आज की दुनिया में क्या नयी दुनिया का ख्वाब देखा जा सकता है? कोई दिल्लगी करने वाला इस सवाल के जवाब में कहेगा कि जनाब! ख्वाब देखने में कोई टैक्स तो लगता नहीं। जितने चाहिए उतने देखिये। दिन में खुली आंखों से देखिए और रात में भरपूर नींद के बीच देखिए। कौन रोकता है आपको!
मजाक से इतर हकीकत की दुनिया में उतरा जाए तो उस ख्वाब को देखने में क्या पाबंदी हो सकती है जिसका ताल्लुक सिर्फ खुद से हो। परन्तु गर ख्वाब का लेना-देना हमारे समाज से हो तो जीवन में, ऐसी दुश्वारियों का ऐसा सिलसिला शुरू होगा कि जिसका अंत आपकी मौत के साथ ही हो सकता है। ऐसे लोगों में उन सभी का नाम लिया जा सकता है जिन्होंने अंग्रेजों के जमाने में आजादी का ख्वाब बुना था। भगतसिंह और उनके साथियों को तो फांसी के फंदे पर ही लटका दिया गया था। यह सच है कि आजादी का ख्वाब कुछ समय बाद हकीकत में बदल गया।
ऐसे लोगों में उन लोगों का नाम भी लिया जा सकता है जिन्होंने भारत सहित पूरी दुनिया में एक ऐसी नई दुनिया का ख्वाब देखा था जहां किसी किस्म की सामाजिक गैर-बराबरी न हो। वर्गों का बंटवारा न हो। न पूंजीपति हों और न मजदूर हों। न कोई साम्राज्यवादी देश हो न कोई गुलाम देश हो। पूंजीवाद द्वारा ऐसे लोग कम्युनिस्ट, माओवादी, नक्सलवादी आदि, आदि नामों से पुकारे गये। उन लोगों की संख्या गिनना भी असम्भव है जो समाजवाद के लिए, कम्युनिज्म के लिए कुर्बान हो गये। कई-कई लाख लोगों ने मानव मुक्ति के इस महान ध्येय के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। पेरिस कम्यून के कम्युनार्ड; महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति के बोल्शेविक; चीन के कम्युनिस्ट; न जाने कितने देश और न जाने कितने लोग थे जो एक नयी दुनिया के ख्वाब के लिए शहीद हो गये। दीगर बात है कि ख्वाब बीसवीं सदी में एक समय हकीकत के करीब पहुंचा और आज फिर से एक ख्वाब है।
ऐसे लोगों में उन लोगों का भी नाम लिया जा सकता है जिन्होंने समाज में औरतों की बराबरी, आजादी, न्याय और अधिकारों के लिए संघर्ष किया। एक ऐसे समाज का ख्वाब देखा जहां औरतें दोहरी-तिहरी दासता से मुक्त हों। और सारी स्त्रियां निर्भय होकर मानवीय गरिमा से युक्त जीवन जियें। एक ऐसी स्त्रियों की पीढ़ी जन्म ले जिसके जीवन में गुलामी, अत्याचार, अपमान, भेदभाव की कोई काली छाया न हो।
ऐसे लोगों में उन लोगों का नाम भी लिया जा सकता है जिन्होंने रंगभेद, नस्लभेद व अलगाव के खिलाफ संघर्ष किया। कोई जमाना था जब अपने को सभ्य कहने वाले दासों का व्यापार करते और अकूत मुनाफा कमाते थे। लाखों दास इस क्रूर कारोबार के दौरान भूख, बीमारी, अत्याचार से मारे जाते थे। अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, महाद्वीपों में रंगभेद, नस्लभेद व अलगाव के शिकार बने लोगों की कई पीढ़ियां गुजर गईं पर मानवजाति से यह कलंक अब तब भी पूरी तरह नहीं मिटा। हजारों-हजार लोग इस कलंक से मानवजाति को मुक्त करने के लिए शहीद हो गये। क्या ऐसी दुनिया का ख्वाब नहीं देखा जाना चाहिए जहां किसी भी व्यक्ति के साथ उसकी त्वचा के रंग के कारण भेदभाव, अत्याचार व अपमान न होता हो। गोरे रंग वाले भी इंसान बने और इस कुण्ठा से मुक्त हो कि ‘उनकी त्वचा का रंग सफेद है इसलिए वे श्रेष्ठ हैं, इसी प्रकार गोरे रंग की औपनिवेशिक गुलामी के चिन्हों का मिटना भी जरूरी है। भारत जैसे देशों में रंग गोरा करने का कारोबार ही अरबों रुपये का है।
ऐसे लोगों में उन लोगों का नाम भी लिया जा सकता है जिन्होंने मनुवादी वर्ण व्यवस्था जाति प्रथा, छुआछूत, जातिवाद के खिलाफ बिना थके हुए संघर्ष किया। जातिवाद के कलंक से मानवजाति को मुक्त कराने के लिए दिन को दिन, रात को रात नहीं समझा। न जाने कितने लोगों ने जाति प्रथा मानने वालों के अत्याचार व आतंक को भोगा और न जाने कितने इन अत्याचारों के कारण मारे गये। सदियां गुजर गईं पर आज भी यह कलंक हमारे समाज के ऊपर चस्पा है। क्या ऐसी दुनिया का ख्वाब नहीं देखा जाना चाहिए जहां जाति का उन्मूलन हो। जात-पात, छुआ छूत, भेदभाव, अपमान, अत्याचार का कोई भी निशां समाज में न हो। अवश्य एक ऐसी दुनिया की जरूरत है जहां हर मनुष्य को पूर्ण मानवीय गरिमा के साथ मनुष्य समझा जाए। रंग, नस्ल, लिंग, जाति, भाषा, इलाके आदि के आधार पर किसी के भी साथ किसी किस्म का भेदभाव न हो।
ऐसे लोगों में उन लोगों का नाम भी लिया जा सकता है जिन्होंने अपनी जमीन, अपनी अस्मिता, अपने अस्तित्व, अपनी भाषा, अपनी बोली को बचाने के लिए अत्याचारी-आतताइयों से संघर्ष किया। अपनी जान कुर्बान कर दी। ऐसे अनेकोनेक लोग थे जिन्होंने मानव जाति के वर्तमान, अतीत व भविष्य को समझने के लिए अनजानी जगहों की यात्राएं कीं। इतिहास के अनसुलझे सवालों के जवाब खोजें। जनजातीय समूहों, आदिवासी आदि को मानवजाति का अभिन्न हिस्सा माना जाए इसके लिए कई-कई पीढ़ियों से संघर्ष जारी हैं। क्या ऐसी दुनिया का ख्वाब नहीं देखा जाना चाहिए जहां सारी मानवजाति एक हो। राष्ट्रीयता, भाषा, बोली, सामाजिक संसार आदि के आधार पर कोई भेदभाव व अत्याचार न हो।
हमारी दुनिया की आज की हकीकत यही है कि जो कोई भी नई दुनिया का ख्वाब देखता है और अपने ख्वाब को हकीकत में बदलना चाहता है तो उसे आज के हुक्मरान एक भी पल को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं। स.रा. अमेरिका, ब्रिटेन में जो कोई फिलिस्तीनियों के नरसंहार का विरोध करता है या ऊंची आवाज में ‘फिलिस्तीन को आजाद करो!’ का नारा उछालता है उसे जेल में डालने की कोशिश होती है। किसी कालेज या विश्वविद्यालय में उस छात्र को अपनी शिक्षा, भविष्य से हाथ धोना पड़ सकता है जो फिलिस्तीन में इजरायल के नरसंहार का विरोध करता हो। ऐसा ही हाल हर उस शख्स के साथ, आज के क्रूर हुक्मरान करते हैं जो किसी भी किस्म की मुक्ति, आजादी, बराबरी या भाईचारे की बात करता है।
हमारे अपने देश का क्या है? आजाद भारत में शायह ही कोई ऐसा दिन बीता हो जब हमारे हुक्मरानों ने अपने हाथों को खून से न रंगा हो। न जाने कितने निर्दोष लोगों ने अपना पूरा जीवन जेलों में ही बिताया है। हर रोज ही न जाने कितने किसान, कितने खेत मजदूर, कितनी औरतें, कितने युवा अपने जीवन में निराश पस्तहिम्मत होकर आत्महत्या कर लेते हैं। ये आत्महत्याएं गौर से देखा जाए तो इस क्रूर मानवद्रोही पूंजीवादी व्यवस्था के दुष्चक्र में रची गयी हत्याएं ही हैं। क्या हमारे देश के युवाओं को यह ख्वाब नहीं बुनना चाहिए कि हमारा देश एक ऐसा देश बने जहां कभी भी, किसी को भी किसी भी कारण से आत्महत्या करने की जरूरत न पड़े। क्या भारत को एक ऐसा देश नहीं बनना चाहिए जहां दासता, शोषण, उत्पीड़न का कोई भी निशां न हो। जहां हर व्यक्ति पूर्ण मानवीय गरिमा से युक्त जीवन जिये। मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण, उत्पीड़न न होता हो। हमारे देश के अपने पड़ोसी देशों से ऐसे रिश्ते हों कि न तो उन्हें और न हमें सीमाओं पर सेना रखने की जरूरत हो। एक देश से दूसरे देश में लोग ऐसे आ-जा सकें कि मानो वे अपने ही मोहल्ले में घूम रहे हों।
एक नई दुनिया का ख्वाब देखने वालों के प्रति वर्तमान व्यवस्था का रुख क्रूरता व हिंसा से भरा हुआ है। और अगर इसके लिए उन्हें फासीवाद की शरण लेनी पड़े तो उन्हें उससे भी गुरेज नहीं है। कोई नई दुनिया का ख्वाब न देखे इसके लिए वे तीखा विचारधारात्मक संघर्ष भी छेड़ते हैं। कभी कहते हैं कि ‘इतिहास का अंत हो गया है’ (मानो इनके कहने से मानवजाति नये इतिहास का निर्माण करना छोड़ देगी), तो कभी कहते हैं इस पूंजीवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है (दियर इज नो अल्टरनेटिव-टीना)। ये बातें सरासर झूठ हैं। न तो इतिहास का अंत किया जा सकता है और न ही यह बात सच है कि पूंजीवाद का विकल्प नहीं है। पूंजीवाद का विकल्प वैज्ञानिक समाजवाद है।
‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ (7 नवम्बर 1917 को रूस में हुयी) ने इस बात को बीसवीं सदी में एकदम अच्छे ढंग से स्थापित कर दिया था कि पूंजीवाद का जवाब सिर्फ और सिर्फ समाजवाद है। नयी दुनिया का आज मतलब सिर्फ समाजवाद ही हो सकता है। और इस नयी दुनिया को आज की दुनिया के हुक्मरान कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। क्यों? क्योंकि नई दुनिया का मतलब होगा पूंजीवाद का अंत।