फासीवाद

जनता का चुनाव करते हिंदू फासीवादी

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देश में चुनाव के दौरान अक्सर ही गुस्से में आकर कई लोग कहते सुने जाते हैं कि अब उक्त पार्टी को हम वोट नहीं करेंगे। लंबे समय से यही देखा गया है कि किसी एक पार्टी की सरकार क

एस आई आर : मुसलमानों के नाम काटने के हथकंडे

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संघ-भाजपा में एक प्रतियोगिता चल रही है। यह प्रतियोगिता इस बात की है कि कौन सा नेता कितना घटिया-जहरीला-नफरती बयान दे सकता है। कौन मुसलमानों को कितनी भद्दी भाषा में गरिया स

नारा राम का कर्म शैतान का

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किसी जमाने में ‘जय श्री राम’ का नारा गूंजने पर महसूस होता था कि कोई धार्मिक आस्थावान टोली मंदिर की ओर पूजा के लिए जा रही हो। पर आज इस नारे के तेवर और अर्थ बदल गये हैं। इस

इंदौर में दूषित पानी से मौतें

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इंदौर साफ-सफाई में सबसे स्वच्छ शहर का दर्ज़ा पाने वाला शहर है। सरकार करोड़ों रुपया फूंक इसे स्मार्ट सिटी बनाने पर उतारू है। लेकिन पिछले दिनों यहां दूषित पानी पीने से कई जान

अजित डोभाल के संघी बोल

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11 जनवरी को दिल्ली में भारत मंडपम में एक कार्यक्रम का उद्घाटन हुआ। कार्यक्रम था ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलाग’। इस कार्यक्रम में अजित डोभाल जो कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहक

नफरत, हिंसा और नस्लवाद

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हिटलर की आत्मा के भारत के भीतर यात्रा के 100 साल हो चुके हैं। एक ओर यह सत्ता के शीर्ष पर विराजमान है तो दूसरी तरफ अब हर शहर की गलियों में ये मौजूद है। इनके प्रभाव में नफर

नेहरू, गांधी और हिन्दू फासीवादी

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वैसे तो उस समय सारी दुनिया में ही इस तरह के पूंजीवादी विकास के रास्ते की धूम थी पर गांधी के लिए स्पष्ट था कि किसी धार्मिक पांगापंथी और साम्प्रदायिक नेता के बदले आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में यकीन करने वाले नेता के नेतृत्व में इस रास्ते पर चलना ज्यादा सुगम होगा। इस तरह ज्यादातर धार्मिक पोंगापंथी पूंजीपतियों के लिए भी नेहरू ज्यादा माकूल नेता बनते थे। इसी वजह से यह हुआ कि इन्हीं पूंजीपतियों से चंदा वसूल कर कांग्रेस पार्टी का खर्चा चलाने वाले पटेल के बदले नेहरू प्रधानमंत्री बन गये जो संगठन के रगड़-घिस्स वाले काम के बदले ‘हाई पालिटिक्स’ में ज्यादा रुचि रखते थे। 

शासकों की लगाई आग में झुलसता असम

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पिछले दिनों असम के कार्बी आदिवासी बहुल दो पहाड़ी जिलों में हिंसा भड़क उठी। इस हिंसा में 2 व्यक्ति मारे गये व दर्जनों घायल हो गये। ढेरों पुलिसकर्मी भी घायल हुए। पश्चिमी कार्

फिर ये बिलबिलाहट क्यों?

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इन दिनों भारतीय प्रचार माध्यमों और संघी मानसिकता वाले लोग दीपू चन्द्र दास की हत्या पर बहुत दुःखी लग रहे हैं। हालांकि इन दोनों को दीपू चन्द्र दास से कोई लेना-देना नहीं है।

समूची शिक्षा को संघी बनाने की कवायद

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2047 तक देश को विकसित बनाने की मोदी सरकार की नौटंकी जारी है। देश विकसित बने न बने पर देश के कानून जरूर विकसित भारत नाम के हो जायेंगे। इसी कड़ी में उच्च शिक्षा से जुड़ा एक न

आलेख

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।