वर्तमान आंदोलन और न्यायपालिका

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
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जब भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लोगों ने देखा कि बिना नेम प्लेट पुलिस वाले, सादी वर्दी में तैनात गुंडे-लाठी डंडे लिए हुए नियम विरुद्ध पुलिस के साथ खड़े थे और लड़कियों और लड़कों पर क्रूरता से लाठी मार रहे थे। यह लाठियां प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत की रीढ़ तोड़ रही थीं। लाठियां नियम के विरुद्ध सर पर भी मारी गईं और उनमें से एक छात्र गंभीर रूप से जख्मी, अस्पताल में है। पूंजीवादी कार्यपालिका ही नहीं न्यायपालिका भी जख्मी है, बल्कि कोमा में है।
    
आज जरूरत है कि छात्र और उनके किसान, मजदूर, मध्यवर्ग की जनता सरकार ही नहीं न्यायपालिका को ‘जन अदालत’ में पेश करे। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली जजों की बेंच ने 20 जुलाई के जनता के मासूम बच्चों के खिलाफ सरकार के अघोषित युद्ध की और गैर कानूनी रूप से दमन के खिलाफ उपलब्ध वीडियो को पेश करने की इजाजत न देकर पुनः यह साबित किया है कि न्यायपालिका भी (पूंजीवादी) राज्य सत्ता का ही एक अंग है। यानी, भारत के पूंजीवादी जनतंत्र में मामला अब कार्यपालिका के एक मामूली प्यादे धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से बहुत आगे निकल चला है। अब तो बस जनता को फैसला करना है कि वह विभिन्न रंग-रूपों वाली पार्टियों और इस आउट आफ डेट हो चुकी व्यवस्था का क्या करे। जनता को अपनी जन अदालत लगानी है, जनता को अपनी संसद बुलानी है जैसे कि 6 साल पहले किसान आंदोलन के दौरान किसान संसद का आयोजन किया गया। किसानों, मजदूरों आदि व्यापक जनता को अपने बच्चों के साथ इसमें आना चाहिए।
    
प्रश्न इसलिए भी है कि वर्तमान नेतृत्व जिसकी कोई भी स्पष्ट राजनीतिक समझ नहीं है, वह केवल एक पंचमेल खिचड़ी विचारधारा है जहां अंबेडकर, भगत सिंह आदि अलग-अलग विचारधाराओं के व्यक्तियों की मात्र तस्वीर लगाना ही अपनी राजनीतिक लाइन है जो कि कोई भी स्पष्ट राजनीतिक लाइन नहीं है। अन्यथा तो आने वाले समय में बिना किसी स्पष्ट क्रांतिकारी नेतृत्व के इस आंदोलन का भविष्य क्या होगा सिर्फ अटकलों का विषय रहेगा।     -डा. उमेश चंदोला
 

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।