लेबर चौक का नाम हर कोई जानता है। यह हर शहर में मिल जाएंगे। जहां मजदूर रोजगार की तलाश में आते हैं। यहां से मजदूरों को दिहाड़ी पर काम करने के लिए ले जाया जाता है और काम खत्म होने पर मजदूर फिर से काम की तलाश में लेबर चौक पहुंच जाता है। लेबर चौकों में ज्यादातर निर्माण कार्यों जैसे दीवार चिनाई, प्लास्टर, सफेदी- रंगाई-पुताई, पेंटर, कारपेंटर, फैक्टरियों में लोडिंग-अनलोडिंग आदि असंगठित क्षेत्र के मजदूर होते हैं।
देश में बेरोजगारी का आलम क्या है यह लेबर चौक में जाकर आसानी से पता लगाया जा सकता है। पहले बड़े शहरों में कुछ लेबर चौक होते थे पर पिछले कुछ सालों में बड़े तो क्या छोटे शहरों में भी कई लेबर चौक हो चुके हैं। इन लेबर चौकों में सैकड़ो की संख्या में मजदूर होते हैं और देश में इन लेबर चौकों की संख्या लाखों में है।
इन लेबर चौकों को ‘आधुनिक गुलाम मंडी’ भी कहा जा सकता है। जहां मजदूर सुबह होते ही अपनी पत्नी के साथ खाने का टिफिन या पोटली लेकर बिकने के लिए पहुंच जाते हैं। यह लेबर चौक ज्यादातर रोड़ के किनारे या चौराहों के पास होते हैं। जहां पर न किसी तरीके से बैठने की व्यवस्था होती है, न पानी व शौचालय और अन्य सुविधाएं। मजदूर इन परिस्थितियों में लेबर चौकों में रोज, बारहों महीने ठंड, गर्मी, बरसात में काम की तलाश में आता है।
लेबर चौक में जब भी कोई मोटरसाइकिल या गाड़ी वाला आता है तो मजदूर उसके चारों तरफ इकट्ठा हो जाते हैं। फिर शुरू होता है बिकने के लिए मोल भाव। जो सबसे सस्ती बोली लगायेंगे, उन्हें आज दिहाड़ी मिल जाएगी और मालिक उन्हें अपने साथ ले जाएगा। जो बच जाते हैं फिर से अपनी जगह पहुंच जाते हैं और किसी खरीदार का इंतजार करते हैं। यह सिलसिला दोपहर तक चलता रहता है। दोपहर तक जो लोग बच जाते हैं वह अपने खाने की पोटली लेकर वापस कमरे में (क्योंकि घर तो सैकड़ों किलोमीटर दूर छोड़कर काम की तलाश में यहां चले आए हैं) अगले दिन फिर से इसी प्रक्रिया को करने के लिए चले जाते हैं।
यहां भी अन्य जगहों की तरह महिला मजदूरों की स्थिति बहुत खराब होती है। वह सुबह तड़के उठकर पूरे दिन का खाना बनाती है और उसके बाद तैयार होकर लेबर चौक पहुंच जाती है। जिन महिलाओं को काम मिल जाता है वह दिनभर काम करती है और यह काम मेहनत वाला काम है क्योंकि ज्यादातर निर्माण कार्यों में महिलाएं हेल्पर का काम यानी ईंट-गारा को उठाकर ले जाने का काम करती हैं और शाम को काम से आने के बाद फिर से काम पर लग जाती हैं। और रात के खाने का इंतजाम करना और फिर सुबह के लिए तैयारी करना।
अब मोदी सरकार ने इन निर्माण और अन्य कामों में जुड़े मजदूरों के लिए ‘डिजिटल लेबर चौक’ मोबाइल ऐप शुरू किया है। कहां तो नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 2 करोड़ रोजगार हर वर्ष दिए जाएंगे और कहां योजना बन रही है डिजिटल लेबर चौक की। जिसका उद्घाटन भव्य तरीके से भारत मंडपम में केंद्रीय श्रम व रोजगार मंत्री ने 11 नवंबर को किया। इनका कहना है कि डिजिटल लेबर चौक मोबाइल ऐप में मजदूरों को अपना नाम, उम्र, पता, मोबाइल नंबर और मेल आईडी डालकर पंजीकरण करना होगा। साथ ही अपने काम से जुड़ी जानकारी भी भरनी होगी। इसके बाद पूरी प्रोफाइल बनकर तैयार होगी और मजदूर लेबर चौक आने की जगह ऐप के जरिए घर बैठे ही अपनी पसंद का काम चुन कर जा सकेंगे। इससे लेबर चौक पर लगने वाली भीड़ से भी राहत मिलेगी।
जब सरकार और नीति निर्धारकों का जनता से सरोकार खत्म हो जाए और काम सिर्फ वाहवाही लूटने और प्रचार के लिए किया जाए, तो इसी तरह की योजनाएं सामने आती हैं। कोई भी सामान्य मजदूर बता सकता है कि ये योजना अव्यावहारिक है। जो मजदूर 300-400 रुपए की दिहाड़ी के लिए लेबर चौक जाता है, क्या इन कार्रवाइयों को कर पाएगा। यह योजना भी मोदी की अन्य योजनाओं की तरह जुमला साबित होगी।
इस योजना में और भी वादे किए गए हैं। कहा गया है कि सरकार देशभर में 300 से अधिक लेबर चौकों को श्रमिक सुविधा केंद्र के तौर पर विकसित करेगी जिससे मजदूरों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। सुविधा केंद्रों में पक्की इमारत बनाई जाएगी जिसमें बिजली-पानी, इंटरनेट, श्रमिकों के पंजीकरण, स्वास्थ्य जांच, कौशल विकास ट्रेनिंग जैसी सुविधाएं होंगी।
क्या ऐसी सरकार जो पूंजीपतियों की संपत्ति को बढ़ाने के लिए सरकारी संपत्तियों को कौड़ियों के भाव बेच रही हो, सरकारी नौकरियों को खत्म कर रही हो, मजदूरों को नाम मात्र के मिल रहे श्रम अधिकारों में संशोधन कर घोर मजदूर विरोधी 4 श्रम संहिताएं लागू करने के लिए तत्पर हो, वह मजदूरों को किसी तरीके की सुविधाएं दे सकती है?
मोदी सरकार को देश के एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग का संरक्षण प्राप्त है और उन्हीं के मुनाफे के लिए यह मजदूर-किसान और अन्य मेहनतकशों की जिंदगी को और बदहाल करेगी। इनसे किसी तरीके की राहत व सुविधाओं की उम्मीद करना अपने आप को धोखा देना है।