आरक्षण हटाओ आंदोलन: सोशल मीडिया की नई लहर या फूट डालो राज करो की पुरानी नीति

Published
Sun, 08/16/2026 - 15:50
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छात्रों के आंदोलन की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि सोशल मीडिया पर एक नया अभियान तेजी से उभर आया ‘रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन’। कुछ ही दिनों में यह सोशल मीडिया पेज इंस्टाग्राम, रेडिट व एक्स पर तेजी से शेयर होने लगा। लगभग चार-पांच दिनों में इस अकाउंट के लाखों फालोअर्स बन गए।
    
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि, आरक्षण के खिलाफ एक नया अभियान क्यों शुरू हुआ। बड़ा सवाल यह है कि यह ठीक छात्र आंदोलन के बाद (ब्श्रच् आंदोलन) ही क्यों लाया गया। साथ ही सीजेपी की तरह की डिजिटल भाषा और प्रस्तुति के साथ इतनी असाधारण गति से कैसे बड़ा। रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन का उभरना सीजेपी की डिजिटल माॅडल की पुनरावृत्ति जैसा दिखाई दिया।
    
रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन (RHA) की केंद्रीय दलील है कि आरक्षण मेरिट को कमजोर करता है और अवसर जाति के बजाय योग्यता तथा आर्थिक स्थिति के आधार पर मिलना चाहिए। यह इस मुद्दे को बड़े जोर शोर से उठाता है कि आरक्षण की वजह से योग्य पात्र प्रतियोगी परीक्षाओं व नौकरी पाने के अवसरों को खो देता है और मौका किसी अयोग्य पात्र को आरक्षण में मिलने वाली छूट की वजह से मिल जाता है। इस तरह से यह सारी समस्याओं की जड़ केवल और केवल आरक्षण को बताकर बाकी तमाम चीजों से पिंड छुड़ा लेता है। साथ ही तमाम सवालों को ओझल करने की कोशिश करता है।
    
सुनने में यह सरल और आकर्षक तर्क है कि अवसर जाति के आधार पर नहीं बल्कि मेरिट के आधार पर मिलना चाहिए। लेकिन समस्या यह है कि इसमें मेरिट को केवल परीक्षा के अंकों तक सीमित कर दिया जाता है। एक बच्चे के पास अपेक्षाकृत महंगे स्कूल, पढ़ने का माहौल, शांत कमरा और शिक्षित परिवार है। दूसरे बच्चे के पास कमजोर स्कूली शिक्षा, सीमित संसाधन और सामाजिक भेदभाव का अनुभव है। दोनों एक ही परीक्षा में बैठते हैं तो ऐसे में समान केवल अंतिम अंक के आधार पर कोई व्यवहार दरअसल उनके बीच की गैर बराबरी की खाई को बढ़ाने का ही काम करेगा।
    
इसके अलावा आरक्षण गरीबी हटाने की योजना नहीं है। इसका एक प्रमुख उद्देश्य सामाजिक बहिष्कार और प्रतिनिधित्व की असमानता को संबोधित करना है। अक्सर जब भी आरक्षण की बात होती है तो इसे सरकारी नौकरियों में मिलने वाले अवसरों से ही एकमात्र जोड़ कर देखा जाता है। लेकिन असल में जो सामाजिक प्रतिनिधित्व के बाकी सवाल हैं, उसे ओझल कर दिया जाता है। आज भी गांव-देहात में ऐसे उदाहरण हैं कि बिना रिजर्वेशन सीट के कभी कोई दलित व्यक्ति पंचायती चुनाव में चुना नहीं जाता, महिलाओं के मामले में भी यही स्थिति बन जाती है। ऐसे में आरक्षण को सिर्फ नौकरियों तक सीमित कर देना आरक्षण की अवधारणा को सही से न समझना दिखाता है। ऐतिहासिक रूप से वंचना-उत्पीड़न के शिकार जातीय समूूहों को बराबरी के स्तर पर लाने के लिए जरूरी है कि उनके लिए विशेष प्रावधान किये जायें। क्रांतिकारी परिवर्तन जहां ऐसा सम्पत्ति संबंधों को एक झटके में उलट कर करता है और समस्या के तेजी से हल की राह खोलता है, वहीं आरक्षण सरीखे सुधार एक लम्बी प्रक्रिया से समस्या के अंत की ओर ले जाते हैं। इसीलिए जाति के मसले पर आरक्षण या ऐसे किन्हीं सुधारों का समर्थन किया जाना चाहिए। इसे बेरोजगारी की समस्या से जोड़ कर पेश नहीं करना चाहिए, जैसा कि आरक्षण विरोधी सवर्ण बेरोजगारों को भड़काने के लिए पेश करते हैं। 
    
इसके अलावा आर एच ए का एक महत्वपूर्ण तर्क यह भी है कि, जाति खत्म करनी है तो आरक्षण खत्म करो। और सरकारी रिकार्ड में जाति की पहचान को समाप्त करो। एक बुनियादी सवाल उठता है कि क्या सरकारी रिकार्ड से जाति हटाने से समाज में जाति खत्म हो जाएगी? अगर समाज में सामाजिक भेदभाव, जातिगत पूर्वाग्रह और सामाजिक बहिष्कार मौजूद रहे तो क्या आरक्षण खत्म करने से वह भी खत्म हो जाएंगे? नहीं!
    
आज भी ऐसी तमाम घटनाएं समाज में मौजूद हैं कि जिसमें अंतर्जातीय विवाह या प्रेम करने पर हत्या कर दी जाती है। दलित दूल्हे का घोड़े पर बैठना ही बवाल मचा देता है या कुछ ऐसे काम जो विशिष्ट जातियों द्वारा किये जाते हैं। ऐसे में बिना सामाजिक भेदभाव खत्म किये कोई भी कार्यवाही नीम हकीमी नुस्खे ही साबित होगी।
    
असल में आज जो आरक्षण खत्म करने की बात कर भी रहे हैं, उनका जातिगत भेदभाव खत्म करने की न तो कभी कोई मंशा रही है न ही होगी। न वह चाहते हैं कि समाज में जातिगत भेदभाव खत्म हो। असल में यह मुद्दा उनके लिए एक ऐसा मुद्दा है जिसे वह अपनी सहूलियत के हिसाब से उछालते हैं और गायब करते हैं। यह सारा प्रपंच आज भी सिर्फ इसलिए रचा जा रहा है कि कैसे मौजूदा छात्र आंदोलन में फूट पैदा की जा सके। छात्रों को कैसे एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया जाए। 
    
इसको इस बात से भी समझा जा सकता है कि पूरे देश में विशेष कर जंतर-मंतर पर बड़े पैमाने पर हुए छात्र आंदोलन ने सरकार का रातों का चैन उड़ा दिया। वह जेन जी छात्र जिसको मौजूदा संघी सरकार ने तमाम तरह के प्रतिक्रियावादी संगठनों आरएसएस, बजरंग दल, एबीवीपी जैसे लंपट संगठनों में शामिल कर अपनी दक्षिणपंथी राजनीति का हिस्सा बनाया था, जब वह सरकार के खिलाफ एकजुट होकर अपने शिक्षा के अधिकारों, पेपर लीक के खिलाफ हल्ला बोल रहा था तो छात्रों की इस बुलंद एकता और आवाज ने सरकार की नीदें हराम कर दीं। देखा जा सकता है कि किस तरह आज केंद्र की सत्तासीन मोदी सरकार इस जेन जी को लुभाने के लिए तरह-तरह के प्रपंचों को रच रही है। चाहे वह देश के प्रधानमंत्री द्वारा रील अपलोड करना हो या तमाम मंत्री-संतरियों द्वारा जेन जी को लुभाने के लिए तरह-तरह की कवायद। 
    
झारखण्ड में चल रहे छात्र आंदोलन को तो पूरी तरह से हथियाने की कोशिश भी आरएसएस -भाजपा की इस छटपटाहट को ही दिखाती है अन्यथा अचानक आंदोलित छात्र भाजपा-आरएसएस को इतने प्रिय कैसे हो गये। ऐसे में ठीक इसी दौर में रिजर्वेशन हटाने का मुद्दा आरएसएस का अंग्रेजों से उधार ली गई फूट डालो राज करो की नीति का ही हिस्सा है। दरअसल छात्रों की एकजुट आवाज ने इनकी चूलें हिलाने का काम किया है। इनको अपना आधार नई पीढ़ी की निडर आवाजों में खिसकता हुआ नजर आ रहा है। ऐसे में सरकार को एक ऐसा मुद्दा चाहिए था जो कि इस युवा पीढ़ी को बांटने का काम करे। वह युवा पीढ़ी जो अपने रोजगार के सवाल पर आज सरकार से आंखों में आंखें डाल कर सवाल कर रही है।
    
ऐसे में सरकार के लिए सबसे मुफीद जो मुद्दा बनता था; जो रोजगार के सवाल पर भ्रम पैदा करने का काम कर सकता था; जो छात्रों के एकमत स्वर को तोड़ने का काम कर सकता था वह था ‘आरक्षण’। जिसमें छात्रों के एकमत स्वर को बांटा जा सके।
    
यह सारी कवायद इसलिए है कि छात्रों के जेहन में यह बात डाली जा सके कि जो भी कुछ गड़बड़ है वह इसलिए है क्योंकि आरक्षण देश में मौजूद है। पूरे मुद्दे को भटकाने के लिए, छात्रों की इस मजबूत एकता को तोड़ने के लिए भाजपा-संघ की आईटी सेल द्वारा चलाया जा रहा रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन एक सोची-समझी फूट डालो राज करो की पुरानी नीति ही है।
 

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