अमरीकी साम्राज्यवादियों ने लेबनान की सरकार के सामने प्रस्ताव रखा है कि वह हिजबुल्ला के हथियारों को छीन ले या उन्हें नष्ट कर दे। अमरीका के लेबनान में राजदूत के इस प्रस्ताव पर लेबनानी प्रधानमंत्री ने सेना को यह आदेश दिया है कि वह अगस्त के अंत तक इस कार्रवाई को अंजाम दे दे और हिजबुल्ला को निरस्त्र कर दे। अमरीकी प्रस्ताव में लेबनानी सेना को अगस्त के अंत तक गैर-राज्यीय तत्वों को निरस्त्र करना शुरू करने का आदेश दिया गया है तथा यह अभियान 90 दिनों के भीतर पूरा करने की बात की गयी है। इस अभियान का अमरीका, फ्रांस और कई अरब राज्य भी सैन्य समर्थन कर रहे हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा प्रस्तावित और लेबनानी सरकार के प्रधानमंत्री द्वारा सेना को इस सम्बन्ध में आदेश देने का हिजबुल्ला और अन्य अमल आंदोलन संगठनों ने कड़ा विरोध किया है। अमल आंदोलन की स्थापना 1974 में शिया समुदाय के लोगों को लेकर मूसा अल सद्र ने की थी। वर्तमान में इसके लेबनानी संसद में 14 प्रतिनिधि हैं।
इस प्रस्ताव के बाद लेबनानी सेना की उन प्रमुख स्थानों पर तैनाती कर दी गयी है जहां पर हिजबुल्ला और अमल आंदोलन का प्रभाव है। इसके साथ ही, यहूदी नस्लवादी इजरायली सेना ने घोषणा की है कि उसने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्ला के ठिकानों पर हमला किया है। उसके हमले का निशाना हथियार डिपो और राकेट प्रक्षेपण स्थल रहे हैं।
हिजबुल्ला के संसदीय गुट- ‘‘प्रतिरोध गुट के प्रति वफादारी’’- ने अपनी साप्ताहिक बैठक के बाद एक बयान जारी करने के बाद यह घोषणा की कि लेबनान अमरीका-इजरायली आक्रमण के कारण अपने सबसे खतरनाक दौरों में से एक से गुजर रहा है और उन्होंने सरकार पर ‘‘विदेशी हुक्मों’’ के आगे झुकने और आक्रमण के खिलाफ एकमात्र उपलब्ध प्रतिरोधी बल को कमजोर करने का आरोप लगाया।
इस समय लेबनानी राज्य में दरारें और ज्यादा गहरी हो गयी हैं। लेबनानी सरकार बाहरी एजेण्डे से, अमरीकी-इजरायली एजेण्डे से, संचालित हो रही है। लेबनानी राष्ट्रपति प्रतिद्वन्द्वी ध्रुवों के बीच पैंतरेबाजी कर रहे हैं जब कि प्रधानमंत्री विदेशी मांगों को दोहरा रहे हैं। हिजबुल्ला के नेतृत्व में प्रतिरोध आंदोलन ही है जो देश की सम्प्रभुता और सुरक्षा सिद्धान्त के इर्द-गिर्द एक दृढ़ रेखा खींच रहा है।
हिजबुल्ला ने कहा है कि सरकार के इस फैसले को लागू करना असंभव है और कहा है कि हिजबुल्ला किसी भी टकराव के लिए तैयार है। हिजबुल्ला ने अपनी खुफिया जानकारी के आधार पर यह खुलासा किया है कि विदेशी तत्व लेबनान के प्रतिद्वन्द्वी गुटों को ऐसे समय में हथियार मुहैय्या करा रहे हैं जब हिजबुल्ला को निरस्त्रीकरण के लिए कहा जा रहा है। उसके अनुसार, यह एक बहुत ही संदिग्ध विरोधाभास है।
हिजबुल्ला और अमल आंदोलन के मंत्रियों ने इस निरस्त्रीकरण का विरोध करते हुए मंत्रिमण्डल की बैठक का बहिष्कार यह कहते हुए किया कि जब तक इजरायल लेबनान की कब्जा की गयी भूमि को खाली नहीं करता और जब तक लेबनानी कैदियों की रिहाई नहीं करता तथा लेबनान में गोलाबारी नहीं बंद करता, तब तक हिजबुल्ला को निरस्त्र करने का मतलब लेबनान को इजरायली प्रभुत्व के अधीन करना होगा। अमरीकी राजदूत का यह प्रस्ताव, दरअसल लेबनान को इजरायल के अधीन लाने का प्रस्ताव है। इजरायल की यहूदी नस्लवादी सत्ता जो युद्ध के जरिए नहीं कर पायी, वह अब लेबनानी सरकार पर दबाव डालकर वार्ता के जरिए करने की कोशिश कर रही है और इसमें अमरीकी साम्राज्यवादी पूरी तरह से इजरायली हुकूमत का साथ दे रहे हैं। यह लेबनान में प्रतिरोध आंदोलन को कुचलने की एक कुत्सित चाल है।
हिजबुल्ला के प्रतिरोध आंदोलन ने इजरायल द्वारा गाजा में चलाये जा रहे नरसंहार और महाविनाश के विरुद्ध संघर्ष में बड़े पैमाने पर कुर्बानियां दी हैं और इजरायली आक्रामकों के विरुद्ध संघर्ष का एक नया मोर्चा खोला था। वह लेबनान सरकार द्वारा इजरायल के साथ युद्ध विराम करने के फैसले से इसलिए सहमत हुआ था कि इजरायल लेबनान के अंदर नागरिकों की हत्या और तबाही रोक देगा और लेबनान की कब्जाई गयी भूमि को खाली कर देगा। लेकिन इजरायल ने इसका बार-बार उल्लंघन किया और आज भी कर रहा है। वह अभी भी उन पांच स्थानों पर कब्जा किये हुए है। ऐसे में हिजबुल्ला को निरस्त्र करने की लेबनानी सरकार की योजना इजरायली हमलावरों की ही मदद करेगी।
यदि लेबनानी सरकार इस योजना को लागू करने में अड़ी रही तो लेबनानी सेना के अंदर भी फूट पड़ सकती है, क्योंकि लेबनानी सेना के कम से कम एक तिहाई लोग किसी न किसी रूप में हिजबुल्ला और प्रतिरोध आंदोलन के प्रति हमदर्दी और जुड़ाव रखते हैं। लेबनानी सरकार की यह योजना लेबनान के अंदर गृहयुद्ध को भी भड़का सकती है।
जहां तक अमरीकी साम्राज्यवादियों और इजरायली यहूदी नस्लवादियों का ताल्लुक है वे अपने बृहत्तर इजरायल की योजना को परवान चढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं। इस योजना के अनुसार फिलिस्तीन राज्य को खतम करना है और सीरिया, लेबनान और अन्य अरब इलाकों को इजरायल में समाहित करना है। सीरिया में ये एक हद तक सफल भी हो गये हैं। अब लेबनान की बारी है। लेकिन प्रतिरोध आंदोलन उसके रास्ते में बड़ी बाधा है। और इससे भी बड़ी बाधा ईरान की हुकूमत है। ईरान के साथ 12 दिनी युद्ध में इजरायली शासकों को काफी हद तक मुंह की खानी पड़ी और ईरान इस युद्ध के बाद एक ताकत के तौर पर खड़ा रहा है। इसने इजरायली सेना की अजेयता को धूल धूसरित कर दिया है।
इसके बावजूद इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत अभी भी गाजा में नरसंहार जारी रखे हुए है। वह भूख को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। इसके बावजूद वह रोज ब रोज गाजा के प्रतिरोध आंदोलन के हमलों का शिकार हो रही है। खुद इजरायल के भीतर नेतन्याहू का विरोध बढ़ता जा रहा है। सेना उसके विरोध में खड़ी होने की ओर है।
अब अमरीकी साम्राज्यवादी ईरान की नये सिरे से घेरेबंदी कर रहे हैं। उन्होंने दक्षिणी काकेसस में आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच समझौता करा दिया है। इस समझौते में आर्मेनिया का एक हिस्सा, जिसमें अजरबैजान से होकर जाना पड़ता है, उसे अमरीकी साम्राज्यवादियों ने 99 वर्ष के लिए पट्टे पर ले लिया है। यह ईरान की सीमा से सटा हुआ है। यह जंगेजुर नाम का गलियारा अमरीकी साम्राज्यवादियों के नियंत्रण में आ जाने से ईरान की सुरक्षा के लिए सीधे खतरा है। यहां अमरीकी साम्राज्यवादी रूस, चीन और सबसे अधिक ईरान के लिए एक चुनौती बन रहे हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादी अपने विश्वव्यापी प्रभाव को कमजोर होते देखकर और ज्यादा आक्रामकता अख्तियार करने के लिए गोलबंदी कर रहे हैं।
लेकिन इसके प्रतिद्वन्द्वी साम्राज्यवादी- चीनी और रूसी साम्राज्यवादी भी अपनी वैश्विक साझेदारी को और व्यापक करके अमरीकी साम्राज्यवादियों को चुनौती दे रहे हैं। इसमें ईरान की एक बड़ी भूमिका है।
ईरान जहां शंघाई सहकार संगठन और ब्रिक्स आदि संगठनों के माध्यम से अपने क्षेत्रीय प्रभाव क्षेत्र के बढ़ा रहा है, वहीं पश्चिम एशिया में वह प्रतिरोध आंदोलनों की मदद कर रहा है। वह अभी इराक के साथ समझौता करके वहां से अमरीकी सेनाओं को बाहर करने के लिए इराक की सुदानी सरकार के साथ बातचीत कर रहा है और इराक के अंदर प्रतिरोध आंदोलन को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
इन सभी चालों और प्रतिचालों में सभी शासक लगे हुए हैं। इन संघर्षों में सभी जगह मजदूर-मेहनतकश आबादी शासकों की इन चालों-प्रतिचालों की शिकार हो रही है। वह स्वतंत्र शक्ति नहीं होने के चलते इनकी शिकार है और कोई बड़ी प्रतिरोधी शक्ति नहीं बन पा रही है।
लेबनान में भी मजदूर-मेहनतकश आबादी इन्हीं शोषक-शासक शक्तियों की शिकार है। लेकिन वे देर-सबेर अपनी स्वतंत्र भूमिका में आयेंगे और साम्राज्यवादियों, यहूदी नस्लवादियों सहित लेबनानी शोषक वर्गों को जवाब देंगे।