आईएमपीसीएल (impcl) मोहान का निजीकरण

Published
Tue, 06/16/2026 - 10:50
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राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट

मोहान (रामनगर)/ मोदी सरकार द्वारा प्रतिष्ठित दवा कम्पनी आईएमपीसीएल (impcl) का निजीकरण करते हुये इसे स्काईमैप फार्मा को बेच दिया गया है। 26 मई को हुये सौदे की घोषणा के बाद कम्पनी के कर्मचारियों और क्षेत्र की जनता में भारी रोष है। 
    
आईएमपीसीएल (impcl - indian medicines pharmaceuticals corporation limited) आयुर्वेदिक और यूनानी दवा बनाने वाली देश में सरकारी क्षेत्र की एकमात्र कंपनी है। यह कम्पनी उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के मोहान में स्थित है, जो कि नैनीताल जिले के रामनगर के नजदीक स्थित है। 1978 में स्थापित यह कम्पनी अपने स्थापना वर्ष से आज तक लगातार मुनाफे में चल रही है। इसी कारण इसे ‘मिनी रत्न’ का दर्जा भी प्राप्त है। 
    
यह कम्पनी जंगलात से लीज पर हासिल करीब 35 एकड़ जमीन पर बनी हुई है। इसके पास 1200 से भी अधिक दवाएं बनाने का लाइसेंस है। इसकी दवाएं स्तरीय मानी जाती हैं और बाजार में आईएमपीसीएल (impcl) की ब्रांड वैल्यू बहुत अधिक है। इसके बावजूद मोदी सरकार ने इसका निजीकरण कर दिया, आखिर क्यों? 
    
1990-91 से कांग्रेस सरकार के जमाने से लागू उदारीकरण की नीतियों को मोदी सरकार ने 2014 से तेजी से आगे बढ़ाया है जिसके तहत औने-पौने दामों पर सरकारी संपत्तियां पूंजीपतियों को बेची जा रही हैं। वर्ष 2026-27 में मोदी सरकार का लक्ष्य सरकारी परिसंपत्तियां बेचकर 80 हजार करोड़ रु. जुटाने का है। इसी सरकारी नीति के तहत आईएमपीसीएल (पउचबस) को स्काईमैप फार्मा नामक एक दवा कम्पनी को महज 121 करोड़ रु. में बेच दिया गया। जबकि औपचारिक तौर पर ही कम्पनी की परिसंपत्तियां करीब 200 करोड़ होने का अनुमान है, हालांकि वास्तविक तौर पर इसकी कीमत इससे कई गुना है। इस सौदे के तहत कम्पनी द्वारा भरा जा चुका करीब 40 करोड़ का जीएसटी रिटर्न, 50 करोड़ की एफडी और 35 एकड़ भूमि सभी कुछ स्काईमैप फार्मा के खाते में चला गया है। असल में यह कोई सौदा नहीं बल्कि किसी खास पूंजीपति को सीधे-सीधे सरकारी संपत्ति को लुटाना है। आखिर मोदी सरकार स्काईमैप फार्मा पर इतनी मेहरबान क्यों है ? 
    
दरअसल स्काईमैप फार्मा के मालिक का नाम संजय गुप्ता है और ये महाशय रामलाल अग्रवाल के भांजे हैं। खुद रामलाल अग्रवाल भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव और वर्तमान में आरएसएस के राष्ट्रीय सम्पर्क प्रमुख हैं। मतलब वे संघ-भाजपा के बड़े नेता हैं। यही वजह है कि स्काईमैप फार्मा, जो कि खुद घाटे में चल रही एक कम्पनी है और जिसे आयुर्वेदिक और यूनानी दवाएं बनाने का कोई अनुभव भी नहीं है, को इतनी प्रतिष्ठित कम्पनी तोहफे में दे दी गई। इसी को कहते हैं ‘राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट’। 
    
कम्पनी में इस समय साठ-बासठ स्थायी कर्मचारी और करीब साढे तीन सौ ठेके के तहत नियोजित मजदूर कार्यरत हैं। इसके अलावा क्षेत्र की जनता इस कम्पनी को दवाएं बनाने के लिये जड़ी-बूटियां, आंवला, नीम एवं अन्य कच्चा माल उपलब्ध कराती है। इस तरह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर बहुत लोगों की रोजी-रोटी इस कम्पनी से जुड़ी है। 
    
स्काईमैप फार्मा के साथ जो सौदा हुआ है उसमें दर्ज है कि एक साल तक वह कर्मचारियों की छंटनी नहीं कर सकता और तीन साल तक कारोबार नहीं बदल सकता। इसका साफ मतलब है कि वह एक साल बाद कर्मचारियों की छंटनी भी कर सकता है और तीन साल बाद कोई दूसरा कारोबार भी कर सकता है। मतलब, वह चाहे तो तीन साल बाद दवा बनाना बंद कर इस कीमती जमीन पर होटल-रिजार्ट और बैंकट हाल भी बना सकता है। वैसे भी धामी सरकार का उत्तराखंड को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने पर बहुत जोर है और मोदी जी भी चाहते हैं कि उत्तराखंड को ‘वेडिंग डेस्टिनेशन’ के रूप में विकसित किया जाये। 
    
लेकिन, सवाल है कि इससे क्षेत्र की जनता को क्या मिलेगा? क्या इससे बेरोजगारी और पलायन नहीं बढ़ेगा? क्योंकि अभी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर जितना रोजगार आईएमपीसीएल (पउचबस) दे रही है, इसके बंद होने पर किसी होटल-रिजार्ट और बैंकट हाल में इसकी तुलना में बहुत कम लोगों को ही रोजगार मिल सकेगा। दूसरे, रोजगार का स्तर क्या होगा इसे इन होटल-रिजार्टों, जहां कोई श्रम कानून लागू नहीं होता है, में 10 हजार रु. महीना पर बारह-बारह घंटे खटते नौजवानों को देखकर आसानी से समझा जा सकता है।
    
आईएमपीसीएल (impcl) का कर्मचारी संघ इसके निजीकरण के विरुद्ध गेट पर आंदोलनरत है और हाईकोर्ट में भी उसने केस फाइल किया है। कर्मचारी संघ का कहना है कि जिस जमीन पर कम्पनी बनी है वह जंगलात की जमीन है जो कि उसने लीज पर दी थी और चूंकि सरकार ने जंगलात से इस सौदे की कोई अनुमति नहीं ली है इसलिये यह सौदा नियम विरुद्ध है और इसे रद्द किया जाना चाहिये। लेकिन, मोदी सरकार एक तानाशाह सरकार है, जो कि पूंजीपतियों के हितों के लिये प्रतिबद्ध है न कि नियम-कानूनों के लिये। रही बात कोर्ट-कचहरियों की तो, आज उनके हालातों से सभी वाकिफ हैं। ऐसे में स्थायी कर्मचारियों और ठेका मजदूरों की एकता और क्षेत्र की जनता की व्यापक एकजुटता और संघर्ष ही आईएमपीसीएल (impcl) को बचा सकता है। 
        -रामनगर संवाददाता 

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