हादी की हत्या के बाद बांग्लादेश में आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक तरफ, छात्र-युवा और व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी इन विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा ले रही है और दूसरी तरफ, समाज की शोषक शक्तियां इन विरोध प्रदर्शनों का इस्तेमाल करके इसे साम्प्रदायिक रंग देने और अंधराष्ट्रवाद का रंग देने की कोशिश और साजिश रचने में लगी हुई हैं। अभी हाल में यह विरोध प्रदर्शन सभी बड़े और छोटे शहरों में नाकेबंदी करने में तब्दील हो गया है। विरोध-प्रदर्शनों और नाकेबंदी के बाद प्रदर्शनकारियों ने धमकी दी है कि यदि हादी के हत्यारों को गिरफ्तार नहीं किया गया और उनको सजा नहीं दी गयी तो वे अब अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस के आवास और संसद की घेराबंदी करेंगे। बांग्लादेश में हादी की हत्या ने आंदोलन को और ज्यादा उग्र और व्यापक कर दिया है। इस आंदोलन में इस्लामी कट्टरपंथी ताकतें इसे हिन्दू अल्पसंख्यकों के विरुद्ध ले जाने की कोशिश कर रही हैं। दूसरी तरफ, शोषक वर्ग की पार्टियां सत्ता हासिल करने में इसका इस्तेमाल कर रही हैं। फरवरी, 26 में होने वाले चुनाव में हिस्सा लेने के लिए खालिदा जिया की पार्टी बंगाल नेशलिस्ट पार्टी अपनी पूरी ताकत लगा रही है। उनके बेटे अपने पूरे परिवार के साथ 17 वर्षों बाद बांग्लादेश वापस आये हैं और उनकी बड़ी-बड़ी रैलियां आयोजित हो रही हैं। जमाते-इस्लामी भी सत्ता में आने की होड़ में शामिल है।
लम्बे समय तक सत्ता में रही अवामी लीग की नेता शेख हसीना के विरुद्ध यह आंदोलन शुरू हुआ था और 2024 में इस व्यापक आंदोलन और इसके हसीना सरकार द्वारा व्यापक दमन के चलते शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद और देश छोड़कर भारत में शरण लेने को मजबूर होना पड़ा था। शेख हसीना को बांग्लादेश की कोर्ट ने फांसी की सजा दे दी। इसके बाद, बांग्लादेश की हुकूमत ने भारत से उनके प्रत्यर्पण की मांग की है। उनकी पार्टी अवामी लीग को प्रतिबंधित कर दिया गया है। अब यह पार्टी सीधे तौर पर चुनावों में हिस्सा नहीं ले सकती। शेख हसीना की पार्टी के हटने के बाद, बांग्लादेश में सत्ता के लिए दौड़ में सबसे आगे रहने वाली पार्टी बी एन पी है। इस आंदोलन से उपजी इस्लामी कट्टरपंथी पार्टी जमाते इस्लामी भी इसमें शामिल है। यह भी कहा जाता है कि हादी एक स्वतंत्र उम्मीदवार के बतौर इस चुनाव में भागीदारी करने वाले थे। हादी हसीना की भ्रष्ट और तानाशाह सरकार के विरुद्ध इस आंदोलन की प्रमुख आवाजों में एक थे।
हादी की हत्या के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने दो हिन्दुओं की हत्यायें कर दीं। इससे भारत में इसका विरोध हुआ। भारत के हिन्दू कट्टरपंथियों ने जगह-जगह विरोध प्रदर्शन किये। पश्चिम बंगाल के भाजपा नेता सुबेन्दु अधिकारी ने यहां तक कह डाला कि जैसे इजरायल ने गाजा को सबक सिखाया है, वैसे ही भारत को बांग्लादेश को सबक सिखाना चाहिए। यहां की हिन्दू फासीवादी ताकतें बांग्लादेश के इस्लामिक कट्टरपंथ को और ज्यादा मजबूत और उग्र कर रही हैं और इसका ठीक उल्टा भी हो रहा है। बांग्लादेश की इस्लामिक कट्टरपंथी ताकतें भारत में हिन्दू फासीवादी ताकतों को और हवा दे रही हैं। एक तरफ, शेख हसीना को शरण देने और उनके द्वारा बांग्लादेश सम्बन्धी राजनीतिक बयानबाजी भारत की जमीन से करने के चलते बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनायें और तेज होती जा रही हैं। हालांकि भारत सरकार के प्रवक्ता बार-बार यह कह रहे हैं कि वे बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में कोई दखल नहीं दे रहे हैं। वे बांग्लादेश में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने की उम्मीद करने सम्बन्धी बयान दे रहे हैं। लेकिन बांग्लादेश में हादी की हत्या में भारत के हाथ होने का संदेह लगातार व्यक्त किया जा रहा है। बांग्लादेश की पुलिस ने यह बयान दिया है कि हादी के हत्यारों को मेघालय ले जाया गया है और वे इस समय भारत में मौजूद हैं। बांग्लादेश की पुलिस यहां तक दावा कर रही है कि मेघालय ले जाने वाले मददगारों को भारतीय अधिकारियों ने गिरफ्तार भी कर लिया है। मेघालय के पुलिस अधिकारी और बी.एस.एफ. के अधिकारी ने इसका खण्डन किया है और इसे भारत विरोधी दुष्प्रचार का हिस्सा बताया है।
लेकिन इसके बावजूद, बांग्लादेश में भारत विरोधी माहौल और ज्यादा मजबूत हुआ है। ठीक इसी प्रकार, भारत में भी हिन्दू फासीवादी ताकतें बांग्लादेश विरोधी माहौल को बढ़ा रही हैं। इन ताकतों को भारत की सत्ताधारी पार्टी खुली मदद कर रही है और इसके लिए भारत सरकार की मौजूदा बांग्लादेश सम्बन्धी विदेश नीति जिम्मेदार है। जिस प्रकार, भारतीय शासक वर्ग अपने पड़ोसी देशों के साथ ‘बड़े भाई’ जैसा व्यवहार करता रहा है, उससे भारत विरोधी भावना बनने में मदद मिली है। खुद हमारे देश में हिन्दू फासीवादी ताकतें अल्पसंख्यकों और विशेष तौर पर मुसलमानों के प्रति भेदभाव और दुर्व्यवहार कर रही हैं। इसका परिणाम भी पड़ोसी देशों में हिन्दू अल्पसंख्यकों के ऊपर दिखाई पड़़ रहा है।
हादी की मौत के बाद उमड़ता जन-सैलाब है और उसमें एक काला धब्बा दो हिन्दुओं की हत्या है। लेकिन यह पूरा आंदोलन नहीं है। न ही इस आंदोलन का मुख्य चरित्र साम्प्रदायिक है। यह आंदोलन बांग्लादेश की सत्ता के विरुद्ध है, यह शासक वर्ग की शोषणकारी व्यवस्था को अपना निशाना बना रहा है। हालांकि इसकी दृष्टि स्पष्ट नहीं है और इसके नेतृत्व की कोई साफ विचारधारा नहीं है। इससे इसके निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा इस्तेमाल होने का खतरा मौजूद है।
खुद हादी इस खतरे को जानते थे। अपनी हत्या से पहले वे कई सार्वजनिक मंचों से यह कह रहे थे कि मौजूदा व्यवस्था के संचालक छात्रों-युवाओं की न्यायपूर्ण समाज, एक जनवादी समाज की मांग के रास्ते में अवरोध बनेंगे और वे आसानी से इन्हें पूरा नहीं होने देंगे। इसके लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ेगा।
खुद बांग्लादेश बनने के बाद से वहां पर या तो सैनिक शासन रहा है या अवामी लीग और बांग्ला राष्ट्रवादी पार्टी (बी एन पी) का शासन रहा है। सैनिक शासक जिया उर रहमान की पत्नी खालिदा जिया की पार्टी बी एन पी है। इसी प्रकार, दूसरे सैनिक शासक इरशाद की पार्टी भी सत्ता के लिए संघर्षरत है। इन पार्टियों ने और खुद लम्बे समय तक शासन में रही अवामी लीग, सभी या तो इस्लामी कट्टरपंथियों की सहयोगी रही हैं या उन्हें किसी न किसी रूप में प्रश्रय देती रही हैं। ये सभी पार्टियां शोषक वर्ग की पार्टियां रही हैं और मजदूर-मेहनतकश वर्गों के विरुद्ध रही हैं। जहां शेख हसीना की सत्ता भारतीय शासकों के साथ घनिष्ठता से जुड़ी रही है, वहीं उनको हटाने के बाद बनी अंतरिम सरकार अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के इशारों के जरिये अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ जुड़ने की पूरी तैयारी में लगी हुई है।
हालांकि शेख हसीना की सत्ता को बेदखल करने में छात्रों-नौजवानों और मजदूर-मेहनतकश लोगों की निर्णायक भूमिका रही है, लेकिन मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनाने में अमरीकी साम्राज्यवादियों के सहयोग से बांग्लादेश के शोषक वर्गों के विभिन्न हिस्सों की भूमिका रही है। इस सत्ता ने छात्रों-नौजवानों को शांत करने के लिए कुछ भागीदारी उनकी भी कराई है।
इसलिए इस मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने सबसे अधिक जोर वित्तीय स्थिरता बहाल करने और निवेशकों को आकर्षित करने पर दिया है। यही शोषक वर्गों की मांग रही है। यही बात अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की शर्तों में रही है।
यहां यह ध्यान देने की बात है कि बांग्लादेश के निर्यात का बड़ा हिस्सा वस्त्र उद्योग है। इस उद्योग में 40 लाख से अधिक लोग काम करते हैं। इस उद्योग के मजदूरों की बहुत कम मजदूरी है और काम करने की स्थितियां बहुत खराब रहती हैं। मजदूरी बढ़ाने और काम करने की स्थितियों को बेहतर करने की मांग को लेकर बार-बार हड़तालें होती रही हैं। इसमें 2023 में हुआ कपड़ा मजदूरों का व्यापक विरोध प्रदर्शन बहुत महत्वपूर्ण रहा है।
हादी ने इंकलाबी मंच का गठन करके ऐसे आंदोलनों को मजबूत करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे इन्हें जमीनी स्तर पर मजबूत कर रहे थे। उनके ऐसे प्रयास शोषक वर्गों को रास नहीं आ रहे थे। स्थापित शोषक वर्गीय पार्टियां ऐसे आंदोलनों से भयभीत थीं। वे हादी जैसे लोगों को और उनके इंकलाबी मंच को अस्थिरता पैदा करने वाले के बतौर प्रचारित-प्रसारित कर रही थीं। इंकलाबी मंच और हादी को अस्थिरता पैदा करने वाला व्यक्ति घोषित करने में बांग्लादेश के पूंजीवादी मीडिया की बड़ी भूमिका थी। बांग्लादेश के दो बड़े समाचार पत्र प्रोथीम आलो और डेली स्टार इसमें प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। इसी प्रकार, कई टी.वी. चैनल इसमें शामिल थे। इसलिए हादी की हत्या के बाद जब इन समाचार पत्रों और चैनलों ने शांति स्थापित करने और संयम बरतने की अपील बार-बार की तो छात्रों-युवाओं को लगा कि वे हमेशा अन्यायकारी और हत्यारी व्यवस्था की हिमायत करते रहे हैं और वे इन पर टूट पड़े। इन दोनों अखबारों के दफ्तरों को जला दिया और टी.वी. चैनलों पर भी हमले किये।
यह हमेशा से होता रहा है कि जब भी शोषित-उत्पीड़ित जनता अपनी न्यायसंगत मांगों के लिए उठ खड़ी होती है और अपना संगठित आक्रोश व्यक्त करती है तो व्यवस्थापोषक लोग शांति और संयम की अपील करके उनको ठंडा करने की कोशिश करते हैं, ताकि उनका लूट का तंत्र चलता रहे। उनके लिए शांति और व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण होती है। न्याय की मांग को वे व्यवस्था के लिए खतरा मानते हैं। यही हाल, हादी की हत्या के बाद उठने वाले जनाक्रोश को दबाने के लिए किया गया। इसे कुचलने के लिए पुलिस और सेना को तैनात कर दिया गया। पानी की बौछारों और लाठी-डण्डों की मदद से इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश की गयी। जितना अधिक इसे कुचलने की कोशिश की गयी उतना ही यह फैलता गया। और यह अभी फैलता ही जा रहा है।
यहां यह गौर करने की बात है कि हादी की हत्या के बाद भड़के आंदोलन में यह नारा उठा कि ‘‘दिल्ली ढाका से दूर रहो’’। भारतीय उच्चायोग के समक्ष भारत विरोधी नारे गूंज रहे थे। यह बात इधर सबसे ज्यादा मुखर होकर सामने आयी है कि भारत के ज्यादातर पड़ोसी देशों में भारतीय सत्ता के विरुद्ध आवाजें मुखर होकर आयी हैं। यह नेपाल में हुआ, श्रीलंका में हुआ, मालद्वीव में हुआ और अब बांग्लादेश में हो रहा है। यह भारतीय शासक वर्ग का विरोध है। यह मौजूदा शासक पार्टी की सत्ता का विरोध है। यह भारत की मजदूर-मेहनतकश अवाम का विरोध नहीं है। यह भारतीय शासक वर्ग के पड़ोसी देशों के शासकों के साथ सम्बन्धों का परिणाम है। यह मौजूदा भारतीय विदेश नीति की असफलता का द्योतक है।
यहां यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह इसे दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच प्रभाव क्षेत्र बनाने के संघर्ष का एक केन्द्र बना देती है। अमरीकी साम्राज्यवादी हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अपना प्रभाव फैलाने में इसका इस्तेमाल करना चाहते हैं। चीनी साम्राज्यवादी बांग्लादेश में और समूचे दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण एशिया में अपने प्रभाव को बढ़ा रहे हैं। जब तक शेख हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थीं, तब तक बांग्लादेश भारत के ज्यादा करीब था और चीन व अमरीका से एक दूरी बनाये हुए था। लेकिन इस समय वह भारत से एक हद तक दूरी बना चुका है। और मौजूदा बांग्लादेश के संकट के लिए वह भारत के हस्तक्षेप को जिम्मेदार ठहरा रहा है। बांग्लादेश में अंधराष्ट्रवाद की आंधी लाने की कोशिशें हो रही हैं और इसके निशाने पर भारत है।
यह अंधराष्ट्रवाद और साम्प्रदायिक कट्टरता न सिर्फ बांग्लादेश में फैलायी जा रही है बल्कि यहां भारत में भी तेज की जा रही है। इसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है।
हादी की हत्या और उसके बाद पैदा हुए जनाक्रोश से उपजा व्यापक जनान्दोलन ऐसे समय में हुआ है जहां दुनिया के कई देशों में ऐसे ही छात्र-युवा आंदोलन, जेन जेड के नाम से या अन्य नामों से हुए हैं। इन आंदोलनों ने छात्रों-युवाओं की समस्याओं को सामने लाकर खड़ा किया है और कई स्थानों में सत्ता-परिवर्तन करने में भूमिका निभाई है। इसने बांग्लादेश में भी यही भूमिका निभाई है।
लेकिन असली सवाल महज सत्ता-परिवर्तन से नहीं हल होते। बांग्लादेश के मजदूरों-मेहनतकशों का संघर्ष जब तक इस छात्र-युवा आंदोलन के बड़े घटक के रूप में नहीं जुड़ता और वह जब तक व्यापक व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई में नहीं रूपान्तरित होता, तब तक वह शोषकों के एक समूह के स्थान पर दूसरे समूह को स्थापित करने का काम ही करता रहेगा।
हाल के अन्य देशों के आंदोलनों की तरह बांग्लादेश का मौजूदा छात्र-युवा आंदोलन व्यापक भागीदारी के बावजूद विद्रोह और निराशा में फंसे होने को अभिशप्त है।