संयुक्त अरब अमीरात का ओपेक से बाहर आना

Published
Sat, 05/16/2026 - 15:50
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1960 में तेल उत्पादक देशों ने ओपेक का गठन किया था। ईरान, इराक, कुवैत, साऊदी अरब और वेनेजुएला इसके संस्थापक देश थे। अबुधाबी 1967 में इसका सदस्य बना। 1971 में यूएई के रूप में संगठित होने के बाद भी यह ओपेक का सदस्य बना रहा। फिलवक्त यूएई के 1 मई 2026 से ओपेक से अलग होने की घोषणा के बाद इस समूह में 11 देश बचे रहेंगे।
    
इसी तरह ओपेक+ ओपेक व रूस समेत अन्य तेल उत्पादक देशों का व्यापक समूह है जो 2016 में अस्तित्व में आया। यू ए ई ने इससे भी अलग होने की घोषणा कर दी है। 
    
ये दोनों समूह वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों को इस तरह निर्धारित करते रहे हैं कि हरेक उत्पादक देश तेल बिक्री से लाभ की स्थिति में रहे। ये तेल की कीमतों को तेल उत्पादन बढ़ा या गिराकर नियंत्रित करते रहे हैं। इस हेतु इन्होंने ओपेक के सभी देशों के तेल उत्पादन का कोटा सामूहिक रूप से तय कर रखा था। इस कोटे में साऊदी अरब, ईरान के बाद तीसरे स्थान पर यूएई तेल उत्पादन करता था। वर्तमान समय में यू ए ई दुनिया का 8वां सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है और यह वैश्विक उत्पादन का 4 प्रतिशत उत्पादन करता है। वर्तमान में यह 35 लाख बैरल प्रतिदिन तेल उत्पादन करता है। इसकी तुलना में 100 लाख बैरल प्रतिदिन उत्पादन कर साऊदी अरब अग्रणी देश बना हुआ है। 
    
यूएई ने अपने तेल उत्पादन में निवेश कर अपनी क्षमता 50 लाख बैरल प्रतिदिन तक बढ़ा ली है। अब ओपेक से बाहर आकर यूएई ज्यादा तेल बेचना चाहता है। पर ओपेक छोड़ने के पीछे महज अधिक तेल बेचना ही एकमात्र कारण नहीं है। इसके पीछे भू राजनीतिक कारण भी हैं। 
    
ईरान युद्ध के कारण ईरान द्वारा होरमुज का रास्ता बाधित करने के चलते वैश्विक स्तर पर तेल कीमतें बढ़ रही हैं। यू ए ई एक वैकल्पिक पाईप लाइन बिछा बाकी दुनिया में तेल सप्लाई बढ़ा सकता है। ईरान द्वारा यू ए ई पर बार-बार बोले गये हमलों ने उसे ईरान से दूर अमेरिकी-इजरायली पाले की ओर धकेला है। इसी तरह ईरान युद्ध ने पश्चिम एशिया के देशों में अंतरविरोध तीखे कर दिये हैं। 
    
यू ए ई-साऊदी अरब का टकराव बढ़ता जा रहा है। सोमालिया व यमन के मामले में दोनों देश अलग-अलग पाले में खड़े हैं। ऐसे में यू ए ई अधिक स्वतंत्र विदेश नीति की बात कर साऊदी अरब के वर्चस्व को कमजोर करने को प्रयासरत है। 
    
दरअसल 2020 में ही यू ए ई ने अब्राहम समझौते के तहत अमेरिका-इजरायल से अपने संबंध मजबूत कर लिये थे। इजरायल से यू ए ई के रिश्ते बढ़ते गये थे। यह अमेरिका से भी सम्बन्ध मजबूत कर रहा था। ईरान के यू ए ई पर लगातार हमलों में इस सबकी भी भूमिका थी। 
    
अब ओपेक से अलग होने की घोषणा कर यू ए ई ने मूलतः इजरायली-अमेरिकी पाले में मजबूती से खड़ा होना तय कर लिया है। ट्रम्प द्वारा तेल की ऊंची कीमतों के लिए ओपेक की आलोचना की जाती रही है। अब इसे अपनी जीत के रूप में लेते हुए अमेरिकी साम्राज्यवादी ओपेक के वर्चस्व को कमजोर करने की मंशा पाले हुए हैं। 
    
समीकरणों में यह बदलाव यू ए ई को पाकिस्तान से दूर व भारत के करीब ला रहा है। पाकिस्तान को यू ए ई ने दी जाने वाली मदद न केवल रोक दी है बल्कि कर्ज तत्काल चुकाने को कहा है। वहीं भारत के अमेरिकी-इजरायली पाले में होने के चलते यू ए ई भारत से साझेदारी बढ़ा रहा है। 

यू ए ई की ओपेक से अलग होने का तेल उत्पादन व कीमतों पर तो असर पड़ेगा पर यह खुद यू ए ई को कितना फायदा पहुंचायेगा यह तय नहीं है। यह देखते हुए कि इजरायल फिलिस्तीन को तबाह कर रहा है व भारत में भी मुसलमानों पर हमलावर ताकतें सत्ता में हैं ऐसे में इजरायल-भारत से मित्रता यू ए ई की जनता कैसे व कब तक बर्दाश्त करेगी यह भविष्य में स्पष्ट होगा। 

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