अर्थव्यवस्था
‘‘ग्रोथ की सांस अभी चल रही है..’’
मोदी सरकार आये दिन भारत की अर्थव्यवस्था और उसकी विकास दर के कसीदे गढ़ती है। कहा जाता है कि भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। और बस चंद साल ही बचे हैं जब
पूंजीपतियों की ‘शांति’
पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने एक नया विधेयक ‘शांति’ संसद से पारित कर राष्ट्रपति से हस्ताक्षरित करवा कानून बना दिया। इस कानून का शीर्षक ‘भारत के परिवर्तन के लिए परमाणु ऊर्ज
जीडीपी आंकड़ों से भरोसा क्यों उठा -अरूण कुमार
भारत के राष्ट्रीय खातों पर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की निराशाजनक रिपोर्ट ने देश के वृहद आर्थिक आंकड़ों की संदिग्ध प्रकृति की ओर एक बार फिर ध्यान खींचा है। 26 नवं
भारत का संकट
इस वर्ष हमारे देश में जो-जो कुछ घटा (भारत-पाकिस्तान युद्ध, कथित आतंकवादी घटनाएं, पंजाब व अन्य राज्यों में बाढ़ से तबाही, गिरता रुपया, बढ़ती जाती बेरोजगारी व महंगाई आदि) उसक
सार्वजनिक/सरकारी संस्थाएंः निजीकरण और बेरोजगारी
पिछले कुछ सालों से अक्सर ही देखने में आ रहा है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते छात्रों की हताशा और निराशा उन्हें सड़कों पर उमड़ने को बाध्य कर दे रही है। इस हताशा और न
कोई ऊंट को पहाड़ तो दिखाये
मोदी सरकार इस वक्त भारत की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था का गुणगान करती रहती है और दावा करती है कि वह अगले दो-तीन वर्षों में दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेगी। क्या भ
गिरता रुपया बढ़ता मौन
कभी मोदी ने रुपये के मूल्य को तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इकबाल से जोड़ दिया था। और कहा था कि दोनों में होड़ मची है कि कौन कितने नीचे गिरता है। आजकल जब रुपया लगातार न
अडाणी की सेवा में एल आई सी
अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट की एक खबर के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र की भारतीय बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एल आई सी) ने अडाणी समूह में 3.9 अरब डालर का निवेश किया है।
‘‘GST महोत्सव’’
मोदी सरकार ने 1 जुलाई 2017 से जीएसटी कानून लागू किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नारा दिया गया कि ‘एक राष्ट्र, एक कानून’। वैसे ऐसा नहीं था। जीएसटी की कई दरें थीं और
राष्ट्रीय
आलेख
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।