बड़े शहरों की पहचान: कूड़े के पहाड़

Published
Wed, 09/16/2026 - 15:50
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आजकल कोई चीज अगर सर्वव्याप्त है तो वह है कूड़े के ढेर। कूड़े के ढेर का कोई इतिहास तो मिलता नहीं। ये तो आधुनिक विकसित सभ्यता में ही पैदा हुआ है। सिन्धु घाटी सभ्यता बहुत विकसित थी जिसमें सीधी सड़कें और बड़े स्नानघर थे। न तो सिन्धु घाटी सभ्यता और न उसके बाद भी कूड़े का कोई इतिहास मिलता है। घर की सफाई को छोड़ दिया जाये तो दुनिया के धर्मों में भी बड़े पैमाने के कूड़े के ढेर के बारे मंे कोई बात नहीं कही गयी है। शहर की सफाई की व्यवस्था नगर निगम संभालता है जिसमें सबसे ऊंचे पद पर एक कमिश्नर होता है और उसके बाद भी एक बहुत बड़ी ओहदेदारों की फौज होती है। इसके अलावा सैकड़ों पार्षद और एक मेयर भी होता है। कमिश्नर तो हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा एक्जाम और ट्रेनिंग लेकर आया होता है और दूसरे ओहदेदार भी कुछ करके ही आये होते हैं। पार्षद तो खुद ही कूड़ा उठवाने और नालियों की सफाई के लिए खुद का पैसा खर्च कर चुनाव जीतकर आये होते हैं। 
    
भारत के शहरों को विकास के पैमाने पर देखना हो तो जो शहर जितना ज्यादा गारबेज या कूड़ा पैदा कर रहा है वह उतना ज्यादा विकसित हैै। जिन शहरों में कूड़ों के जितने ऊंचे पहाड़, वह उतना ज्यादा विकसित। दिल्ली के पहाड़ भी किसी हिमालयी पहाड़ से कम नहीं हैं। दिल्ली से सटे गुड़गांव में 1000 से 1200 टन गारबेज एक दिन में पैदा होता है जो फरीदाबाद-गुड़गांव रोड पर बंधवाड़ी प्लांट पर डम्प होते-होते पहाड़ बन चुका है। ऐसा ही हाल फरीदाबाद का है, यहां थोड़ा कम 800 से 1000 टन गारबेज ही पैदा हो पाता है। जितना गारबेज पैदा होता है उसके 80 से 90 प्रतिशत गारबेज का ही उठान हो पाता है बाकी तो शहर के अन्दर ही सड़कों पर या खाली स्थानों पर पड़ा रह जाता है। जाहिर सी बात है कि गरीब बस्तियों में ऐसा हो सकता है। इसके कारण आज सड़क और खाली स्थान गारबेज से भरती चली जा रही हैं। सड़क पर कूड़े-कचरे की परत चढ़ गयी है। बड़े-बड़े शहरों में लोग रात को निकलते हैं और कूड़े की थैली को किसी स्थान पर फेंक कर चले जाते हैं या फिर सुबह जब ज्यादतर लोग सो रहे होते हैं।
    
चुनावों में दोने-पत्तल, गिलास, दारू, पानी, नमकीन खूब चलता है और चुनाव जीतने के बाद शहर की सफाई के नाम पर खूब ठेके देने-लेने का काम चलता है। हर चुनाव के बाद कूड़े का पहाड़ और ऊंचा होता जाता है और जो कूड़ा बचा रह जाता है वह बेचारा आवारा सड़कों पर पड़ा रहता और अपनी हिम्मतभर बदबू मारता रहता है। लक्जरी बसें चलायी जा रही हैं लेकिन जहां से ये बसें चलती हैं वहां पर अगर आदमी पहचान सके तो सालों कचरा वैसे के वैसे ही पड़ा होगा। 
    
वैसे मध्यम वर्ग चलती-फिरती एक कूड़ा बनाने की मशीन होती है। वह पैक्ड थाली में खाना खाता है और बोतल बन्द पानी खरीदकर पीता है और बोतल धीरे से कहीं खिसका देता है या वहीं पर छोड़ कर चला जाता है। कुछ इनमें समझदार भी होते हैं जो इसे डस्टबिन में डालकर आते हैं और उनके चेहरे पर उस समय बुद्धिमत्ता झलकती है। इनके लिए स्वच्छता का यही मतलब होता है कि कूड़ा डस्टबिन में डाला जाय। राजधानी जैसी ट्रेनें हों या स्टार वाले होटल; हर ट्रेन व हर होटल से एक ट्रक कचरा तो निकलता ही होगा जो थाली, पानी की खाली बोतल, आइसक्रीम और दूसरे पेय और खाने वाले पदार्थ के रूप में होता है। जिनके पास पैसा है उनको कुछ न कुछ तो थोड़े समय बाद मिलता ही रहता है। 
    
बात हो रही थी कूड़े के ढेर की तो पुराने वाले पहाड़ तो अपनी ऊंचाई पूरी कर चुके हैं अब वे लैंडमार्क बन चुके हैं। पंजाब से जब दिल्ली में प्रवेश करते हैं तो भलस्वा एक लैंड मार्क है तो यूपी से प्रवेश होने पर गाजीपुर एक लैंडमार्क है। खाली जमीन पर जैसे कुछ न कुछ झाड़ी उग आती है तो वैसे ही अब शहरों में किसी भी खाली जमीन पर कूड़ा आ जाता है। कूड़े के ढेरों ने गन्दे नालों को भी पीछे छोड़ दिया है। शहरों में नये कूड़ाघर या डलाव बनाने की समस्या खड़ी हो गयी है। नये कूड़ा घर बनाने के लिए जगह नहीं मिल रही है। हर शहर में कूड़ों के पहाड़ों के बराबर ही कूड़ा लेटा पड़ा है। 
    
र त्योहार, हर भण्डारे, हर आस्था और हर शादी-बारात के बाद जो चीज बचती है वो कूड़ा ही है। वैसे जनता कूड़े के ढेर से ज्यादा परेशान भी नहीं है। परेशान तो तब होगी जब उसके पास कुछ समय हो। रोजी-रोटी की भागदौड़ में कौन इस पर ध्यान दे। ध्यान देने से भी होगा तो कुछ नहीं। पार्षद-विधायक या सांसद अपने खर्च किये हुए पैसों की भरपाई में लगे हुए हैं। 
    
कूड़े के जितने बड़े पहाड़ शहरों में खड़े हो गये हैं उससे ज्यादा कूड़ा तो लोगों के दिमागों में भी भरा हुआ है। नेताओं ने बयानबाजी कर-करके समाज में ढेर लगा दिया है और किसी ने जुमलों का ढेर। अदालतों ने लम्बित फैसलों का ढेर लगा रखा है। अब सवाल उठता है कि कौन सा कूड़ा साफ करने की पहले जरूरत है और कौन सा बाद में। नगर निगम और कमिश्नर लोगों से अपील कर रहे हैं कि सूखा और गीला कूडा अलग-अलग रखें, नगर निगम इससे बिजली बनायेगा। एयरपोर्ट, हाइवे, एक्सप्रेस वे, वन्देभारत, लक्जरी कारें, ब्रांडेड कपड़े, ही विकास नहीं है उसका दूसरा पहलू यह कूड़े के पहाड़ हैं जो इस सच्चाई को बयान करते हैं कि हमारे आज के पूंजीवादी विकास का ये जरूरी परिणाम हैं, जितना विकास होता जायेगा, यह पहाड़ बड़े होते जायेंगे; जब तक समाज के विकास की दिशा नहीं बदलती।         -खबीस, फरीदाबाद
 

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