रसोई गैस-तेल-खाद की मारामारी : बंशी बजाता नीरो

Published
Mon, 03/16/2026 - 07:01
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ईरान युद्ध का असर भारत की सड़़कों पर नजर आने लगा है। रसोई गैस भरवाने की लम्बी कतारें इस बात की गवाह हैं कि अमेरिकी-इजरायल मिसाइलें भले ही ईरान को तबाह कर रही हों पर उसका असर भारत सरीखे देशों की मजदूर-मेहनतकश जनता पर भी पड़ रहा है। अभी तेल-गैस की मारामारी ही सड़कों पर नजर आ रही है पर आने वाले वक्त में रासायनिक खाद की मारामारी और सभी चीजों के दामों में भारी वृद्धि भारत की जनता का इम्तहान लेगी। 
    
ईरान द्वारा होरमुज जलडमरूमध्य बंद करने की घोषणा से भारत सरीखे देशों को तेल-गैस के साथ खाद की आपूर्ति प्रभावित हो चुकी है। इन सभी के दाम तेजी से बढ़ने लगे हैं। ईरान दुनिया में चौथे नम्बर का यूरिया निर्यातक रहा है। आधी सल्फर आधारित खाद का निर्यात मध्य पूर्व से होता है। इसलिए यह युद्ध खाद आपूर्ति को गम्भीर रूप से प्रभावित कर उसके दामों में भारी वृद्धि कर किसानों को तबाह करने के साथ खाद्यान्नों के दामों में भारी वृद्धि की संभावना लिए हुए है। 
    
ऐसे वक्त में जब भारत की जनता तेल-गैस-खाद की मारामारी से जूझ रही है तो भारत सरकार क्या कर रही है? युद्ध के मसले पर वह आतताई ट्रम्प-नेतन्याहू के साथ खड़़ी है। भारतीय नीरो चैन की बंशी बजा रहा है और उसे सड़कों पर लगी आग नजर ही नहीं आ रही है। 
    
भारतीय नीरो घोषणा कर रहा है ‘‘घबराना मत! पेट्रोल-गैस की कोई कमी नहीं है’’। एक ओर नीरो यह घोषणा कर रहा है दूसरी ओर गैस सप्लाई बाधित होने, गैस के दामों में वृद्धि होने, गैस बुकिंग की समय सीमा बढ़ने की खबरें आ रही हैं। भारत की मजदूर-मेहनतकश जनता बीते 12 वर्षों के मोदी शासन के अनुभव से जान चुकी है कि सरकार जब लोगों से ‘न घबराने’ की बात करे तो वास्तव में घबराने की जरूरत है। नोटबंदी के वक्त भी सरकार ने ‘न घबराने’ को कहा था तब जनता ने नोट बदलवाने की लाईनों में खड़े-खड़े जान दे दी थी। जी एस टी के वक्त भी ‘न घबराने’ का नतीजा ढेरों छोटे-मझोले उद्योगों की तबाही व लाखों लोगों की बेकारी के रूप में सामने आया था। अभी भारत-अमेरिकी व्यापार समझौते के वक्त जब मोदी ने दावा किया कि वो देश के किसानों के हितों से कोई सौदा नहीं करेंगे तो किसान समझ चुके थे कि उनका सौदा किया जा रहा है। और अब जब रसोई गैस के मसले पर सरकार ‘न घबराने’ की बात कर रही है तो जनता समझ चुकी है कि घबराने का वक्त आ चुका है। 
    
मोदी सरकार इस मारामारी के वक्त क्या कर रही है? वह ‘न घबराने’ का झूठा ढिंढोरा पीटने के साथ-साथ आपदा में अवसर तलाश रही है। वह सारी मारामारी के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराने में जुटी है। इसके अलावा वह कुछ नहीं कर रही है। कहां तो जरूरत इस बात की थी कि सरकार देश में गैस की कमी की भरपाई के लिए दूसरे देशों से खरीद बढ़ाती, गैस प्रदाता कम्पनियों की मनमानी पर रोक लगाती, उसकी कालाबाजारी, जमाखोरी से सख्ती से निपटती और घर-घर गैस पहुंचवाने का इंतजाम करती। पर जब सरकार खुद कालाबाजारी करने वालों-जमाखोरों की हो तो भला ऐसी सरकार से क्या उम्मीद की जा सकती है। 
    
जाहिर है ऐसी मारामारी के वक्त गैस प्रदाता कंपनियां-कालाबाजारियों-जमाखोरों को आपदा में अवसर मिल चुका है। वे दोनों हाथों से इस अवसर को भुनाने में लगे हैं। घरेलू गैस के दाम 60 रु. प्रति सिलेण्डर बढ़ चुके हैं पर खुले बाजार में कई गुना अधिक के भाव गैस बेची जा रही है। इस लूट में अडाणी से लेकर छुटभैय्ये जमाखोर सभी चांदी काट रहे हैं। 
    
ईरान युद्ध अगर लम्बा खिंचता है तो यह मारामारी और बढ़ने की संभावना है तब यह रसोई गैस से आगे बढ़कर अन्य सामानों के मामले में भी नजर आने लगेगी। मोदी सरकार की बदइंतजामी इसे और बढ़ाने का काम करेगी। वैसे भी इस मारामारी को पैदा करने में ट्रम्प-नेतन्याहू के साथ उनके मूक समर्थक बने मोदी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। 
    
इसीलिए इस मारामारी से निपटने की उम्मीद मोदी सरकार से नहीं की जा सकती वह तो हत्यारे ट्रम्प की भक्ति करते हुए चैन की बंशी बजा रही है। इस मारामारी से भारत समेत दुनिया की मजदूर-मेहनतकश जनता ही निपट सकती है। वह युद्ध के विरोध में भारी तादाद में सड़कों पर उतर हत्यारे ट्रंप-नेतन्याहू के हत्या अभियान को रोकने में भूमिका निभा सकती है। साथ ही वह गैस-तेल-खाद की मारामारी के लिए मोदी सरकार को घेर सकती है। उसे सही इंतजाम करने या फिर गद्दी छोड़ने को मजबूर कर सकती है। मजदूर-मेहनतकश जनता अपनी एकजुटता की ताकत पर भरोसा कर सकती है जब श्रीलंका-बांग्लादेश-नेपाल की जनता अपने शासकों को भागने-गद्दी छोड़ने को मजबूर कर सकती है तो भारत की करोड़ों-करोड़ जनता भी मोदी सरकार को दिन में तारे दिखा सकती है। चैन की बंशी बजाते नीरो को बंशी समेत रुखसत कर सकती है। 

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