संगठित क्षेत्र की सभी फैक्टरियों ने रखे ठेके पर श्रमिक

श्रम ब्यूरो के उद्योगों के सालाना सर्वे (SSI) के आंकड़ों के मुताबिक संगठित क्षेत्र की सभी फैक्टरियों ने ठेके पर कर्मचारी रखने शुरू कर दिए हैं। इससे देश में श्रम बल को ठेके पर रखे जाने की बढ़ती धारणा का पता चलता है।
    
सर्वे में शामिल 1,98,628 फैक्टरियों में से 98.4 प्रतिशत ने 2019-20 में ठेके पर श्रमिकों को रखा है। यह इसके पहले के साल की तुलना में 71 प्रतिशत ज्यादा है। 2011 में सिर्फ 28.3 प्रतिशत फैक्टरियों ने ठेके पर श्रमिकों को रखा था। संगठित क्षेत्र में कुल कर्मचारियों में ठेके पर काम करने वाले लोगों की संख्या बढ़कर 2019-20 में 50.2 लाख (38.4 प्रतिशत) हो गई है, जो 2011-12 में 36.1 लाख (34.6 प्रतिशत) थी। इंपैक्ट ऐंड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के विजिटिंग प्रोफेसर और श्रम अर्थशास्त्री के.आर. श्याम सुंदर ने कहा कि नई श्रम संहिता में न सिर्फ बाहरी कामों को ठेके पर कराने की अनुमति है, बल्कि प्रमुख गतिविधियों में भी ठेके पर श्रमिक रखे जा सकते हैं।
    
22 प्रमुख राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में 2019-20 में श्रम ब्यूरो को रिपोर्ट करने वाली फैक्टरियों के आंकड़ों से पता चलता है कि चंडीगढ़ और उत्तराखंड ने पूरी तरह ठेके के श्रमिकों को नियुक्त किया, उसके बाद छत्तीसगढ़ ने 99.97 प्रतिशत, तमिलनाडु और दिल्ली ने 99.96 प्रतिशत और हरियाणा ने 99.82 प्रतिशत ठेके पर श्रमिकों की नियुक्ति की है। सबसे कम ठेके पर श्रमिक नियुक्त करने वाला राज्य तेलंगाना (83 प्रतिशत) है। 2011 से 2020 के बीच सीधे और ठेके के श्रमिकों के वेतन के बीच अंतर 24.6 प्रतिशत से घटकर 15.6 फीसद रह गया है। 2019-20 में रोज भुगतान पर काम करने वाले ठेका श्रमिकों ने सबसे ज्यादा केरल में 554 रुपये कमाए। उसके बाद तमिलनाडु (548 रुपये), चंडीगढ़ (546 रुपये) ओडिशा (526 रुपये) का स्थान है।
    
वहीं सीधे काम करने वालों ने सबसे ज्यादा झारखंड(969 रुपये) में कमाए हैं और उसके बाद ओडिशा (783 रुपये) और चंडीगढ़ (657 रुपये) का स्थान है। भविष्य निधि और बोनस जैसे सामाजिक सुरक्षा लाभ का भुगतान करने वाली फैक्टरियों की हिस्सेदारी 2011 से 2020 के दौरान घटी है। 2019-20 में सिर्फ 67 प्रतिशत फैक्टरियों ने भविष्य निधि (पीएफ) का भुगतान किया है और सिर्फ 55 प्रतिशत फैक्टरियों ने बोनस दिया है जबकि 2010-11 में यह हिस्सेदारी क्रमशः 73 प्रतिशत और 64 प्रतिशत थी। 
        साभार: बिजनेस स्टैण्डर्ड

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