7 अगस्त को तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन, साऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का में एक रक्षा समझौते की घोषणा की। इससे पहले साऊदी अरब व पाकिस्तान बीते वर्ष इसी तरह का समझौता कर चुके थे। इस परस्पर रक्षा समझौते में यह प्रावधान शामिल है कि किसी भी एक देश पर हमला बाकी दोनों देशों पर हमला माना जायेगा।
इस तरह यह समझौता एक नये क्षेत्रीय गठबंधन की शुरूआत की संभावना लिये हुए है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका-ईरान तनाव में यह समझौता किस पाले की ओर झुका हुआ है। संकेत इसी के मिल रहे हैं कि इस तनाव में यह समझौता अमेरिकी छत्रछाया से निकल एक स्वतंत्र गठबंधन बनाने का प्रयास है।
पाकिस्तान परमाणु सम्पन्न देश है तो तुर्की द्रोण प्रौद्योगिकी व रक्षा विनिर्माण क्षमता में अग्रणी है व साऊदी अरब वित्तीय शक्ति है। ऐसे में इन तीनों देशों का एक साथ आना अपने आप में एक बड़ी ताकत बन सकता है।
हालिया अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर हमले के बीच साऊदी अरब व अन्य अरब मुल्कों ने पाया कि अमेरिका उनकी रक्षा करने के बजाय उन पर ईरानी हमले का कारण बन रहा है। इन देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों को ईरान ने निशाना बनाया। ऐसे में साऊदी अरब व कई अन्य अरब के देश अमेरिकी छत्रछाया से निकल अपने स्वतंत्र विकल्प तलाशने में जुट गये हैं। यह समझौता भी उसी दिशा में एक प्रयास है।
यद्यपि ये देश अभी इजरायल व ईरान दोनों से एक निश्चित दूरी बनाते दिख रहे हैं। पर फिर भी ये गठबंधन अमेरिकी साम्राज्यवादियों के लिए भविष्य में परेशानी का सबब बन सकता है।
भारत के विस्तारवादी शासक जो पाकिस्तान को अपना लम्बे समय से दुश्मन मानते रहे हैं, इस समझौते से पाकिस्तान की ताकत बढ़ने के प्रति सशंकित हैं।
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस गठबंधन में अरब के बाकी देश शामिल किये जायेंगे कि नहीं। इजरायल के नेतन्याहू ने इसे सुन्नी गठबंधन करार दे ईरान के इससे दूर रहने का दावा किया। गठबंधन में शामिल तीनों देश सुन्नी बहुल हैं। जबकि ईरान शिया बहुल है।
यह गठबंधन कितनी कारगर भूमिका निभाता है यह अभी भविष्य के गर्भ में है। पर यह इतना संकेत तो दे ही रहा है कि मध्य पूर्व में पुराने समीकरण बदल रहे हैं।