अमेरिकी साम्राज्यवादियों का बढ़ता पागलपन व बहशीपन

Published
Mon, 03/16/2026 - 07:16
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वार्ताओं के ढोंग के बीच अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने अपने लठैत इजरायल के साथ ईरान पर 28 फरवरी, 2026 को भीषण हमला बोल डाला। इस क्रूर हमले के पहले ही दिन उसने सुनियोजित ढंग से ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई सहित ईरान सरकार के कई मंत्रियों, ईरानी सेना के कई मुख्य अधिकारियों की भीषण बमबारी के जरिये हत्या कर दी। फिर अमेरिका व इजरायल ने मासूम बच्चियों के स्कूल पर बम मार कर, 165 से अधिक स्कूली छात्राओं व अन्य लोगों की हत्या कर दी। शांति के नोबेल पुरुस्कार का अपने आपको सबसे बड़े हकदार बताने वाले का घिनौना, बहशी चेहरा पूरी दुनिया के सामने आ गया। अभी तक जो काम अमेरिका की सरपरस्ती में इजरायल फिलिस्तीन खासकर गाजा पट्टी में कर रहा था अब वही काम अमेरिका ने अपने लठैत के साथ ईरान में शुरू कर दिया। हजारों-हजार उन घरों को निशाना बनाया गया जहां आम लोग रहते हैं। 
    
अपने सुप्रीम लीडर व वरिष्ठ सैन्य कमाण्डरों की निर्मम हत्या के बाद भी ईरान के शासक वर्ग ने अपने होश नहीं खोये। बिना विचलित हुए उन्होंने अमेरिका व इजरायल के भीषण हमलों का जवाब उन्हीं की भाषा में तुरंत ही देना शुरू कर दिया। अमेरिका व इजरायल के मंसूबों पर इस हमले के दिन के बाद से हर दिन पलीता लगना शुरू हो गया। और जैसे-जैसे ये होता गया वैसे-वैसे अमेरिका व इजरायल नृशंसता व क्रूरता की सारी हदें पार करने लगे। जो ‘नये ईरान’ का सपना बेच रहे थे वे अब ईरान को मटियामेट करने की धमकी व कार्यवाहियों पर उतर आये। 
    
बदमाश ट्रम्प जिस ईरान को जीतने के काम को बांये हाथ का खेल समझ रहा था, उसे उस समय हैरानी हो गयी जब उसके दांये हाथ में ईरान ने जलता हुआ अंगार रख दिया। ईरान ने अपने पड़ोसी खाड़ी के देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डों को अपने निशाने पर ले लिया। न केवल अमेरिकी सैन्य अड्डों को भारी नुकसान पहुंचा बल्कि इजरायल भी ईरान की मिसाइल व ड्रोन हमलों की चपेट में आ गया। अब अमेरिकी मीडिया यह स्वीकार करने लगा है कि पश्चिम एशिया में खासकर खाड़ी के देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डों को ठीक-ठाक नुकसान अवश्य पहुंचा दिया है कि वहां अब युद्ध के खिलाफ आवाज उठने लगी हैं। आपातकाल के बावजूद लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। 
    
ईरान पर अमेरिकी साम्राज्यवादी व इजरायली जियनवादी शासकों के हमले का विरोध अमेरिका में हर बीते दिन के साथ बढ़ता जा रहा है। बदमाश ट्रम्प और उसके प्रशासन के लिए ईरान पर किये गये हमले की वजह और उद्देश्य बताने में लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं। हर रोज ट्रम्प और उसके मंत्रियों के बयान बदलते हैं कि हमला इस वजह से नहीं इस वजह किया गया है। कभी वे एक बात बोलते हैं तो कभी दूसरी बात बोलते हैं। ठीक इसी तरह यह युद्ध कब तक चलेगा। कभी वे एक बात बोलते हैं कभी दूसरी बात बोलते हैं। इन बातों से एकदम स्पष्ट है कि ट्रम्प प्रशासन बेहद तनाव में है। उसके सारे मंसूबे मुश्किल में पड़ गये हैं। ईरान ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादियों और उसके बिगडैल लठैत इजरायल को उम्मीद थी कि ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई व अन्य बड़े नेताओं व सैन्य अफसरों के खात्मे के साथ युद्ध एक-दो दिन में समाप्त हो जायेगा। उन्हें उम्मीद थी कि ईरान की जनता अमेरिका व इजरायल का मुक्तिदाताओं के रूप में स्वागत करेगी। और अमेरिका व इजरायल अपनी मनचाही मुराद पूरी करेंगे। अपनी कठपुतली सरकार को ईरान में बिठा देंगे। और इस तरह ईरान के शानदार किस्म के तेल व गैस के भण्डार पर कब्जा कर लेंगे। ईरान का बाजार उनके सामानों से पट जायेगा और इस तरह पूरे पश्चिम एशिया पर अमेरिकी साम्राज्यवादियों का दबदबा कायम हो जायेगा। और साथ ही इजरायल का ग्रेटर इजरायल का विस्तारवादी मंसूबा पूरा हो जायेगा। इजरायल आसानी से समूचे फिलिस्तीन लेबनान, सीरिया आदि को चंद वर्षों में हड़प लेगा। ईरान की इस हमले के खिलाफ पहले से चली आ रही लम्बी तैयारियों ने अमेरिका व इजरायल के मंसूबों को मुश्किल में डाल दिया है। 
    
पहले खामेनेई की हत्या फिर मासूम बच्चियों की हत्या ने ईरान की मौजूदा सत्ता के पीछे आम जनता को लामबंद कर दिया। पहले भी जब ईरान में खामेनेई की सत्ता के खिलाफ प्रदर्शन हुए थे उस समय भी जनता का एक बड़ा हिस्सा खामेनेई के साथ था। अमेरिकी साम्राज्यवादियों के समीकरणों को बिगाड़ने में ईरान की जनता का भी एक बड़ा योगदान रहा है। अमेरिका ने ईरान को वेनेजुएला की तरह अपने कब्जे व काबू में लाने की कोशिश की परन्तु उसको ईरान ने जबरदस्त जवाब देकर अपनी रणनीति व रणकौशल को बदलने के लिए मजबूर कर दिया है। इसमें एक बड़ा कारण तेल व गैस के दामों में भारी उछाल व शेयर बाजार में बड़ी उथल-पुथल भी बन गयी है। साऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बहरीन जैसे बड़े तेल व गैस उत्पादक देशों को अपनी रिफाइनरी ईरान के हमले के कारण बंद करनी पड़ी है। और इसी तरह फारस की खाड़ी से तेल व गैस के जहाजों की आवाजाही भी ठप्प पड़ चुकी है। इसका असर वैश्विक है। भारत जैसे तेल व गैस आयातक देशों की अर्थव्यवस्था इस युद्ध के कारण भारी दबाव में आ गयी है। 
    
बदमाश ट्रम्प व धूर्त नेतन्याहू का न केवल जनता के बीच बल्कि स्वयं शासक वर्ग की कतारों के बीच भी विरोध तेजी से बढ़ा है। इस कारण इन दोनों के तेवर पहले दिनों के मुकाबले बाद में ढीले पड़ने  शुरू हुए हैं। दोनों ही देशों में ट्रम्प व नेतन्याहू को आगामी महीनों में चुनाव का सामना करना है। युद्ध का लम्बा खिंचना इन दोनों ही धूर्तों के राजनैतिक भविष्य पर संकट खड़ा करने लगेगा। और ठीक यही ईरान चाहता है। ट्रम्प युद्ध से बाहर निकलने की सस्ती जुगत लगा रहा है। 
    
युद्ध लम्बा न खिंचे ऐसी मंशा यूरोप, जापान, चीन जैसे साम्राज्यवादी देश भी रखते हैं। इन देशों की ऊर्जा जरूरतें पश्चिम एशिया के तेल व गैस उत्पादक देशों से पूरी होती हैं। दुबई, दोहा जैसे अति आधुनिक शहर दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ही कारोबार के केन्द्र नहीं हैं बल्कि दुनिया भर के बैंक व वित्तीय संस्थान भी यहां स्थित हैं। पर्यटन, व्यापार के भी ये अंतर्राष्ट्रीय केन्द्र हैं। युद्ध के लम्बा खिंचने से इन सभी वित्तपतियों को अपना कारोबार व मुनाफा संकट में दिख रहा है। यह भी एक बड़ा कारण है जिसकी वजह से ट्रम्प का विरोध बढ़ रहा है और ईरान इन जगहों पर हमला करके अमेरिकी साम्राज्यवादियों की नाक में दम किये जा रहा है। पश्चिम एशिया से होकर ही तेल व गैस के साथ-साथ अन्य मालों की आवाजाही समुद्री मार्गों से होती है इसलिए ईरान पर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के हमले ने पूरी दुनिया को ही संकट में डाल दिया है। और एक तरह से अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने जितना नुकसान ईरान को पहुंचाया है उससे अधिक नुकसान अपने साथ-साथ उसने यूरोपीय साम्राज्यवादियों के साथ जापानी साम्राज्यवादियों को पहुंचा दिया है। इस युद्ध के लम्बा खिंचने और अमेरिका के पश्चिम एशिया में फंसे रहने का लाभ रूसी साम्राज्यवादियों को यूक्रेन व अन्य स्थानों पर मिल सकता है। वे ईरानी शासकों के साथ खड़े हैं। 
    
अमेरिका व इजरायल के ईरान पर हमले ने भारत के हिन्दू फासीवादी शासकों को भारी मुसीबत में डाल दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने खुलकर अमेरिका व इजरायल का साथ चुना। अब यही उनके गले की हड्डी बन गया है। 
    
ईरान पर अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा किया गया हमला व युद्ध पूरी दुनिया के मजदूर-मेहनतकशों के खिलाफ है। यह युद्ध जितने भी दिन खिंचेगा उतने दिन उनका जीवन पहले से और बदतर ही होगा। यह युद्ध ईरान सहित तीसरी दुनिया के हर राष्ट्र के खिलाफ है। बदमाश ट्रम्प पहले ही वेनेजुएला की सम्प्रभुता को अपने पैरों तले रौंद चुका है। भारत का वह हर रोज अपमान करता है। ईरान की सम्प्रभुता को उसने भीषण चुनौती दी है। वह ठीक इस युद्ध के बीच में क्यूबा को भी धमकी दे रहा है। तीसरी दुनिया के देशों को अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ एकजुट होकर पूरी ताकत से खड़े होने की जरूरत है। जाहिर है इन देशों के शासकों में न तो हिम्मत है और न कुव्वत है। यह काम सिर्फ और सिर्फ पूरी दुनिया के मजदूर-मेहनतकश ही कर सकते हैं। 

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