ब्रिक्स सम्मेलन : सफलता कम ढिंढोरा ज्यादा

Published
Wed, 09/16/2026 - 15:50
/brics--2006-summit-safalata-kam-dhindhoraa-jyaadaa

12-13 सितम्बर को दिल्ली में 11 देशों के समूह ब्रिक्स का शीर्ष सम्मेलन सम्पन्न हुआ। सम्मेलन के बाद भारतीय मीडिया ने इसकी सफलता को प्रचारित करते हुए इसे भारत के वैश्विक कद बढ़ने के बतौर बताया। सम्मेलन द्वारा एक साझा घोषणा अपनाने को भारत की सफलता के बतौर प्रचारित किया गया। पर हकीकत यही है कि ब्रिक्स के इन 11 सदस्य देशों के बीच सहमति के साथ टकराव के ढेरों बिन्दु हैं और इसीलिए इस मंच की विवादित मसलों पर तेजी से आगे बढ़ने की कुछ खास उम्मीद नहीं है। इसीलिए यह सम्मेलन व साझी घोषणा दरअसल सफल सम्मेलन की तुलना में सफल दिखाने का प्रयास अधिक है। 
    
एक वैश्विक समूह के बतौर इसकी शुरूआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन द्वारा 2006 में की गयी। 4 वर्ष बाद द.अफ्रीका के इसमें शामिल होने पर इसका नाम ब्रिक से बदलकर ब्रिक्स हो गया। इसके पश्चात 6 देश मिश्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब व इंडोनेशिया इसके सदस्य बने। 
    
इस मंच की नेतृत्वकारी ताकत रूसी-चीनी साम्राज्यवादी रहे हैं। वे इस मंच को अमेरिकी साम्राज्यवादियों के नेतृत्व वाले पश्चिमी साम्राज्यवादियों के समूह के समक्ष चुनौती पेश करने वाला बनाना चाहते हैं। पर इस समूह के सभी 11 देश इस मामले में एकजुट नहीं हैं। खासकर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के साथ सम्बन्धों में अलग-अलग देश अलग-अलग रुख लिये हुए हैं। ईरान-रूस-चीन अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरोध में अधिक एकजुट हैं तो सऊदी अरब, यूएई, अमेरिकी साम्राज्यवाद के अधिक करीब हैं। भारत तो एक तरह से अमेरिका को ही अपना माई-बाप मानता रहा है। 
    
इस सम्मेलन में उम्मीद के मुताबिक अमेरिका-ईरान युद्ध ही अधिक चर्चा में रहा। इस युद्ध में ईरान के साथ रूस-चीन खड़े हैं तो अमेरिकी पाले में सऊदी अरब, यूएई। भारत भी कभी इधर कभी उधर होते हुए मूलतः अमरीकी पाले में रहा है। ऐसे में इस युद्ध के बारे में घोषणा में केवल इतनी गोलमोल बातों पर ही सहमति बन पायी कि इस विवाद को परस्पर वार्ता से निपटाया जाना चाहिए व तेल का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मार्ग खुला होना चाहिए। यानी घोषणा खुलकर अमेरिका-इजरायल द्वारा थोपे अन्यायपूर्ण युद्ध के लिए अमेरिका-इजरायल की आलोचना भी नहीं कर सकी। 
    
कुछ यही हाल यूक्रेन युद्ध के मसले पर था जहा मूलतः विवाद को परस्पर बातचीत से हल करने की बात से अधिक बात नहीं की जा सकी। 
    
घोषणा में अमेरिका-इजरायल का नाम लेकर आलोचना एक बार भी नहीं हुई। 
    
समूह की घोषणा में आज दुनिया को बहुध्रुवीय बनाने, ब्रेटन बुड्स व्यवस्था में सुधार आदि बातों के साथ मूलतः अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा खड़े की गयी वैश्विक संस्थाओं के ठीक ढंग से क्रियान्वयन के जरिये आगे बढ़ाने की बातें की गयीं। 
    
इन वैश्विक संस्थाओं के बरक्स नयी संस्थायें खड़ी करने की बातें रूसी-चीनी साम्राज्यवादी भी नहीं करते। वे इन्हीं संस्थाओं के सही क्रियान्वयन की बातें कर इनसे दूर भाग रहे अमेरिका की इनमें स्थिति को कमजोर करना चाहते हैं। 
    
इसीलिए दो ध्रुवों में बंटती दुनिया में परस्पर वर्चस्व के लिए तो संघर्ष है पर गरीब-कमजोर मुल्कों को लूटने यानी उदारीकरण-वैश्वीकरण-निजीकरण की नीतियों को आगे बढ़ाने के मामले में एकजुटता है। अमेरिकी साम्राज्यवादी खुद इन नीतियों से अलग संरक्षणवाद की ओर बढ़ते हुए इन नीतियों को दूसरे देशों पर थोपना जारी रखे हैं। 
    
ब्रिक्स बैंक या परस्पर व्यापार आपसी मुद्रा में करने की बातें अभी व्यवहार में उतरने से कोसों दूर हैं। 
    
इस सम्मेलन ने फिलिस्तीन के मामले में बगैर इजरायल का नाम लिए उसकी जनसांख्यिकी बदलने का विरोध व द्विराष्ट्र समाधान का समर्थन किया। 
    
कुल मिलाकर साझी घोषणा कुछ इस अनुरूप थी कि हर भागीदार पक्ष विवादित मसलों पर अपनी पहले से चली आ रही अवस्थिति को ठीक ठहरा सकता है। 
    
फिर भी बढ़ती अंतर साम्राज्यवादी प्रतिद्वन्द्विता के काल में इस सम्मेलन का महत्व इतना तो है ही कि चीनी-रूसी साम्राज्यवादियों ने इसके जरिये अमेरिका के सामने अपनी चुनौती बढ़ायी है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने अपने शुरूआती भाषण में जी-7 के बरक्स ब्रिक्स को रखते हुए कहा कि भविष्य में ब्रिक्स का प्रभाव बढ़ेगा। 
    
जहां तक भारतीय शासकों व मोदी का प्रश्न है तो मीडिया मैनेजमेंट के जरिये उन्होंने सभी नेताओं के आने व साझा घोषणा को भारत के बढ़ते कद के रूप में प्रस्तुत किया। बेरोजगार युवाओं, महंगाई की मार झेल रहे आमजन के आक्रोश का शिकार हो रही मोदी सरकार इस सम्मेलन के जरिये टीवी चैनलों पर अपनी वाहवाही करवा पायी। कुछ बुद्धिजीवी इसे भारत की सफलता के तौर पर दिखाने लगे। वास्तविकता यही है कि यह सब ढिंढोरा ही अधिक था। हकीकत यही है कि भारत के शासक अब इस सम्मेलन से नाराज ट्रम्प को मनाने की राह तलाशने में जुट गये हैं। जहां तक प्रश्न भारत की मजदूर-मेहनतकश जनता का है तो इन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की घोषणायें दरअसल उसकी लूट व शोषण को बढ़ाने का षड्यंत्र ही होती हैं। 

आलेख

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।