उत्तराखंड में क्लस्टर योजना के विरोध में प्रदर्शन-ज्ञापन

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हल्द्वानी/ उत्तराखंड में कक्षा 1 से 12 तक सरकारी विद्यालयों को क्लस्टर/मर्जर करने से विद्यालयों के बन्द होने के विरोध में परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) ने 22 जुलाई को प्रदर्शन कर एसडीएम के माध्यम से प्रधानमंत्री भारत सरकार को ज्ञापन भेजा। ज्ञापन में विद्यालयों के क्लस्टर/मर्जर के नाम पर उन्हें बंद करने पर रोक लगाने, छात्र विरोधी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को वापस लेने, सभी छात्रों के लिए निःशुल्क, एक समान वैज्ञानिक और तार्किक शिक्षा उपलब्ध कराने की मांग की गई। कार्यक्रम में क्रालोस के कार्यकर्ता व स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल रहे।
    
उत्तराखंड में प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और इंटरमीडिएट तक सरकारी विद्यालयों को मर्जर कर क्लस्टर स्कूल बनाने की बातें चहुंओर सुनाई दे रही हैं जिसमें हजारों विद्यालय बंद होने की संभावना जताई जा रही है। उत्तराखंड सरकार तर्क दे रही है कि कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों को दूसरे विद्यालयों में मर्ज कर एक जगह क्लस्टर बनाने से छात्रों को बेहतर संसाधन व शिक्षा प्रदान होगी।
    
उत्तराखंड जैसे कठिन भौगोलिक पहाड़ी इलाकों, मैदानी इलाकों के गांवों और शहरी क्षेत्रों में काफी दूर-दूर तक विद्यालय नहीं होंगे तो कई छात्र शिक्षा से महरूम हो जाएंगे। पहले से ही पहाड़ी इलाकों में दूर-दूर स्कूल होने के कारण छात्रों को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बुनियादी जरूरतें रास्ते, सड़कें, पुल आदि न होने, मौसम की मार आदि चीज छात्रों को पहले से ही झेलनी होती हैं। सरकारी विद्यालयों में कमजोर व गरीब-वंचित तबके के छात्र पढ़ने आते हैं। स्कूल बंद (मर्ज) होने से छोटे-छोटे बच्चों के लिए पास के दूसरे सरकारी विद्यालयों में जाना और मुश्किल हो जाएगा। उत्तर प्रदेश में स्कूल मर्ज करने के कारण स्कूल दूर होने से कई छात्रों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है। स्कूल के अभाव में गरीब बच्चों के अभिभावकों के पास अपने बच्चों की पढ़ाई छुड़ाने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं बचेगा। छात्राओं, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यक छात्रों की शिक्षा पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। गांव में सरकारी विद्यालय न होने पर सबसे पहले उनको ही शिक्षा से वंचित होना पड़ेगा।
    
यह साफ तौर पर छात्रों के शिक्षा के अधिकार पर हमला है। इस हमले के खिलाफ इंसाफ पसंद लोगों को आगे आना होगा।
    
प्राथमिक व इंटरमीडिएट विद्यालयों को मर्जर के नाम पर बंद किया जाना शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 का भी खुला उल्लंघन है। इसकी धारा 6 में स्पष्ट प्रावधान है कि न्यूनतम 300 की आबादी में व 1 किमी के दायरे में प्राथमिक विद्यालय स्थापित करना होगा। यह संविधान के अनुच्छेद 21-। शिक्षा के मौलिक अधिकार का तथा नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद-46 का भी स्पष्ट खुला उल्लंघन है जो कि अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने पर जोर देता है।
    
विद्यालय बंद होने से रोजगार पर भी बड़ा फर्क पड़ेगा। पहले से ही 2019 में बेरोजगारी पिछले 45 वर्षों में सबसे अधिक थी। उसके बाद के कोरोना काल सहित इन 5-6 सालों में बेरोजगारी और अधिक बढ़ी ही है। शिक्षक भर्ती की तैयारी कर रहे नौजवानों के लिए रोजगार के अवसर और सीमित हो जाएंगे। यह शिक्षामित्र, गेस्ट टीचर, अस्थाई शिक्षक, भोजनमाता आदि के रोजगार को निगलने की नीति बन जाएगी। यह इन स्कूलों में संविदा, ठेका आदि के तहत रखे लोगों के रोजगार को समाप्त कर देगा।
    
उत्तराखंड सरकार यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत कर रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में साफ-साफ स्कूल काम्प्लेक्स की बात की गई है। इस नीति के बिंदु 7.6 में कहा गया है ‘‘एक संभावित तंत्र स्कूल परिसर नामक एक समूह संरचना की स्थापना होगी, जिसमें एक माध्यमिक विद्यालय होगा जिसमें 5 से 10 किलोमीटर के दायरे में आंगनबाड़ी केंद्रों सहित अपने पड़ोस के निचले ग्रेड की पेशकश करने वाले अन्य सभी विद्यालय होंगे...’’ राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्राइमरी स्कूलों में बेहद कम प्रवेश होने की बात को नकारात्मक ढंग से दिखाया गया है। इसके समाधान के रूप में स्कूल परिसर के जरिए कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को बंद करने की योजना बनाई गई है। यह एक ऐसा स्कूल परिसर होगा जिसमें आंगनबाड़ी, प्राइमरी, माध्यमिक, उच्च माध्यमिक और इंटरमीडिएट स्कूलों को मिलाकर एक स्कूल काम्प्लेक्स बनाया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में सरकार 3 वर्ष के छात्रों को स्कूल में नामांकन करने की बात करती है। परंतु 5 से 10 किलोमीटर के दायरे में यह छोटे-छोटे छात्र किस तरह स्कूल पहुंचेंगे, इस पर कोई बात नहीं की जाती है। यह सरकारों की शिक्षा से हाथ खींचने की पूरी मंशा को दिखा देता है। स्कूल बंद होने की घटनाएं उत्तराखंड के अंदर ही नहीं हैं बल्कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित तमाम राज्यों में यह जारी है। यह सरकारी शिक्षा पर देशव्यापी हमला है।
    
कम छात्र संख्या होने पर स्कूलों को क्लस्टर करने की बात उत्तराखंड सरकार बोल रही है। कम छात्रों के बावजूद भी इन स्कूलों में बुनियादी जरूरतें, संसाधन जुटाकर पूरा की जानी चाहिए। इस ओर यह सरकार ध्यान नहीं दे रही है। सरकारी स्कूलों की दुर्दशा ही लोगों को निजी स्कूलों की ओर ले जाती है। देश के नामी गिरामी सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय, प्प्ज्, प्प्ड से लेकर ।प्प्डै जैसे अस्पताल तक सरकारी ही हैं। परंतु यह सरकारें व्यापक सरकारी संस्थाओं को बर्बाद कर निजी संस्थाओं को चमकाने, उन्हें आगे बढ़ाने की कोशिशें कर रही हैं। पूंजीपतियों को स्कूली शिक्षा से भी लूटने की छूट मिल सके इसके लिए यह सरकार इन नीतियों को आगे बढ़ा रही है।
    
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, रोटी, कपड़ा, मकान आदि मूलभूत चीजों से सरकारें निरंतर हाथ खींचती रही हैं। बची स्कूली शिक्षा को भी यह सरकार छात्रों से छीन लेना चाहती है। इसके खिलाफ छात्रों-नौजवानों सहित समाज के व्यापक न्याय पसंद लोगों को आगे आकर शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरत को बचाना होगा। वरना ये सरकारें सब कुछ आम जनों से छीन लेंगी। 
        -हल्द्वानी संवाददाता
 

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