उत्तराखण्ड से उठी आवाज ‘पेपर चोर गद्दी छोड़’

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उत्तराखण्ड के विभिन्न इलाकों में युवा सड़कों पर संघर्षरत हैं। युवा ‘पेपर चोर गद्दी छोड़’ के नारे से उत्तराखण्ड को गुंजायमान कर धामी सरकार को घेर रहे हैं। एक के बाद एक भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक की घटनाओं से आक्रोशित युवाओं का धैर्य हालिया ट्रिपल एससी भर्ती परीक्षा के भी पेपर लीक होने से चुक गया और वे सड़कों पर उतर पड़े। युवाओं के संघर्ष के दबाव में धामी सरकार को हाईकोर्ट के पूर्व न्यायधीश की निगरानी में एसआईटी गठित कर जांच की घोषणा करनी पड़ी। पर युवा राज्य सरकार की जांच एजेंन्सी से जांच की घोषणा से संतुष्ट नहीं हैं और वे सीबीआई जांच की मांग को लेकर संघर्ष के मैदान में डटे रहे। अंततः मुख्यमंत्री धामी को देहरादून के धरनास्थल पर आकर सीबीआई जांच की संस्तुति करनी पड़ी। 
    
उत्तराखण्ड की भारी पढ़ी-लिखी बेरोजगार आबादी के साथ यह क्रूर मजाक ही है कि एक तो सरकारी भर्तियां सालों से रिक्त पद होने के बावजूद निकाली नहीं जातीं और जब कुछेक भर्तियां निकाली भी जाती हैं तो वो पेपर लीक या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। पढ़ी-लिखी बेरोजगार आबादी जो काफी मेहनत से इन परीक्षाओं की तैयारी कर रही होती है, हर बार अपने को ठगा सा महसूस करती है। अब तो यह पैटर्न, इतना मजबूत हो चला है कि कुछ लोग यह उचित ही सवाल उठाने लगे हैं कि सरकारी नौकरी देने से बचने के लिए सरकार खुद ही भर्ती निकाल उन्हें पेपर लीक पर अन्य विवादों में फंसा दे रही है। 
    
उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद से यहां कांग्रेस व भाजपा की सरकारें सत्तासीन रही हैं। बीते 9 वर्षों से भाजपा सत्तासीन है। पेपर लीक के प्रकरण कांग्रेस सरकार में भी होते थे पर भाजपा शासन ने तो मानो हर भर्ती परीक्षा का पेपर लीक करने का रिकार्ड कायम करने की कसम खा ली है। बीते वर्षों में एक के बाद एक पेपर लीक की खबरें इस तरह आती गयीं कि युवा इन नतीजों पर जा पहुंचे कि खुद सरकार में बैठे लोग ही पेपर लीक करवा रहे हैं। इस बार भी हरिद्वार के जिस स्कूल से पेपर लीक हुआ, वो भाजपा नेता का बताया जा रहा है। ऐसे में मुख्यमंत्री धामी को ही युवा पेपर लीक का सरगना मानने तक जा पहुंचे और ‘पेपर चोर-गद्दी छोड़’ के नारे उत्तराखण्ड की सड़कों पर गूंजने लगे। 
    
मुसलमानों पर हमला बोलने में मुख्यमंत्री  धामी पड़ोसी राज्य उ.प्र. की योगी सरकार से प्रतियोगिता में उतरे हुए हैं। पेपर लीक प्रकरण में भी एक मुसलमान की गिरफ्तारी के बहाने उन्होंने ‘नकल जिहाद’ का नारा देते हुए मुसलमानों पर हमला बोला। इससे पूर्व भी वे लैंड जिहाद-मजार जिहाद सरीखे नारे दे मुसलमानों पर हमला बोलते रहे हैं। उन्हें उम्मीद थी कि वे नकल जिहाद के नारे से युवाओं के संघर्ष को हिन्दू-मुसलमान संघर्ष में बदल देंगे। पर इस बार युवाओं ने धामी सरकार के कुत्सित इरादों को पहचान लिया और अपने हमले का निशाना धामी सरकार को ही बनाये रखा। मुख्यमंत्री को पीछे हटकर युवाओं को सही जांच व दोषियों पर कार्यवाही की बातें कहनी पड़ीं। संघ-भाजपा व पूंजीवादी मीडिया ने संघर्ष में नेपाल की बातें होने व सनातन धर्म को बदनाम करने के आरोप लगा संघर्ष को लांक्षित करने का प्रयास किया पर युवाओं ने उनके झांसे में आने से इंकार कर दिया और वे सीबीआई जांच की मांग पर डटे रहे। 
    
धामी सरकार का युवाओं की सीबीआई जांच की मांग पर नकारात्मक रुख ने युवाओं के इस विश्वास को मजबूत बनाने का काम किया कि सरकार ही पेपर चोर है। इस संघर्ष ने पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं के अंधकारमय भविष्य के प्रश्न को सामने ला दिया है। बेरोजगारों की भारी फौज के आगे चंद नौकरियों की भर्ती और उनके पेपरों का भी लीक होना नौजवानों के जख्मों पर मिर्च छिड़कने सरीखा है। 
    
भारी भरकम बेरोजगारी आज उत्तराखण्ड ही नहीं देश के हर राज्य की विकराल समस्या बन चुकी है। आज पढ़े-लिखे युवाओं के लिए सरकारी नौकरी तो दूर फैक्टरियों में नाम मात्र के वेतन पर ठेके का 12-12 घण्टे का रोजगार मिलना भी कठिन हो चुका है। ऐसे में जरूरी है कि पेपर लीक के खिलाफ संघर्ष को हर हाथ को सम्मानजनक रोजगार के संघर्ष से जोड़ा जाये। आज पढ़े-लिखे युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों का यदि अकाल पड़ चुका है तो यह किसी दैवीय या प्राकृतिक आपदा की वजह से नहीं है बल्कि बीते 3-4 दशकों से देश में सरकारों द्वारा अपनायी गयी निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों की वजह से है। इन नीतियों के अपनाये जाने से पहले भी देश में बेरोजगारी थी पर इस भयावह स्तर पर नहीं थी। दरअसल तो चंद पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए बनायी गयी मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था में बेरोजगारी खत्म ही नहीं की जा सकती। ज्यादा सही कहें तो पूंजीपतियों को सस्ते श्रमिक मुहैय्या कराने के लिए बेरोजगारी हमेशा बना कर रखी जाती है। पर 90 के दशक से देश में लागू हुई निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों ने तो समस्या को इस कदर विकराल बना दिया कि कायदे की नौकरी पाना आसमान से तारे तोड़ लाने से भी कठिन हो गया। हुआ यूं कि सरकार एक के बाद एक अपने संस्थानों को निजीकरण की नीति के तहत पूंजीपतियों को बेचने लगी या फिर सरकारी विभागों में भी ठेके-आउटसोर्स के तहत भर्ती करने लगी। नये सरकारी संस्थान खुलना खत्म सा हो गया। स्थायी सरकारी नौकरी का अकाल सा पैदा कर दिया गया। दूसरी तरफ निजी क्षेत्र में हर जगह ठेका प्रथा व रखो व निकालो का बोलबाला हो गया। सरकारी नौकरियों के इस अकाल में से एक नौकरी ढूंढ लाने की चाह ने युवाओं को प्रतियोगिता की अं धी दौड़ में धकेल दिया जिसे भुनाने हेतु कोचिंग सेंटर से लेकर हाकम सिंह जैसे गिरोह सक्रिय हो गये। कहने की बात नहीं कि इन गिरोहों के तार सरकार व मंत्रियों से जुड़ गये और नौकरियां भारी भाव पर बेच कमाई का धंधा जोर पकड़ता गया। 
    
ऐसे में अपने लिए गरिमामयी रोजगार की चाह रखने वाले युवाओं को मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था में चाहे जो भी सरकार सत्तासीन हो जाये, सुख-चैन का जीवन नहीं मिल सकता। इसके लिए उन्हें संघर्ष के निशाने पर इस पूंजीवादी व्यवस्था को ही लाना पड़ेगा। इस लुटेरी व्यवस्था में राहत के कुछ छींटे हासिल करने के लिए भी उन्हें निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों को पलटने व कल्याणकारी मदों में सरकारी खर्च बढ़ाने के लिए सरकारों को मजबूर करना पड़ेगा। 
    
आज जरूरत है कि उत्तराखण्ड के युवा अपने संघर्ष को पेपर लीक की जांच, रिक्त सरकारी पदों पर तत्काल भर्ती के साथ-साथ निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों व पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष से जोड़ें। तभी युवा लुटेरी-भ्रष्ट ताकतों के चंगुल से अंधकारमय हुए अपने भविष्य को रोशन करने की ओर बढ़ सकते हैं। 

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