यह फासीवादी जोर-जबर्दस्ती नहीं चलेगी

मन की बात न सुनने पर जुर्माना

30 अप्रैल 2023 को प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात न सुनने पर जगह-जगह से जुर्माना या सजा देने की बात सामने आ रही है। एक निजी स्कूल से यह बात सुनने में आयी कि एक छात्र के ‘मन की बात’ सुनने वाले कार्यक्रम से अनुपस्थित रहने पर उस छात्र पर 100 रुपये का जुर्माना लगाया गया और उससे अनुपस्थित रहने के कारण के रूप में मेडिकल भी मांगा गया। हालांकि बाद में स्कूल प्रबंधन ने इस बात से इंकार किया।
    

लेकिन अभी ऐसा ही एक मामला और सामने आ रहा है। पी जी आई चंडीगढ़ से खबर आयी कि नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ नर्सिंग एजुकेशन की 36 छात्राओं को ‘मन की बात’ के सौंवे एपिसोड को न सुनने के कारण सजा दी गयी है। और सजा के रूप में उन्हें 7 दिन तक हॉस्टल से नहीं निकलना है। इन छात्राओं में 28 पहले वर्ष की और 8 छात्राएं तीसरे वर्ष की हैं।
    

कोई नेता अपने मन की चाहे जितनी बात करे यह उसकी आजादी है। पर जब वह सारे सरकारी साधनों का इस्तेमाल कर न केवल जबरन हर घर तक अपने ‘मन की बात’ पहुंचाने ही न लग जाये बल्कि सबके लिए उसे सुनना भी अनिवार्य कर दे तो यह फासीवादी जोर-जबर्दस्ती नहीं तो क्या है? रविवार के दिन स्कूलों-दफ्तरों-हॉस्टलों से लेकर मोहल्लों तक में जबरन ‘मन की बात’ सुनाने की जो करतूतें की गयीं वे दिखाती हैं कि भाजपा सरकार अपनी जनता से इसी जोर-जबर्दस्ती की ओर बढ़ रही है। 
    

इस बार 30 अप्रैल को मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम का 100 वां एपिसोड था। अब जैसा कि मोदी की खास बात है वे ऐसे हर मौके को इवेंट बना देते हैं। चाहे इसके लिए कितना भी सरकारी पैसा खर्च हो जाये। जगह-जगह भाजपा ने इस कार्यक्रम को करने के लिए जहां पूरी ताकत झोंकी वहीं सरकारी ऑफिस, स्कूल, संस्थान सभी जगह ‘मन की बात’ सुनने के ऑफिशयली/अनॉफिशयली आदेश जारी किये गये। ऐसा माहौल तैयार किया गया मानो ‘मन की बात’ न सुनने पर कोई व्यक्ति न जाने कितना बड़ा अपराध कर रहा हो। और जब ऐसा माहौल तैयार किया जायेगा तो फिर इस कार्यक्रम में भागीदारी न करने पर सजा भी दी जाएगी। जैसा कि सुनने में आ रहा है ऐसा किया भी जा रहा है।
    

मोदी जब से इस देश के प्रधानमंत्री बने हैं तब से वे जनता को अपने ‘मन की बात’ ही सुना रहे हैं। न केवल सुना रहे हैं बल्कि वे अपने मन की ही कर रहे हैं। अगर वे सुन रहे हैं तो केवल अपने आकाओं यानी पूंजीपतियों की बात। और उनके इस काम में पूंजीपतियों के चैनल पूरी भूमिका निभा रहे हैं। वे मोदी के ‘मन की बात’ जनता तक पहुंचा रहे हैं। यह बता रहे हैं, मोदी के मन की बात ही सब कुछ है। इसके अलावा बाकी सब बेकार है।
    

बेरोजगार अपने रोजगार की मांग को लेकर, महिलाएं अपनी सुरक्षा को लेकर, दलित अपने साथ होने वाले भेदभाव को लेकर, आदिवासी अपने जंगल बचाने को लेकर, मज़दूर-किसान अपने खिलाफ लागू होने वाले कानूनों के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं लेकिन तब मोदी के मन में कोई हलचल पैदा नहीं हो रही है। वे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं मानो समाज में सब कुछ सही चल रहा है। बस अब उन्हें साधु-संत की तरह ‘मन की बात’ जैसे कार्यक्रम के जरिये उपदेश ही देने हैं।
 

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि