बेलसोनिका संघर्ष : कल बहुत देर हो जाएगी

मजदूर विरोधी 4 लेबर कोड्स पूरे मजदूर वर्ग पर एक बहुत बड़ा हमला है

बेलसोनिका फैक्टरी में कार्य करने वाले ठेका श्रमिकों को यूनियन का सदस्य बनाने के कारण ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार हरियाणा सरकार ने बेलसोनिका इम्प्लाइज यूनियन, 1983 का पंजीकरण पिछले साल 23 सितम्बर 2023 को रद्द कर दिया था। बेलसोनिका प्रबंधन वर्ष 2021 से श्रमिकों की छिपी छंटनी करने की शुरूआत कर चुका था। बेलसोनिका फैक्टरी में वर्ष 2021 में 693 स्थाई श्रमिक कार्यरत थे। इससे पूर्व प्रबंधन ने पुराने ठेका श्रमिकों की छंटनी करने के लिए उन्हें वी.आर.एस. लेकर जाने को कहा था। जिस पर यूनियन ने उस समय इस वी.आर.एस. को छंटनी बताते हुए मजदूरों को वी.आर.एस. लेकर न जाने तथा अपनी एकता से इस छंटनी के खिलाफ संघर्ष करने का आह्वान किया था। बेलसोनिका प्रबंधन ने उसके बाद सितम्बर 2021 में स्थाई श्रमिकों को फर्जी दस्तावेजों का हवाला देकर 22 श्रमिकों को आरोप पत्र देकर छंटनी की शुरूआत की तथा यूनियन पर छंटनी का हमला बोला। यूनियन ने प्रबंधन की इस छंटनी का जवाब ठेका मजदूर को यूनियन की सदस्यता देकर, अपनी वर्गीय एकता को व्यवहार में लागू कर दिया। बेलसोनिका प्रबंधन, श्रम विभाग व शासन-प्रशासन ने गठजोड़ कायम कर यूनियन की वर्गीय एकता को तोड़ने के लिए यूनियन के पंजीकरण को ही खारिज कर दिया। 
    
गुड़गांव औद्योगिक इलाके में फैक्टरी मालिकों ने ‘‘फर्जी दस्तावेजों’’ के नाम पर स्थाई श्रमिकों की छिपी छंटनी करने का यह नया तरीका कुछ समय पहले ही ईजाद किया है। वर्ष 2014 में मारुति जैसी बड़ी मदर फैक्टरी ने भी फर्जी दस्तावेजों के नाम पर लगभग 400 श्रमिकों को नौकरी से निकाला था। जिस पर यूनियन ने कोई विरोध नहीं किया। उसके बाद वर्ष 2021 में ही बजाज मोटर गुड़गांव, सनबीम लाइटवेटिंग फैक्टरी, लुमैक्स फैक्टरी, हाई लैक्स फैक्टरी इत्यादि के मालिकों ने स्थाई श्रमिकों की छंटनी केवल ‘‘फर्जी दस्तावेजों’’ के नाम पर की। 
    
आपको बता दें कि इन सभी फैक्टरियों में मजदूर यूनियन मौजूद हैं। बल्कि स्थाई मजदूरों की यूनियनें मौजूद हैं, कहना सही रहेगा। इन सभी फैक्टरियों में यूनियनों ने मालिकों के साथ श्रमिकों को वी.आर.एस. देकर निकालने पर सहमति बनाई। सनबीम फैक्टरी में तो प्रबंधन ने स्थाई श्रमिकों को फर्जी बताकर उनको पहले वी.आर.एस. दिया और उसके बाद उन्हीं मजदूरों को फैक्टरी में ठेके पर रख लिया। मालिकों की इस छिपी छंटनी को स्थाई श्रमिकों की यूनियनों ने बिना किसी प्रतिरोध के स्वीकार ही नहीं किया बल्कि उन्हें वी.आर.एस. दिलवा कर इसे अपनी उपलब्धि भी माना। सभी यूनियनें मालिकों के एक तर्क के आगे धराशाई हो गईं कि मजदूर फर्जी हैं। यूनियनों ने इस छिपी छंटनी को सहजता से स्वीकार कर लिया। तथा गुड़गांव औद्योगिक इलाके के फैक्टरी मालिकों को स्थाई श्रमिकों की छंटनी करने का नया हथियार दे दिया। अब स्थिति यह है कि गुड़गांव की कई छोटी-बड़ी फैक्टरियों का प्रबंधन इसी तरह श्रमिकों की छंटनी करने के प्रयास कर रहा है और उनमें सफल भी हो रहा है। 
    
बेलसोनिका यूनियन ने प्रबंधन की छिपी छंटनी का विरोध शुरू से ही किया। हालांकि प्रबंधन ने मजदूरों के अन्दर कि ‘‘मजदूर फर्जी हैं’’ के भ्रम को डाल दिया था। यूनियन को अपने मजदूरों को यह समझाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी कि हमारे मजदूर फर्जी नही हैं, बल्कि प्रबंधन छिपी छंटनी कर हमारी एकता को कमजोर कर हमारी यूनियन को तोड़ना चाहता है। यूनियन ने प्रबंधन से आधिकारिक तौर पर फैक्टरी में मजदूरों की भर्ती से संबंधित क्राइटेरिया/मापदण्ड भी मांगा, लेकिन प्रबंधन ने यही कहा कि उनके पास मजदूरों की भर्ती का कोई क्राइटेरिया/मापदण्ड नहीं है। इससे साफ हो गया कि प्रबंधन ने श्रमिकों के साथ फर्जीवाड़ा किया है। 
    
बेलसोनिका प्रबंधन की इस छिपी छंटनी से संघर्ष करने का सही तरीका था कि एक फैक्टरी के मजदूर एकजुट होकर संघर्ष करें। बेलसोनिका यूनियन ने अपने साथ 7-8 वर्षों से कार्य कर रहे ठेका मजदूरों को यूनियन का सदस्य बना कर अपनी वर्गीय एकता को व्यवहार में लागू किया। मजदूरों की यह वर्गीय एकता बेलसोनिका प्रबंधन को रास नहीं आई और प्रबंधन पहले तो लगातार यूनियन के ऊपर दबाव बनाता रहा कि यूनियन इस कदम को वापिस ले, लेकिन जब वह इसमें कामयाब नहीं हो पाया तो प्रबंधन ने श्रमिकों में विभ्रम फैलाना शुरू किया कि यूनियन का पंजीकरण रद्द हो जाएगा। और साथ में बेलसोनिका प्रबंधन ने ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार को अगस्त 2022 में शिकायत भी दर्ज कराई कि बेलसोनिका यूनियन का पंजीकरण रद्द किया जाए क्योंकि यूनियन ने ठेका मजदूर को यूनियन की सदस्यता दी है। इस तरह प्रबंधन ने श्रम विभाग व शासन-प्रशासन से गठजोड़ कायम कर यूनियन के पंजीकरण को ही रद्द करवा दिया। 156 दिनों तक यूनियन का धरना लघु सचिवालय, गुड़गांव पर चलता रहा, लेकिन शासन-प्रशासन व श्रम विभाग ने कोई भी सुनवाई नहीं की। 
    
बेलसोनिका यूनियन ने प्रबंधन की खुली-छिपी छंटनी के खिलाफ संघर्ष करने का तरीका निकाला कि एक फैक्टरी के भीतर कार्य करने वाले स्थाई व ठेका श्रमिकों को अपनी व्यवहारिक एकता बनाकर संघर्ष को लड़ना पड़ेगा, क्योंकि अब एक फैक्टरी के भीतर कार्य करने वाले श्रमिक अकेले-अकेले अपनी लड़ाई को नहीं लड़ सकते। एक फैक्टरी के भीतर कार्य करने वाले ठेका श्रमिक अगर अकेले अपने स्थाई करने की मांग उठायेंगे तो वह नहीं लड़ पायेंगे। वहीं दूसरी ओर अगर स्थाई श्रमिक अकेले छंटनी के खिलाफ संघर्ष करेंगे तो वह संघर्ष नहीं कर पायेंगे। आज के इस दौर में यह मजदूर संघर्षों की आवश्यकता बन गई है कि मजदूर न केवल एक फैक्टरी के भीतर अपनी वर्गीय एकता बनाकर मालिकों के खिलाफ संघर्ष करें बल्कि सेक्टर स्तर, इलाके स्तर से लेकर प्रदेश-देश स्तर पर अपनी एकता कायम कर संघर्ष आगे बढ़ायें। 
    
उदारीकरण की पूंजीपरस्त नीतियों को लागू हुए तीन दशक से ज्यादा समय हो चुका है। इन उदारीकरण की नीतियों ने मजदूरों में कानूनी विभाजन स्थाई, ठेका, ट्रेनिंग, अप्रेन्टिस इत्यादि को काफी बढ़ा दिया है। और आज यह विभाजन इतना पुख्ता हो चुका है कि एक फैक्टरी के भीतर कार्य करने वाले ठेका मजदूरों और स्थाई मजदूरों के वेतन व सुविधाओं में कई गुने का अंतर हो चुका है। जहां एक फैक्टरी के भीतर कार्य करने वाले स्थाई मजदूरों को अच्छा वेतन, डबल ओवर टाइम का भुगतान, बोनस, महंगाई भत्ता इत्यादि मिलते हैं तो वहीं उसी फैक्टरी के भीतर कार्य करने वाला ठेका श्रमिक इन सभी से वंचित रहता है। 
    
उदारीकरण की इन नीतियों के लागू होने के 30 साल बाद आज हर छोटी-बड़ी फैक्टरी में बड़े पैमाने के उत्पादन में ठेका मजदूर, ट्रेनिंग, प्रशिक्षण के नाम पर स्कीम मजदूरों को लगाया जा रहा है। यहां तक कि मजदूरों का कानूनी अधिकार ‘‘स्थाई काम पर स्थाई रोजगार’’ को भी नए लेबर कोड्स में छीन लिया गया है। उदरीकरण की नीतियों ने पहले स्थाई मजदूरों के स्थान पर ठेके के मजदूरों को उत्पादन में लगाया और आज लेबर कोड्स ने उत्पादन में लगे ठेका मजदूरों को कानूनी रूप देकर स्थाई नौकरियों पर हमला बोल दिया। 
    
बेलसोनिका यूनियन ने एक फैक्टरी के भीतर मजदूरों की वर्गीय एकता बनाकर संघर्ष की शुरूआत की। तात्कालिक व दूरगामी तौर पर यूनियन की रणनीति सही थी कि प्रबंधन की छंटनी का मुकाबला और यूनियन चलाने के उस ढर्रे को तोड़ने के प्रयास किए जिस पर पिछले लगभग 30 सालों से इस तर्क के साथ यूनियनें चल रही थीं कि यूनियन स्थाई मजदूरों की होती हैं तथा यूनियन को मालिक के साथ मिलकर चलना होता है और जहां मालिक और मजदूर के बीच टकराव की स्थिति आए तो यूनियन को संघर्ष करने के बजाय बीच का रास्ता अपना लेना चाहिए। यही वो तर्क है जो वर्तमान में यूनियन नेतृत्व अपने मजदूरों को सिखाता है। संघर्ष नहीं सहयोग, टकराव नहीं बीच का रास्ता। 
    
वर्तमान समय में मजदूरों की स्थाई नौकरियों पर छंटनी का जो हमला है यूनियनों ने इसे स्वीकार कर लिया है। गुड़गांव औद्योगिक इलाके में मजदूरों की ‘‘फर्जी दस्तावेजों’’ के नाम पर जो छिपी छंटनी की जा रही है, यूनियनें इसे सहज स्वीकार कर रही हैं। इससे यह साफ है कि मजदूर यूनियनें अपने लड़ने का माद्दा खो चुकी हैं। एक फैक्टरी के भीतर वह अपने ठेका मजदूरों व अन्य मजदूरों से एकता बनाने के प्रयास तक नहीं कर रही हैं। यह एकता एक यूनियन में संगठित होकर या ठेका मजदूरों की अलग यूनियन बनवाकर ठेका-स्थाई मजदूरों के साझे संघर्ष दोनों तरीकों से कायम हो सकती है। लम्बे समय से इन यूनियनों ने अपने स्थाई मजदूरों के वेतन-भत्ते बढ़वाने के तात्कालिक कार्यभार को मुख्य कार्यभार बनाकर, मजदूरों के दूरगामी संघर्ष से आंखें बंद कर ली हैं। आज जब मजदूरों पर छंटनी का हमला हो रहा है तो यूनियनें अपने को असहाय स्थिति में पाकर मजदूरों को ही कोस रही हैं। हालत यह है कि यूनियनें छंटनी के हमले के खिलाफ कोई प्रतिरोध तक नहीं कर पा रही हैं। 
    
मजदूर विरोधी 4 लेबर कोड्स पूरे मजदूर वर्ग पर एक बहुत बड़ा हमला है। उदारीकरण की नीतियों की पराकाष्ठा के रूप में हमें लेबर कोड्स के हमले को देखना चाहिए। लेकिन केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें लेबर कोड्स के खिलाफ कोई जुझारू प्रतिरोध अभी तक नहीं खड़ा कर पा रही हैं। यहां यह बताना भी सही होगा कि केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें मजदूर वर्ग पर हुए हमले पर कोई प्रतिरोध करने की स्थिति में हैं भी नहीं। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने मजदूरों को वर्ग सहयोग की शिक्षा-दीक्षा दी है। ट्रेड यूनियनों ने भी एक फैक्टरी के भीतर कार्य करने वाले स्थाई व ठेका मजदूरों को संगठित करने के कार्यभार को तिलांजलि बहुत पहले ही दे दी है। ऐसे में मजदूरों को केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों से लेबर कोड्स के खिलाफ संघर्ष करने की उम्मीद पालना बेमानी होगा।  
    
लेबर कोड्स लागू कर शासक वर्ग मजदूरों के जिस विभाजन को कानूनी जामा पहनाना चाहता है उसे मजदूरों की वर्गीय एकता ही रोक सकती है। अपनी वर्गीय एकता बनाकर ही मजदूर लेबर कोड्स के खिलाफ जुझारू प्रतिरोध की शुरूआत कर सकते हैं। यह वर्ग सचेत मजदूरों व यूनियनों को जल्द से जल्द करना होगा। कल बहुत देर हो जाएगी। यह हमारे दौर व मजदूर आन्दोलन की जरूरत है।             -गुड़गांव संवाददाता    

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