जैसा कि पिछले 10-12 सालों में हिंदू फासीवादियों ने किया है।
कुल मिलाकर इस विधेयक का इस रूप में पारित हो जाना हिंदू फासीवादियों के सत्ता पर केंद्रीकरण को और ज्यादा मजबूत करता है। और संबंधित मुद्दों पर आम नागरिकों के लिए तो बहुत दूर यहां तक कि विपक्ष के लिए भी कोई गुंजाइश नहीं है।