कामरेड अर्जुन प्रधान: एक श्रद्धांजलि
इंकलाबी मजदूर केन्द्र की बलिया इकाई के जुझारू कार्यकर्ता कामरेड अर्जुन प्रधान का गत 22 मई 2026 को देहान्त हो गया। गाजीपुर-बलिया की सीमा पर स्थित ग्राम कमसड़ी (बखरिय डीह) क
इंकलाबी मजदूर केन्द्र की बलिया इकाई के जुझारू कार्यकर्ता कामरेड अर्जुन प्रधान का गत 22 मई 2026 को देहान्त हो गया। गाजीपुर-बलिया की सीमा पर स्थित ग्राम कमसड़ी (बखरिय डीह) क
हरिद्वार/ हरिद्वार में मजदूरों के स्वतः स्फूर्त संघर्षों की बढ़ती के बीच जिला प्रशासन व पुलिस इन आंदोलनों को कुचलने पर उतारू है। इसी उद्देश्य से वह इन संघ
दिल्ली/ 24 मई 2026 को मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) द्वारा दिल्ली के राजेंद्र भवन में ‘मजदूर आंदोलन का मौजूदा उभार और बढ़ता दमन चक्र’ विषय पर कन्वेंशन
भारत में दहेज प्रथा केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि हजारों महिलाओं की जान लेने वाली एक संगठित हिंसा बन चुकी है। हर वर्ष अनेक महिलाएं शादी के बाद मानसिक और शारीरिक प्रता
देश के बड़े हिस्से में मजदूर संघर्षों की लहर जारी है। उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के दौर में ज्यादा तेजी बढ़ती हुई पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग की खाई की पृष्ठभूमि में मजदूरी
इस बार मजदूर आंदोलन की नई लहर और पुलिसिया दमन के साये के बीच जोश और गुस्से-आक्रोश के साथ मई दिवस मनाया गया। इस अवसर पर मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) द्वारा न्यूनतम वे
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार नोएडा में हुए मजदूर आंदोलनों से इतना घबरा गयी है कि वह अब मई दिवस की महान परंपरा को भी नहीं मनाने दे रही है। मई दिवस के शहीदों को याद करने से भ
फरीदाबाद/ दिनांक 14 मई 2026 को फरीदाबाद जन संघर्ष समिति के बैनर तले इंकलाबी मजदूर केंद्र एवं अन्य घटक संगठनों ने एक प्रदर्शन आयोजित किया। यह प्रदर्शन हरि
देश में चल रही मजदूर उथल-पुथल के बीच मानेसर और नोएडा दो ऐसे केन्द्र के रूप में उभर कर आए जहां मजदूर संघर्ष फैक्टरी दायरों को लांघ कर आगे बढ़ गया। इन दो केन्द्रों में कई फै
19 अप्रैल 2026 को लघु सचिवालय, गुड़गांव में मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) के आह्वान पर देश भर में जारी मजदूर आंदोलनों और उन पर हो रहे पुलिसिया दमन के खिलाफ एक विरोध-प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस
तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?
अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।