गिग कामगारों की दुर्दशा

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भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ-साथ गिग मजदूरों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। ये मजदूर घरों पर खाना पहुंचाते हैं; किराने का सामान पहुंचाते हैं; ई-कामर्स कंपनियों के वेयरहाउसों में काम करते हैं। टैक्सी और मोटरसाइकिलों पर व्यक्तियों और वस्तुओं को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने वाले कामगारों को भी इस श्रेणी में रखा जा रहा है। ये मजदूर और कामगार किसी प्लेटफार्म आधारित कंपनी के लिए काम करते हैं। लेकिन, इनके श्रम की लूट के दम पर अकूत मुनाफा कमाने वाली ये कंपनियां इन्हें अपना कामगार नहीं मानतीं। ये इन्हें ‘पार्टनर’ या ‘स्वतंत्र उद्यमी’ का सम्मानजनक लगने वाला ठप्पा देकर इनकी सामाजिक सुरक्षा संबंधी सारे दायित्वों से बरी हो जाती हैं। 
    
प्लेटफार्म आधारित ये कंपनियां आम तौर पर मोबाइल एप्प के माध्यम से तमाम तरह के कामगारों से जुड़ती हैं। ये एप्प कामगारों के लिए अपारदर्शी होते हैं। इन एप्प के एल्गोरिद्म इस तरह से संचालित होते हैं कि कामगारों पर बिना विश्राम किये लंबे घंटों तक काम करने का दबाव बना रहता है। कामगार चाहकर भी ऐसे आर्डरों को रद्द नहीं कर सकता जो किसी वजह से उसके लिए प्रतिकूल हो। हर आर्डर को पूरा करने पर कामगार को जो कमीशन मिलता है वह काफी कम होता है। साथ ही, एल्गोरिद्म इसकी दर को भी लचीला बनाता है जिस पर कामगार का कोई बस नहीं होता। ग्राहकों द्वारा किए गये दुर्व्यवहार, आने-जाने के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं, वाहनों के रख रखाव, कामगार के बीमार पड़ने, आदि के संबंध में कंपनी कोई जिम्मेदारी नहीं लेती। इन कामगारों को पी.एफ., ई.एस.आई, पेंशन आदि अधिकार नहीं हासिल होते। काम के लंबे घंटे ये सड़कों पर भाग दौड़ करते हुए बिताते हैं। इस दौरान शौचालय आदि का इनके लिए कोई इंतजाम नहीं होता। महिला कामगारों के लिए यह काफी परेशानी पैदा करता है। इन महिला कामगारों को मातृत्व संबंधी कोई अधिकार नहीं हासिल है। 
    
ई टी वी भारत को कुछ गिग कामगारों के द्वारा सुनाई गयी आपबीती कुछ इस प्रकार है : आशुतोष तिवारी सुल्तानपुर से दिल्ली आकर एक फूड डिलीवरी एप्प के लिए काम करते हैं। वे बताते हैं कि उन्हें एक डिलीवरी के लिए दस रुपया मिलता है और ज्यादा डिलीवरी होने पर कमाई बढ़ जाती है। कोई बोनस नहीं मिलता। दूरी के मुताबिक भुगतान बदल जाता है। स्वास्थ्य बीमा मिलता है जो कि अच्छा है लेकिन वाहन की सारी जिम्मेदारी उनकी अपनी है। देरी होने पर उन्हें ग्राहक के गुस्से का सामना करना पड़ता है। 
    
इटावा के नीतेन्द्र सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वे सुबह जल्दी अपने एप्प को चालू कर लेते हैं और कुछ घंटों के इंतजार के बाद इनका दिन शुरू होता है। एक से अधिक आर्डर होने पर पहले आर्डर के लिए 15 रुपये मिलते हैं और दूसरे के लिए दस। कंपनी दुर्घटना और स्वास्थ्य समस्या के लिए मदद का वादा करती है लेकिन वास्तविकता में कुछ नहीं करती। रद्दीकरण और खराब रेटिंग का खामियाजा इन्हें ही उठाना पड़ता है। अगर रेटिंग ज्यादा गिर जाए तो काम से बाहर किये जाने का खतरा होता है। यह काफी असुरक्षित काम है- खास तौर पर त्वरित डिलीवरी के दबाव की वजह से। 
    
युवराज एक ब्लिंकिट डिलीवरी कामगार हैं। वे कहते हैं कि वे हर दिन दस घंटे काम करते हैं और 800 रुपये कमाते हैं। उन्हें हर डिलीवरी पर 25 रुपये मिलते हैं, भले ही सामान का वजन कितना भी हो। गाडी के पैट्रोल और रख रखाव का खर्चा इनका होता है। कई बार लड़के अपनी प्रेमिका के लिए आर्डर करते हैं, लेकिन घर में किसी बड़े के मौजूद रहने पर लड़की डिलीवरी लेने से मना कर देती है। 
    
करन एक फूड डिलीवरी एप्प के लिए काम करता है। वह बताता है कि कई स्थान डरावने होते हैं जहां नशे में धुत्त लोग हंगामा करते हैं। एक बार उन्हें किसी बदमाश ने लूट लिया। कई बार कुत्ते के द्वारा काट लेने की खबर सुनने में आती है। कंपनी इन सब का कोई मुआवजा नहीं देती। 
    
निठारी गांव के शिव सोनी बताते हैं कि दो साल पहले फूड डिलीवरी करने वालों के लिए पार्किंग स्थल के पास साफ पीने का पानी और शौचालय का इंतजाम था, लेकिन अब इसे बंद कर दिया गया है। झुलसाती धूप में यह सब असहनीय हो जाता है। कुछ कामगार डिहाईड्रेशन की वजह से सड़क पर बेहोश भी हो गये। ढेरों नए कामगार कुछ महीनों में काम छोड़ देते हैं। तीन साल तक इस काम में टिके रहने को वह एक सफलता मानते हैं। समस्याओं के आने पर कंपनी कोई मदद नहीं करती, राईडर ही आपस में एक-दूसरे की मदद करते हैं। कुछ आर्डर काफी अतार्किक होते हैं जैसे - 50 किलोग्राम वजन के सामान या पानी की कई बड़ी बोतलें। एक आदमी कैसे इतना वजन उठा सकता है। इस पर ग्राहक से खराब रेटिंग मिलने का खतरा अलग से है। 
    
ई टी वी भारत के अनुसार एप्प आधारित डिलीवरी के कामगारों में से 34 प्रतिशत दस हजार रुपये प्रति माह से भी कम कमा पाते हैं। 76 प्रतिशत अपना खर्च पूरा नहीं कर पाते। 98 प्रतिशत कामगार दिन में दस घंटे से ज्यादा काम करते हैं। 48 प्रतिशत सप्ताह में एक भी दिन की छुट्टी नहीं करते। 42 प्रतिशत कामगारों को काम के दौरान हिंसा का सामना करना पड़ा है। 
    
अमेजन दुनिया की एक बहुत बड़ी ई कामर्स कंपनी है। भारत के बाजार में यह लगातार अपना विस्तार कर रही है। भारत में इसकी प्रतियोगी वालमार्ट के स्वामित्व वाली फ्लिपकार्ट के अलावा मीशो और रिलांयस हैं। भारत के हजारों मजदूर इस कंपनी में छंटाई, चुनने (पिक), पैक और डिलीवरी के कामों में लगे हुए हैं। यू एन आई ग्लोबल यूनियन द्वारा भारत में अमेजन के मजदूरों पर किये गये सर्वे में हासिल नतीजे कुछ इस प्रकार हैंः
    
अमेजन के वेयरहाउसों में काम करने वाले मजदूरों में से 81 प्रतिशत का मानना है कि कंपनी उनके काम के लिए जो लक्ष्य निर्धारित करती है उसे हासिल करना या तो बहुत कठिन होता है या कठिन। इन ऊंचे लक्ष्यों की वजह से मजदूर लगातार भागता रहता है और उसे विश्राम, आपस में बातचीत और यहां तक कि खाने के लिए समय नहीं मिलता। यह काम को असहनीय और अमानवीय बना देता है। 
    
अमेजन अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इंसानी निरीक्षण तथा स्वचालित सिस्टम के संयोजन का इस्तेमाल करता है। मजदूरों को छोटी-छोटी बातों पर ब्लैक लिस्ट कर दिया जाता है, चेतावनी पत्र दिया जाता है और निकाल भी दिया जाता है। जब मजदूर नौकरी पर लगता है तब उसे अंदाजा भी नहीं होता कि उसे किस तरह की निगरानी व्यवस्था में काम करना पड़ेगा। 
    
काम के दबाव की वजह से अमेजन के वेयरहाउसों में काफी दुर्घटनाएं होती हैं। सर्वे के दौरान 5 प्रतिशत मजदूरों ने बताया कि वे काम के दौरान दुर्घटनाओं के शिकार हो चुके हैं। अकूत मुनाफा कमाने वाली इस कंपनी के सिर्फ 25 प्रतिशत मजदूर मानते हैं कि वे अपनी बुनियादी जरूरत पूरा करने लायक कमा लेते हैं। अमेजन के आर्डर की डिलीवरी करने वाले ड्राइवरों ने यह भी बताया कि कंपनी शुरूआत में डिलीवरी के लिए जितना भुगतान करती थी, उसमें कटौती कर दी है। यह सब स्वचालित व्यवस्था के माध्यम से होता है जिस पर कामगारों को कोई नियंत्रण नहीं है। 
    
बेरोजगारी की समस्या की वजह से कठिन एवं असुरक्षित कार्य परिस्थिति के बावजूद कामगार इन प्लेटफार्म आधारित रोजगारों को करने के लिए बाध्य हो रहे हैं। अलग-अलग तरह की सेवायें प्रदान करने वाली ये कंपनियां पूंजी और तकनीक के दम पर इस तरह का एकाधिकार हासिल कर लेती हैं कि इनसे जुड़े बगैर इस तरह की सेवाओं के लिए ग्राहक नहीं मिलते। इसलिए, ये कंपनियां बाजार पर अपनी मजबूत पकड़ बना लेती हैं। पिछले समयों में इन प्लेटफार्म आधारित कामगारों के अधिकारों के सम्बन्ध में चर्चाएं भी शुरू हुई हैं और देश-दुनिया के स्तर पर इनको संगठित करने के प्रयास भी शुरू हुए हैं। इन कामगारों का अपनी साझी समस्याओं के लिए साझे संघर्ष के प्रयास स्वागत योग्य है। लेकिन, समस्याओं के समाधान का रास्ता वास्तव में तब खुलेगा जब यह संघर्ष पूंजी के खिलाफ व्यापक मजदूर मेहनतकशों के संघर्ष का हिस्सा बनेगा। 
  

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