वेनेजुएला के बाद ईरान पर ट्रम्प की गिद्ध निगाहें

Published
Fri, 01/16/2026 - 07:01

नये वर्ष 2026 की शुरूआत के साथ अमेरिकी सरगना ट्रम्प ने नया चोला पहन लिया है। उसने ‘शांति दूत’ का अपना पुराना स्वघोषित चोला उतार कर क्रूर हत्यारे का रूप धर लिया है। वैसे तो क्रूर हत्यारे का चोला ही उसका असली चोला है। जब वह शांति की बात भी कर रहा था तो भी उसके मुंह से खून ही टपक रहा था। अमेरिकी साम्राज्यवाद के इस सरगना का नये वर्ष में पहला निशाना वेनेजुएला बना, जिसके राष्ट्रपति का इसने रातों-रात खूनी अपहरण कर लिया। और अब इसके निशाने पर ईरान और ग्रीनलैण्ड आ चुके हैं। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादियों और उसकी खुफिया एजेंसी सी आई ए के बीते 100 वर्षों के कारनामे ये दिखाने के लिए काफी हैं कि विश्व की सबसे क्रूर-हत्यारी-आतंकी हुकूमत अमेरिकी हुकूमत है। अनगिनत तख्तापलट-रातों-रात हत्या-अपहरण से लेकर ढेरों देशों पर युद्ध थोपने का इनका रक्त रंजित इतिहास है। अमेरिकी साम्राज्यवादी अन्याय-उत्पीड़न-हिंसा-गुंडागर्दी-आतंक के सबसे संगठित गिरोह बन चुके हैं। 
    
और जब एक सनकी धुर दक्षिणपंथी ट्रम्प अमेरिकी साम्राज्यवाद का मुखिया बन जाये तो स्थिति की भयावहता समझी जा सकती है। कभी यह सनकी नोबल की चाहत में खुद को शांति दूत बताने लगता है तो कभी गाजा पट्टी को खाली करवा वहां अपनी ऐशगाह बनाने का ख्वाब देखने लगता है। कभी वह टैरिफ के हमले से समूची दुनिया को नचाने में जुट जाता है तो कभी क्रूर तानाशाह की तरह गरीब मुल्कों के राष्ट्राध्यक्षों को हड़काने लग जाता है। अमेरिकी साम्राज्यवादी वित्त पूंजी का यह प्रतिनिधि दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व को किसी भी कीमत पर बनाये रखने के लिए छुट्टे सांड की तरह हर किसी को सींग मारने में जुटा है। 
    
वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण कर वहां की तेल सम्पदा तक अमेरिकी कम्पनियों की पहुंच सुनिश्चित करने के बाद इसकी निगाहें ईरान पर टिक गयी हैं। ईरान में खामनेई की इस्लामिक सत्ता के खिलाफ जनता सड़कों पर है। 28 दिसम्बर से ईरानी मुद्रा के भारी अवमूल्यन और बढ़ती महंगाई के चलते व्यापारियों के प्रदर्शन शुरू हुए। शीघ्र ही ये प्रदर्शन देशव्यापी बन गये और छात्र-युवा-महिलायें इन प्रदर्शनों में शामिल हो गये। प्रदर्शनकारी लुटेरी हुकूमत के खिलाफ ईरान के सभी राज्यों में सड़कों पर उतरे हुए हैं। और खामनेई हुकूमत महंगाई-बेकारी से त्रस्त जनता की मांगों पर ध्यान देने के बजाय उसके क्रूर दमन में जुटी हुई है। प्रदर्शनकारियों पर सीधे गोली चलायी जा रही है। हजारों की तादाद में गिरफ्तारी की गयी है। इण्टरनेट बंद कर दिया गया है। खामनेई हुकूमत इन प्रदर्शनों को पश्चिमी साम्राज्यवादियों द्वारा प्रायोजित बता निर्मम दमन कर रही है। साथ ही वह अपने समर्थन में भी प्रदर्शन आयोजित करवा रही है। 
    
वास्तविकता यही है कि ये प्रदर्शन ईरानी पूंजीवादी हुकूमत की नीतियों के चलते पैदा बदहाली के विरोध में आम जनता की प्रतिक्रिया हैं। निश्चय ही इसमें पश्चिमी साम्राज्यवाद समर्थक विपक्षी दल-शाह पहलवी से जुड़े राजशाही समर्थक तत्व भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं। वे प्रदर्शनों के सहारे खामनेई की सत्ता को उखाड़ फेंकना चाह रहे हैं। 
    
अमेरिकी सरगना ट्रम्प भी इन्हीं प्रदर्शनों का सहारा लेकर ईरानी जनता के क्रूर दमन की बातें कर ईरान पर हमला करने की संभावना तलाश रहा है। उसका प्रदर्शनकारियों को यह कहना कि ‘वे प्रतिष्ठानों पर कब्जा करें’, कि ‘अमेरिकी मदद रास्ते में है’ दिखलाता है कि कैसे वह प्रदर्शनकारियों की मदद के बहाने ईरान में अपना खूनी पंजा धंसाने को तैयार है। 
    
ईरान की प्रदर्शनरत जनता अपने इस्लामी मुल्लाओं और साम्राज्यवादी अमेरिका की रस्साकशी में पिस रही है। ऐसे में इन दोनों जनविरोधी ताकतों से दूरी बनाकर ही वह बेहतरी की ओर बढ़ सकती है। ट्रम्प के हस्तक्षेप या राजशाही की वापसी से उम्मीद पाल कर वह कुंए से निकल खाई में गिरने को ही अभिशप्त होगी। ऐसे में जरूरी है कि वो अमेरिकी साम्राज्यवादियों को स्पष्ट संदेश दे कि ईरान के मुल्लाओं से ईरानी जनता खुद निपट लेगी, उन्हें अमेरिकी हस्तक्षेप मंजूर नहीं है। 
    
वेनेजुएला-ईरान-ग्रीनलैण्ड पर खूनी लार टपकाते अमेरिकी सरगना ट्रम्प के मंसूबों का रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों ने विरोध किया है तो ज्यादातर देशों के पूंजीवादी शासकों ने चुप्पी का सहारा लिया है। भारत की मोदी सरकार भी अमेरिकापरस्ती में डूब खामोश बैठी है वहीं दुनिया भर में मजदूर-मेहनतकश जनता ने खुलकर ट्रम्प के मंसूबों का विरोध किया है। अमेरिका से लेकर दुनिया भर में उठ रही जनता की यह आवाज ही वो ताकत है जो सनकी अमेरिकी साम्राज्यवादियों को सबक सिखा सकती है। 

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